आलेख
15 अगस्त-स्वाधीनता दिवस पर विशेष

अब तनिको टेंसन नहीं है

भोपाल : सोमवार, अगस्त 13, 2018, 15:32 IST

स्टेशन पहुँचते ही पता चला कि ट्रेन आधा घंटा से बढ़कर 2 घंटा लेट हो गई है। नजर दौड़ाई एक बेंच पर एक बुजुर्ग आराम से बेग रखे ऊँघ रहे थे। उनके बगल में बैठे दम्पत्ति की ट्रेन शायद आने को थी... वे उठे और मैं बैठ गई।

बचपन से ही स्टेशन क्या एक चलायमान मंच-सा लगता रहा है मुझे। कोई भाग-दौड़ रहा है, कोई आराम से छोड़ने आये लोगों से आत्मीयता बाँट रहा है। मन ही मन हर एक को पढ़ने की कोशिश.... शायद दिमाग को बिजी रखने का सबसे अच्छा तरीका है। तभी पता नहीं कहाँ से 15-20 गाँव वालों की टोली आई.... दुधमुँहे बच्चे से लेकर 80 साल के बुजुर्ग सब शामिल हैं। हम शहरियों की तरह उन्होंने बैठने के लिये कोई नजरें नहीं दौड़ाईं.... सब आपस में मशगूल। उनमें से एक महिला ने पुराना-सा चादर निकाला, मेरी बेंच के सामने बिछा लिया। सब उसी में बैठ गये। बच्चे खाने-खेलने में मशगूल, तो बड़े गप्पों में। मेरा भी पूरे स्टेशन से ध्यान हटकर उस झुण्ड पर आ टिका।

अचानक मोबाइल फोन की घंटी बजने से एक युवक उठ खड़ा होता है। 'हाँ बोलो.... अच्छा लड़की भई है। अरे वाह! अब तो कछु टेंशन नहीं.... लच्छमी आई है लच्छमी। अरे जनम से ही खाता खोल देती है सरकार। पाँच साल तो सीधे खाते में 6-6 हजार, यानी 30 हजार रुपये पहुँच जायेंगे। तुम्हें उसकी पढ़ाई की और शादी की चिंता नहीं करना है। तुम्हारी बेटी जब छठीं कक्षा में एडमिशन लेगी तो दो हजार, नवमीं में 4 हजार और ग्यारहवीं में एडमिशन के वक्त 6000 रुपये मिलेंगे। जब तुम्हारी बिटिया 21 साल की हो जायेगी, तो उसे एक लाख मिल जायेंगे। तुम बनो न बनो, तुम्हारी बिटिया जरूरी लखपति बन जायेगी। तुम शादी करो तो ठीक नहीं तो मुख्यमंत्री कन्या विवाह योजना है न। यह तब भी रहेगी जब तुम्हारी बिटिया बड़ी हो जायेगी'।

अधसोती महिला की जैसे नींद खुली, बोली- 'हमारी बबली को तो बेटा होने पर अभी ग्वाडीकला (होशंगाबाद जिला) 16 हजार की प्रसूति सहायता की रकम मिली है। दामाद सज्जन सिंह रेत खदान में मजदूरी करते हैं। उन्होंने संबल योजना में अपना पंजीयन करा लिया था। गुड़, लड्डू, मालिश.... खूब देखभाल हुई बबली की इन पैसों से। मुख्यमंत्री कहते ही नहीं है, सही में मामा हैं मामा। 'तभी अधेड़ बोला 'गरीबों की विपत्ति में बहुत बड़ा सहारा है यह सरकार। बरही (कटनी जिला) में तो राजकुमार का 14 हजार 941 का बिजली बिल ही माफ हो गया। सुनत हैं कि लाख-लाख, डेढ़-डेढ़ लाख रुपय्या तक के भी बिजली बिल माफ भए हैं। अंगूरी की ननद पपीताबाई के आदमी अचानक ही सुरग सिधार गये। अब खाली हाथ पपीताबाई क्या करे। सरकार ने झट्ट से 5 हजार रुपिया किरिया-करम के लिये, दो लाख रुपये गुजर-बसर के लिये दिये। मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान तो गरीबों के माई-बाप हैं, माई-बाप। संबल योजना तो बहुत बढ़िया है। राजेश की टांग टूट गई थी। 80 हजार रुपये का ऑपरेशन मुफ्त में हो गया। हम्माल राजेश अपाहिज होने से बच गया'।

