आलेख
जन-कल्याण के 11 वर्ष

जल-वायु स्वच्छता के महती प्रयास

भोपाल : सोमवार, नवम्बर 28, 2016, 16:56 IST
 

विकास की बढ़ती गति के साइड इफेक्ट के रूप में बढ़ते प्रदूषण से सम्पूर्ण विश्व आज चिन्ता में है। ऐसे में जल और वायु में घुलते जहर को नियंत्रित कर स्वस्थ हवा-पानी दिलाने के प्रयास मध्यप्रदेश प्रदूषण बोर्ड द्वारा किए जा रहे हैं। पिछले 11 साल में किये गये प्रयास न केवल प्रदेश, बल्कि देश और विश्व में स्वस्थ जलवायु के लिये छोटा किन्तु महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। बोर्ड राज्य सरकार को जल एवं वायु प्रदूषण के निवारण, नियंत्रण और उपशमन के लिये सलाह देता है। अन्य राज्यों की तुलना में मध्यप्रदेश में प्रदूषण का कम स्तर होने में इन सलाहों पर अमल होना भी एक वजह है।

केन्द्रीय योजना आयोग द्वारा सराहना

भारत सरकार के योजना आयोग ने मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की व्यवस्था की तारीफ करते हुए इसे अन्य राज्यों में लागू करने की अनुशंसा की है। बोर्ड उद्योगों एवं संस्थानों द्वारा जल, वायु सम्मति और खतरनाक अपशिष्‍ट के प्राधिकार के लिये प्रस्तुत आवेदनों का निराकरण प्रत्येक माह के दो गुरुवार को करता है। यह तकनीकी प्रस्तुतिकरण बोर्ड के सभी अधिकारियों, संबंधित उद्योग प्रतिनिधियों की उपस्थिति में पारदर्शिता से होता है।

ऑनलाइन की गई सम्मति प्रक्रिया

बोर्ड ने उद्योगों और संस्थानों को दी जाने वाली सम्मति प्रक्रिया को पूरी तरह ऑनलाइन कर दिया है। इसमें आवेदन, शुल्क, दस्तावेज प्रस्तुति, उन्हें स्व-प्रमाणित करने और आधारयुक्त ई-हस्ताक्षर को मान्यता दी गयी है। इसी तरह बोर्ड की ओर से सम्मति प्रकरण के निपटारे संबंधी ऑनलाइन क्वेरी-रिप्लाय सहित सम्मति प्रकरण के निराकरण के बाद ई-हस्ताक्षरयुक्त सम्मति-पत्र जारी होने की पूरी प्रक्रिया पेपरलेस होने के साथ ही पूर्ण पारदर्शी भी है।

31 जगह नर्मदा जल गुणवत्ता ए-श्रेणी की

बोर्ड प्रदेश की जीवन-धारा नर्मदा नदी का सतत गुणवत्ता मापन करता रहता है। नदी के जिन स्थानों पर जल गुणवत्ता बी एवं सी श्रेणी की पायी गयी, वहाँ संबंधित विभागों को निर्देश जारी कर सुधारात्मक कार्यवाही की गयी। हाल ही में केन्द्रीय बोर्ड की मॉनीटरिंग में प्रदेश के अमरकंटक से लेकर ककराना तक सभी 31 बिन्दु पर ए-श्रेणी पायी गयी है, जो प्रदेश के लिये एक बड़ी उपलब्धि है। नर्मदा नदी में बॉयो-मॉनीटरिंग वर्ष 2007 से वर्ष 2009 के बीच एवं वर्ष 2012 से वर्ष 2014 के बीच किया गया, जिससे जल गुणवत्ता में अपेक्षित सुधार हुआ है।

मध्यप्रदेश देश में अग्रणी राज्य है, जिसने प्रदेश के लगभग 123 उद्योगों में ऑनलाइन रियल टाइम मॉनीटरिंग इक्युपमेंट एवं वेब आधारित कैमरों के जरिये इन्हें मुख्यालय के सर्विलियांस सेंटर से जोड़ा है। इससे उद्योगों द्वारा जल में विषैला अपशिष्ट मिलाने पर रोक लगी है। सिंहस्थ-2016 के दौरान क्षिप्रा नदी की गुणवत्ता के सतत मापन के लिये ऑनलाइन रियल टाइम मॉनीटरिंग की गयी। प्रमुख जल गुणवत्ता प्रभावित पेरामीटरों के विश्लेषण आम जनता के सामने प्रस्तुत किये गये, जो देश में बड़ी उपलब्धि है।

