आलेख

कर्मयोगी शिवराज सिंह चौहान - विश्वास सारंग

भोपाल : शनिवार, मार्च 3, 2018, 17:25 IST
 

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान राजनेताओं के लिये रोल मॉडल के रूप में श्रद्धा का पर्याय बन गये हैं। आजादी के बाद देश में योजना विकास का ताना-बाना बुना गया तब बड़े भवन, कल-कारखाने लगाने के साथ योजना का जो एक लक्ष्य निर्धारित किया गया वह मानव गरिमा की स्थापना करना था। स्वदेशी को जीवन में उतारना था। लेकिन पाश्चात्य ऊहापोह में इनके अमल का जोश काफूर हो गया। मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान ने मुख्यमंत्री पद की जबावदेही संभालने के बाद प्रदेश के गाँव, गरीब और किसान की पीड़ा की अनुभूति की और अपनी अवधारणा को जमीन पर उतारकर साबित कर दिया कि इस दिशा में कोई भूमिपुत्र ही गाँवों में सामाजिक क्रांति ला सकता है। देश में आबादी के अनुपात में आया असन्तुलन पुत्र और पुत्री के जन्म को लेकर व्याप्त धारणाओं पर निर्भर रहा है। श्री चौहान जब क्षेत्र के विधायक और बाद में सांसद बने उन्होंने हजारों की संख्या में सामुहिक विवाह गाँवों में कराये और खुद कन्यादान लेकर आम आदमी को कहा कि कन्या बोझ नहीं है। बाद में जब वे मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने कन्या विवाह योजना को सरकार की योजना बनाया। प्रदेश की माताओं के भाई और पुत्रियों के मामा बन गये।

श्री चौहान ने भ्रूण हत्या पर जितना जबर्दस्त प्रहार लाड़ली लक्ष्मी योजना के क्रियान्वयन से किया है उतना कदापि कोई कड़े से कड़ा कानून भी नहीं कर सका है। गाँव की बेटी योजना हो, गाँव की बेटी के लिये विद्यालय जाने के लिये साइकिल प्रदाय योजना, मुफ्त पाठय-पुस्तकें, जननी सुरक्षा योजना, दीनदयाल उपचार योजना, मुख्यमंत्री अन्नपूर्णा योजना, मुख्यमंत्री मजदूर सुरक्षा योजना आदि का उद्देश्य व्यक्ति की गरिमा में चार चाँद लगाकर उनमें आत्म-विश्वास कूट-कूट कर भरना रहा है। श्री चौहान ने प्रदेश को मंदिर, जनता को आराध्य देवता और खुद अपने को पुजारी साबित कर दिया है। मुख्यमंत्री श्री चौहान के नेतृत्व में प्रदेश में परिवर्तन की ऐसी बयार चली कि अनुसूचित जाति, जनजातियों के बच्चे विदेशों में उच्च शिक्षा प्राप्त करने पहुँचने लगे। महिलाओं का सशक्तीकरण किस तरह हुआ यह बात अब चौपाल की चर्चा बन चुकी है। स्थानीय स्वायत्तशासी संस्थाओं में महिलाओं को पचास प्रतिशत आरक्षण देकर शिवराज सिंह चौहान ने प्रदेश में महिलाओं में पक्की पैठ और सकारात्मक रिश्ते बना लिये हैं यही कारण है कि नगरों, ग्रामों, बस्तियों में जहाँ श्री चौहान का कार्यक्रम होता है पुरूषों से अधिक महिलाएँ और बहनें उपस्थित होकर उनके लिये पाँव-पाँव वाले भैया का संबोधन करती हैं।

प्रदेश में किसानी को लाभकारी व्यवसाय बनाया जा रहा है। श्री चौहान का कहना है कि किसानों की प्रगति के बिना प्रदेश शक्तिशाली नहीं बन सकता है। उन्होंने किसानों को 7 प्रतिशत ब्याज पर मिलने वाले फसल कर्ज को सस्ता कर दिया। शून्य प्रतिशत ब्याज पर ऋण दिलाकर ऋण ग्रस्तता पर प्रहार किया। किसानों को कर्ज के बोझ से मुक्ति दिलायी हैं। अब तो शून्य प्रतिशत ब्याज के साथ-साथ ऋण पर 10 प्रतिशत की सबसिडी भी दी जा रही है।

पाँच मार्च 1959 में जैत गांव (सीहोर) में श्री प्रेमसिंह चौहान के किसान परिवार में जन्में शिवराज सिंह चौहान में प्रांरभ से ही जन-समस्याओं से जूझने का जज्बा था। आपातकाल में जेल जाने वाले वे कदाचित सबसे कम उम्र के स्वयंसेवक थे। पितृ पुरूष कुशाभाऊ ठाकरे ने राजनैतिक नेतृत्व का मंत्र और आशीर्वाद दिया और उनमें क्रांति की ज्वाला धधक उठी। पं. दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानव दर्शन ने उन्हें संस्कार दिये और उनकी गणना होनहार नेताओं में की जाने लगी। प्रचार और सत्ता के मोह से बचने की उनकी भरसक कोशिश रही। लेकिन सही यह है कि जो छाया के पीछे चलते हैं, छाया भी उनका साथ छोड़ देती हैं। जो आगे दौड़ते हैं पीछे मुड़कर नहीं देखते, पद और सत्ता उनके पीछे चली आती हैं।

एक बार वर्ष 1988 में शिवराज सिंह चौहान ने तत्कालीन सरकार के घोर जुल्म के विरोध में मशाल जुलूस का आयोजन किया तो उनकी जिद की राजमाता जी नेतृत्व करें। प्रदेश के तत्कालीन नेतृत्व के सामने दो हठ। कुशाभाऊ ठाकरे, नानाजी और राजमाता जी के कद की गरिमा के अनुसार समर्थन जुट जायेगा ? श्री शिवराज बोले देहात की चालीस हजार जनता मशाल जुलूस में भाग लेगी। शिवराज की हठ के सामने नेतृत्व सहम गया। जब 7 अक्टूबर, 1988 को भोपाल में जुलूस निकला और नेतृत्व राजमाता जी ने किया तो सारी सड़कें जुलूस से भर गयी थीं। भोपाल में पैर रखने के लिए जगह नहीं थी। वाणी में संयम, कथनी और करनी में साम्य का नाम शिवराज सिंह चौहान है।


लेखक राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) सहकारिता, भोपाल गैस त्रासदी राहत एवं पुनर्वास विभाग है।
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