अब तक श्रोता की भूमिका निभाने वाला हरी शर्ट पहने युवक अचानक मुखर हो उठा। 'मुख्यमंत्री बनने के बाद भी श्री शिवराज सिंह चौहान कभी नहीं भूलते कि वह किसान के बेटे हैं। गाँव-गाँव में सिंचाई सुविधा होने से खेती सही में लाभ का धंधा बन गई है। अनुदान पर रोटावेटर, स्प्रिंकलर, सीडड्रिल न जाने कौन-से नई-नई मशीने मिलने लगी हैं। खूब पैदावार होने लगी है। सुना है बहुत से गाँव में किसान अपने मोबाइल फोन पर घर बैठे सौर ऊर्जा पम्प से सिंचाई कर गर्मी की फसलें भी भरपूर लेकर मालामाल हो रहे हैं। किसान देवसिंह तो सरकारी खर्चे पर इजराइल, नीदरलैण्ड और न जाने कौन से देशों में खेती-बाड़ी सीख कर आये हैं। कई लोग तो सरकारी कर्जा लेकर फूल की खेती कर रहे हैं और दिल्ली-बम्बई भेज कर अमीर बन रहे हैं। अरे भइय्या कई लोग तो मेहनत-मजदूरी छोड़ मुख्यमंत्री स्व-रोजगार योजना में कर्जा लेकर अपना धंधा शुरू कर रहे हैं। खुद की आमदनी बढ़ी ही, दूसरों को भी रोजगार दिया और गाँव छोड़ के भी नहीं जाना पड़ा। कल ही अखबार पढ़ा था कि मध्यप्रदेश में आजीविका मिशन की सहायता से 25 लाख औरतों ने 2 लाख 17 हजार समूह बनाये हैं। समूह किराना, सिलाई-कढ़ाई, मनिहारी, सब्जी, सेनेटरी नेपकिन, साबुन, अगरबत्ती तरह-तरह के सामान बनाकर घर की कमाई बढ़ा रही है। इनकी कमाई के कारण घर में पढ़ने-लिखने, खाने-पीने, रहने, सबका स्टेण्डर्ड बढ़ गया है। हम लड़के-लड़कियों के लिये मुख्यमंत्री सही में मामा हैं मामा। पढ़ाई भी मुफ्त करो, लेपटॉप, साइकिल सभी तो दे रहे हैं। गरीब के बच्चे पढ़ना चाहें, अपने पैरों पर खड़े होना चाहें, सभी के लिये योजना है। बस, खुद को आगे आना पड़ेगा लाभ उठाने के लिये'।

अचानक बहुत तेज बारिश शुरू हो गई। चादर को थोड़ा भीतर सरकाती लाल साड़ी वाली महिला बोली 'घर टपक न रहा हो, सामान भी भीग जायेगा, लकड़ी-कंडा भी। 'इस पर दूसरी महिला बोली 'हमें तो अब बारिश का बिल्कुल डर नहीं है। हमारे गाँव में तो सरकार ने सबको प्रधानमंत्री योजना वाले पक्के घर दे दिये हैं। सुबह दिशा-मैदान के लिये खेतों में भी नहीं जाना पड़ता। पहले खपरैल टूट जाते थे, मिट्टी की दीवाल धँसक जाती थी, पन्नी, तिरपाल उड़ जाता था। लकड़ी-कण्डे में साँप-बिच्छू बैठ जाते थे। अब इन सबसे छुट्टी मिल गई है। उज्जवला योजना में गैस चूल्हा भी मिल गया है। फटाफट खाना बन जाता है, न लकड़ी बीनने जाना और न धुएँ से घर काला। हमारा गाँव तो अब पक्की सड़क से जुड़ गया है। जननी एक्सप्रेस, 108 एम्बुलेंस, सवारी गाड़ी, स्कूल बस सब गाँव तक पहुँचने लगी हैं। अब तो गाँव के प्राचीन मंदिर और प्राकृतिक सुंदरता के कारण शहरी लोग घूमने भी आने लगे हैं।'

कृशकाय-सी दिखने वाली महिला ने कुछ कराहा। सभी बोल पड़े 'सगुना तुम अस्पताल में दिखाती क्यों नहीं। तुम्हारे कैंसर के लिये भी योजना है। राज्य बीमारी सहायता से शहर के बड़े अस्पताल में तुम्हारा मुफत में इलाज हो जायेगा। जिला अस्पतालों में गरीबों का मुफ्त में डायलिसिस और कीमोथेरेपी हो रही है। जनम से गूंगे-बहरे, दिल में छेद, कटे-फटे होंठ तालू वाले बच्चों का मुफ्त में इलाज हो रहा है। इनके इलाज का लाखों रुपये का खर्च सरकार ही तो उठा रही है। बहुत कमजोर बच्चे होते हैं क्या कहते हैं उनको ?? हाँ हाँ कुपोषित। उनका भी इलाज करवा कर तंदरुस्त कर देते हैं। डॉक्टरों की टीमें गाँव-गाँव पहुँचकर बच्चों को ढूँढकर मुफ्त में इलाज करवा रही हैं। ऐसे मुख्यमंत्री के लिये हमारे दिल से दुआएँ निकलती हैं। जिज्जी बता रही थी कि उनके गाँव में भी अब वन विभाग के कर्मचारी दवा, पढ़ाई-लिखाई, पोषण-आहार सबमें मदद कर रहे हैं। उतनी परेशानी अब न रही।'

बुजुर्ग बोला 'गरीब को गरीबी से उबारने के लिये मुख्यमंत्री सब कुछ कर रहे हैं। चम्पा ने तो अपनी बेटियों को ऊँची नौकरी तक कड़कनाथ मुर्गे की कमाई से ही पहुँचाया। मुर्गापालन योजना में वह चूजे लेकर पाल-पोस कर बेचती। हर साल एक लाख रुपये से ज्यादा कमा लेती है। मछली विभाग की सहायता से लोग मछली पालके भी अच्छा-खासा कमाने लगे हैं। डेयरी के लिये भी कर्जा लेकर दूध बेचकर आमदनी बढाई है सीता और जग्गू जैसे लोगों ने। 'तभी शोर मचा कि अपनी गाड़ी आ गई.... गाड़ी आ गई। बोरिया-बिस्तर समेट सब गाड़ी में जा चढ़े। मैं रह गई मंथन करती हुई। कितना कुछ बदल गया है गरीबों की जिंदगी में पिछले कुछ सालों में।


सुनीता दुबे
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