अपशिष्टों के लिये संयुक्त उपचार व्यवस्था लागू

प्रदेश के उद्योगों से उत्पन्न होने वाले खतरनाक अपशिष्टों के भण्डारण, अपवहन और भस्मीकरण के लिये संयुक्त उपचार व्यवस्था लागू की गयी है। औद्योगीकरण को बढ़ावा देने वाले गेल इण्डिया लिमिटेड, हिण्डालको, सासन पॉवर, मोजर बियर पॉवर, एनसीएल एवं डब्ल्यूसीएल की खदानों एवं विशिष्ट पूँजी निवेश वाले उद्योगों के सम्मति प्रकरणों का ईज ऑफ डूइंग बिजनेस में तेजी से निराकरण किया गया।

ज्यादा अवधि की सम्मति नवीनीकरण सुविधा देने वाला देश का दूसरा राज्य

प्रदेश में जैविक खाद और सोलर पॉवर प्लांट उद्योगों को बढ़ावा देने के लिये उन्हें हरी श्रेणी में रखते हुए एक साथ 15 साल के नवीनीकरण की सुविधा दी गयी है। मध्यप्रदेश देश का दूसरा राज्य है, जिसने प्रदेश के उद्योगों को लाल श्रेणी-5 वर्ष, नारंगी श्रेणी-10 वर्ष और हरी श्रेणी के उद्योगों को 15 वर्ष एकसाथ आगामी अवधि के सम्मति नवीनीकरण की सुविधा दी है। उद्योगों को बोर्ड द्वारा जारी की जाने वाली जल और वायु सम्मति एवं खतरनाक अपशिष्ट के प्राधिकार को सिन्क्रोनाइज करते हुए वर्ष 2011 से समेकित सम्मति जारी करने की प्रक्रिया आरंभ की है। इससे उद्योगों को अब अलग-अलग आवेदन नहीं देने पड़ते हैं।

सीमेंट उद्योगों की व्यर्थ तापीय ऊर्जा को बिजली में बदलने के लिये सतना सीमेंट प्लांट में 19.5 मेगावॉट के पॉवर प्लांट की स्थापना की गयी है। प्लास्टिक पॉलिथिन कैरीबेग का विनष्टीकरण बहुत कठिन था। बोर्ड ने सीमेंट भट्टी में कोयले के साथ दहन की व्यवस्था लागू करवाकर लगभग 12 हजार मीट्रिक टन प्लास्टिक अपशिष्ट का निपटान करवाया। बोर्ड के शहडोल, छिन्दवाड़ा, कटनी, सिंगरौली, देवास और पीथमपुर मे क्षेत्रीय कार्यालय हैं। मुख्यालय की केन्द्रीय प्रयोगशाला के साथ जबलपुर, इंदौर एवं ग्वालियर प्रयोगशालाओं के लिये एनएबीएल, ओशा एक्रीडेशन प्राप्त किया जा चुका है।

वाहन उत्सर्जन, ध्वनि-स्तर मापन, विभिन्न अपशिष्ट से पर्यावरण को हो रहे नुकसान का अध्ययन एवं जल, वायु और मिट्टी में विभिन्न प्रदूषकों से पड़ने वाले प्रभाव पर अनुसंधान भी बोर्ड लगातार करता रहता है। भोपाल गैस त्रासदी के बाद यूनियन कार्बाइड परिसर में पड़े जहरीले अपशिष्ट का परीक्षण एवं अनुसंधान के बाद इन्सीनेरेटर से निपटान किया गया।

उद्योगों को पर्यावरण रक्षा के प्रति प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से प्रत्येक वर्ष उद्योगों और खदानों को पुरस्कृत किया जाता है। बोर्ड ने प्रदेश के ई-वेस्ट को चिन्हित करते हुए इसके विनष्टीकरण के लिये एक डिसमेंटलर, एक रि-सायकलर्स का पंजीयन करते हुए 15 कलेक्शन सेंटर की स्थापना की है।

धार्मिक अवसरों पर पीओपी मूर्तियों के विसर्जन के विरुद्ध लोगों को जागरूक करते हुए उन्हें मिट्टी की प्रतिमा बनाने का प्रशिक्षण दिया गया। विसर्जन के लिये अलग से कुण्डों की स्थापना करवायी गयी। इससे इस वर्ष जल प्रदूषण में बहुत कमी आयी। प्लास्टिक के खतरों के प्रति आगाह करने के लिये एक मार्गदर्शिका सभी नगरीय निकाय को वितरित की गयी है।


सुनीता दुबे
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