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मध्यप्रदेश में स्कूल शिक्षा को जन-भागीदारी से गुणवत्ता देने के प्रयास - कुंवर विजय शाह

भोपाल : शनिवार, मार्च 3, 2018, 20:38 IST
 

मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने स्कूल शिक्षा में गुणवत्ता सुधार के लिये जनभागीदारी को प्राथमिकता दी है। जन-भागीदारी के माध्यम से समाज के सभी वर्गों के लोगों को सरकारी स्कूलों से जोड़ने के प्रयास किए गए हैं। मध्यप्रदेश में शुरू किये गए 'मिल-बाँचें मध्यप्रदेश' को काफी सफलता मिली है। इस अभियान में समाज के सभी वर्ग के लोग जिनमें जन प्रतिनिधि, सरकारी अधिकारी, डॉक्टर, वकील और विभिन्न प्रोफेशन के लोगों ने सरकारी स्कूलों में पहुँच कर बच्चों को पढ़ाई के महत्व के बारे में बताया और यह भी बताया कि वे अच्छे नागरिक किस तरह बन सकते है। इसी तरह का एक आयोजन नेतृत्व विकास से संबंधित इस वर्ष भी सरकारी स्कूलों में किया गया। मुख्यमंत्री श्री चौहान ने स्वयं भोपाल के टी टी नगर स्थित मॉडल हायर सेकेण्डरी स्कूल पहुँच कर बच्चों से बातचीत की। मुख्यमंत्री श्री चौहान प्रतिवर्ष 12 जनवरी को स्वामी विवेकानन्द जयंती पर बच्चों के साथ योग करते है। सूर्य नमस्कार के कार्यक्रम में बढ़ी संख्या में बच्चों की भागीदारी होती है।

मुख्यमंत्री श्री चौहान ने बच्चों के हितों का ख्याल रखते हुए मेधावी विद्यार्थी योजना शुरू की है। योजना में प्रतिभाशाली बच्चों के उच्च संस्थानों में पढ़ाई की फीस की प्रतिपूर्ति अब राज्य सरकार कर रही है। कक्षा 10 की बोर्ड परीक्षा में 75 प्रतिशत अंक लाने वाले विद्यार्थियों को लेपटॉप दिये जा रहे है।

मुख्यमंत्री श्री चौहान ने स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को दी जाने वाली नि:शुल्क साईकिल योजना और गणवेश वितरण योजना का विस्तार किया है। इसका मकसद था कि योजना का लाभ अधिक से अधिक बच्चों को मिले। मुख्यमंत्री श्री चौहान के कार्यकाल में सरकारी स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं के सुधार पर भी विशेष ध्यान दिया गया है। सरकारी स्कूलों के बच्चों के गणवेश बनाने का कार्य अब प्रदेश के महिला स्व-सहायता समूहों द्वारा किया जायेगा।

वर्ष 2003 के मुकाबले में वर्ष 2017 में सरकारी स्कूलों में दी जाने वाली सुविधाओं में अच्छा-खासा इजाफा हुआ है। प्रदेश में वर्ष 2003 में प्राथमिक शालाओं की संख्या 55 हजार 980 हुआ करती थी, जो अब बढ़कर 83 हजार 890 हो गयी है। माध्यमिक शालाओं की संख्या 12 हजार 490 से बढ़कर 30 हजार 341 हो गयी है। शैक्षणिक संस्थाओं के भौगोलिक विस्तार के प्रयासों से प्राथमिक स्तर पर शाला त्याग दर 15 से घटकर 4.9 प्रतिशत रह गयी है। माध्यमिक शाला स्तर पर त्याग दर भी 24.7 से घटकर 6.7 प्रतिशत रह गयी है। प्राथमिक एवं माध्यमिक स्तर पर अनुसूचितजाति और जनजाति वर्गां के विद्यार्थियों की सहभागिता अन्य वर्गो के समान हो चुकी है। प्रदेश में हाई स्कूलो की संख्या वर्ष 2003 में केवल 1 हजार 704 हुआ करती थी, जो बढ़कर 4 हजार 740 और हायर सेकेण्डरी स्कलों की संख्या 1 हजार 517 से बढ़कर 3 हजार 815 हो गयी है। जीरो बजट की परम्परा के स्थान पर सम्पूर्ण सेट-अप के साथ शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना की गई है।

मध्यप्रदेश में कन्या शिक्षा के लिये किये गये अतिरिक्त प्रयासों से हाईस्कूल स्तर पर जेंडरपैरिटी इंडेक्स 0.51 से बढ़कर 0.98 हुआ है। इस स्तर पर दर्ज छात्र संख्या में अनुसूचित जाति वर्ग की भागीदारी 16.6 प्रतिशत है। इससे स्पष्ट होता है कि आबादी के अनुरूप अनुसूचित जाति वर्ग की सहभागिता है। प्रदेश में जनजाति वर्ग की सहभागिता को बढ़ाने के लिये भी ठोस प्रयास किये जा रहे हैं।

मुख्यमंत्री श्री चौहान ने समाज में शिक्षकों के महत्व को हमेशा ही वरीयता दी है। इस बात को ध्यान में रखते हुए प्रदेश में 'कर्मी' परम्परा को समाप्त कर अध्यापक संवर्ग की स्थापना करने का निर्णय लिया गया है। इस संवर्ग का नियंत्रण अब-तक स्थानीय निकायो के आधीन रहता था जिसे परिवर्तित कर इनकी सेवाएँ राज्य शासन के अधीन लिए जाने का निर्णय लिया गया है। प्रदेश के जिला मुख्यालयों पर संचालित उत्कृष्ट विद्यालयों में 100 सीटर बालक और 100 सीटर बालिका छात्रावास भवन का निर्माण शुरू हो चुका है।

स्कूल शिक्षा विभाग के वर्ष 2017-18 के बजट में 21 हजार 724 करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया है, जो गतवर्ष से 21 प्रतिशत अधिक है। प्रदेश में सर्व शिक्षा अभियान के लिये 3 हजार 109 करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया है। प्रदेश के कुल बजट में स्कूल शिक्षा विभाग के लिये किया गया बजट आवंटन सर्वाधिक है, जो स्कूल शिक्षा सुधार के लिये मुख्यमंत्री श्री चौहान की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।


लेखक मध्यप्रदेश शासन में स्कूल शिक्षा मंत्री हैं।
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