आलेख
"नमामि देवी नर्मदे-सेवा यात्रा (रिपोर्ताज)

आज का सपना कल की हकीकत

यात्रा पर्यावरण चेतना का जन आंदोलन बनी

भोपाल : शुक्रवार, दिसम्बर 30, 2016, 17:13 IST
 

आज विशाल पुल उसके नीचे बहती सँकरी नर्मदा को देखने वाले को कल-कल छल-छल प्रवाह मान नर्मदा की बात सपना लगेगी। यह सही भी है क्योकि नर्मदा गंगा की तरह ग्लेशियर से बनी नदी तो है नहीं, जो गर्मी में अधिक प्रवाहमान हो जाती है। नर्मदा का नीर तो सतपुड़ा और विन्ध्याचल पर्वतों के पेड़ों से बून्द-बून्द में आता है। ग्लेशियर अगर गंगा की,तो घने वन नर्मदा की प्राणशक्ति है। सतपुड़ा और विन्ध्याचल पर्वतों में पेड़ों का जो आज हाल है, उसमें प्रवाहमान नर्मदा की बात स्वप्न ही लगेगी। यह सपना हकीकत बनेगा यह विश्वास पाने के लिये नर्मदा सेवा यात्रा के साथ कदम ताल होना होगा। सहयात्री हो, अगाध श्रद्धा और दृढ़विश्वास से दमकते चेहरों को देखना और चमकती आँखों में बुने जा रहे सपनों को पढ़ना पड़ेगा। नर्मदा सेवा यात्री के रूप पद यात्रा के दौरान जब जनशक्ति और जनचेतना के अहसास और भारतीय संस्कृति की गहरी जड़ों को देखेंगे, तब यह कहने में कोई संकोच नहीं रहेगा कि नर्मदा संरक्षण का आज का स्वप्न कल की हकीकत है।

सिवनी जिले के विकासखंड घंसौर के ग्राम क्ल्कुही में यात्रा का पड़ाव था। अब मगरधा, तुनिया, गागंटा हरदुली होते हुए मंनकेडी में रात्रि विश्राम होगा। अभी सुबह रवानगी की तैयारियां चल रही हैं। सेवा यात्रा का वातावरण अभूतपूर्व दिखा। चर्चा का केंद्र पिछली रात की दिक्कतें नहीं थी। सारे सेवायात्री नए दिन की दिनचर्या में मगन थे। 'जो जन नहीं पूजते जल, वे इस दुनिया के खल'- यह नारा नर्मदा यात्रा के सेवायात्रियों के चेहरे पर साफ अंकित था|नर्मदा को प्रदूषण मुक्त बनाने की भविष्य की योजनाओं और कोशिशों की मंशा पर क्या बूढ़े, क्या जवान, सभी सजग दिख रहे थे।

यात्रा नए पड़ाव के लिए निकलती है। शुरुआत माँ नर्मदा के ध्वज पूजन से होती है। ध्वज पूजन कार्यक्रम में संत नर्मदा अष्टक का उच्चारण करते हैं। पदयात्री ध्वज के रुप में माँ नर्मदा को धारित कर जब दूसरे गाँव के लिए निकलते हैं, तब उमड़ता जन समुदाय देखने काबिल होता है। साधु, संत, खास और आम सभी उत्साह और उमंग के साथ नए पड़ाव के लिए आगे बढ़ते हैं। गाँव की सीमा तक यात्रा को विदा करने इस काफ़िले के साथ गाँव के बड़े, बच्चे,जवान क्या स्त्री पुरुष सब “नर्मदे हर’ का जयकारा करते शामिल हो जाते हैं। यह ग्रामीण अतिथि देवो भव: की भारतीय संस्कृति को जीवंत कर देते हैं। रंग- बिरंगे वस्त्रों की छटा, ढोल-नगाड़ों की थाप और शंख, मंजीरों की ध्वनियों से उत्पन्न अनुगूँज ऐसा वातावरण बना देती है, मानो माँ नर्मदा को प्रदूषणमुक्त करने की उद्घोषणा हो रही है।

बहुत हुआ माँ का अपमान,

आ गए है उसके लाल।

चुनरी हरियाली चढा़येंगे,

वृक्ष किनारों पर लगायेंगें।

माँ नर्मदा की तरह ही प्रवाहमान यात्रा का स्वरूप भी है। जिस तरह नर्मदा की 19 से अधिक सहयोगी नदियाँ, अलग-अलग क्षेत्रों से शुरू हो कर मैया की गोद में समां जाती है, उसी तरह सेवा यात्रा में भी नर्मदा की नहरों से जुड़े क्षेत्रों से निकली उप-यात्राओं की टोलियाँ इस में शामिल होती जाती हैं। खास बात यह है कि स्वप्रेरणा से एकत्रित जनसमुदाय उत्साही और कितना अनुशासित हो सकता है। इसे शब्दों में नहीं यात्रा के साथ कदम से कदम मिला कर ही अनुभव किया जा सकता है। गाँव की सीमा पर यात्रा के स्वागत के लिए पूरी तैयारियों के साथ मगरधा गाँव के लोग खड़े मिलते हैं। स्वागत की तैयारियाँ पूरे जोर-शोर से की गई है। गाँव की बेटियों ने कई घंटों की मेहनत से बहुरंगी रंगोली बनाई है। यात्रियों का फूलों की वर्षा से अभिनन्दन होता है। माल्यार्पण और तिलक कर माँ नर्मदा संरक्षण की अलख जगाने निकले यात्रियों का सम्मान किया जाता है। माँ नर्मदा के चित्र की आरती होती है। आरती का चढ़ावा जनसहयोग राशि के रूप में यात्रा को सौंप दिया जाता है। इस उत्सवी माहौल में लोक कलाकार गीत नृत्य और संगीत के माध्यम से नर्मदा के प्रति अपनी अगाध श्रद्धा को प्रकट करते हैं। माँ नर्मदा के संरक्षण के संदेश को प्रसारित करते हैं।

ग्रामीणों से नर्मदा को जल-मल से मुक्त रखने की बात की जाती है। पूजन-अर्चन की कुछ परम्पराओं, विधियों को बदलने और कुछ को त्यागने की बात की जाती है। किसानों से फलदार वृक्ष लगाने के लिए सरकार द्वारा दिए जा रहे सहयोग की बात होती है। बताया जाता है कि फलदार पेड़ लगाने वाले किसान को फल आने तक 20 हज़ार रूपए प्रति हेक्टर मुआवजा और पौधे खरीदने पर 40 प्रतिशत का अनुदान दिया जाता है। गड्डे करवाने की मजदूरी भी सरकार से मिलने की बात बताई जाती है। जैविक खेती अपनाने को प्रोत्साहित किया जाता है। साधु संत भी यात्रा के उद्देश्यों को धार्मिक आख्यानों के माध्यम से स्थापित करते दिखाई देते हैं| जल-समाधि दिलाने की प्रथा को त्यागने, मुक्तिधाम में अंतिम संस्कार करने और रसायनिक तत्वों से बनी मूर्तियों के विसर्जन को भी प्रतिबंधित करने की बात करते हैं। नर्मदा का जलाभिषेक भी नर्मदा के जल से हो, इसकी सीख देते हुए दीपदान, हवन सामग्री और मालाओं को भी पूजन कुंड में अर्पित करने के लिए प्रेरित करते हैं। अगले पड़ाव के लिए प्रस्थान करने से पूर्व किसानो से नर्मदा किनारे पेड़ लगाने के संकल्प पत्र संकलित किये जाते हैं।

यहाँ पर ग्रामीणों ने भंडारे का आयोजन किया है। खाद्य पदार्थों की तो बात ही क्या है। स्वाद ऐसा जो जबान में बस जाए। खिचड़ी हो या फिर पूरी-सब्जी अथवा हलवा सभी के स्वाद को शब्दों में व्यक्त करना मुश्किल है। सहभोज की बानगी तो देखते ही बनती है। गेरुए वस्त्रधारी संत, सर पर फटका मारे मजदूर, खिलखिलाते बच्चे और शर्माती महिलाएँ सभी भंडारे में एकमेव हो गए। भारत की सांस्कृतिक आस्था का एकात्म स्वरूप साकार दिखा।

पर्यावरण के प्रति चेतना का जो वातावरण बना है वह काबिले तारीफ है। आज जहाँ हर जगह थर्माकोल और प्लास्टिक के गिलास, कटोरी सरलता से उपलब्ध है पर ये नर्मदा सेवा यात्रा में ढूँढे नहीं मिले।पत्तलों-दोनों और कुल्हड़ में खानपान की सारी सामग्री वितरित की जा रही है। संकल्पशक्ति से बदलाव के इतने प्रभावी संकेत शायद ही किसी अन्य सामाजिक आंदोलन में इतनी जल्दी और इतनी गहराई के साथ इससे पहले दिखे हों। यात्रा की मंशा से ग्रामीणों को अवगत करा, नर्मदा की अविरल धारा की तरह यात्रा फिर अगले पड़ाव के लिए चल पड़ी। गागंटा से हरदुली के लिए। यहाँ मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान भी यात्रा में शामिल हुए। बरगी नगर में आयोजित जनसंवाद में यात्रा के ध्वज वाहक के रूप में पहुँचे। कार्यक्रम में सभी धर्मों और समाजों के प्रतिनिधियों ने जीवन में जल की महत्ता और नर्मदा के संरक्षण की बातें एक सुर में की। इसके बाद माँ नर्मदा की आरती हुई। यात्रा ने मनके़ड़ी में पड़ाव किया, अगले दिन की यात्रा के लिए।

एक दिन की इस पदयात्रा में नर्मदा को प्रदूषणमुक्त करने को प्रतिबद्ध जन और गण मिले। नर्मदा के अस्तित्व के लिए उनकी चिंता और भविष्य की उनकी योजनाओं को जान और समझकर यह पाया कि यह मां नर्मदा के प्रति आमजन का जुड़ाव गहरा है। वे नर्मदा में और नर्मदा उनमें समाई है।

मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में नर्मदा संरक्षण की सरकार की पहल इसी से इतनी जल्दी जन आंदोलन में बदल गई है। यात्रा समाज का ऐसा आंदोलन बन गया है, जिसकी दिशा और दर्शन जनता ही तय कर रही है। जनता की यह ताकत सेवा यात्रा के दौरान हर कदम और मोड़ पर दिखाई दे रही है। बात चाहे यात्रा की व्यवस्थाओं की हो या कार्यक्रमों की हों या पूजन कुंड में ही अभिषेक की सामग्री अर्पित करने की हो। माँ नर्मदा प्रदूषण रहित बनाने और वृक्षारोपण के चिंतन की जनता में नई जिद, जज्बा और जुनून दिख रहा है। यह जनशक्ति आज के सपने को कल हकीकत बना देगी, इसकी इबारत नर्मदा सेवा यात्रा लिख रही है।


यात्रा से अजय वर्मा
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