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सक्सेस स्टोरीज

सामान्य बच्चों जैसा हो रहा है फ्लेसिड पीड़ित ऋषभ

भोपाल : बुधवार, दिसम्बर 20, 2017, 17:20 IST

 

बैतूल जिले के फ्लेसिड (अंगों का लुंज-पुंज होना) और मोटरडिले (विकास की धीमी गति) से पीड़ित ऋषभ के लिये राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम एक वरदान बनकर आया है। अब ऋषभ न केवल अपनी गरदन सम्हाल लेता है बल्कि वह उठ और बैठ भी सकता है। पापा-मम्मी भी बोलने लगा है। हिम्मत हार चुके माता-पिता ज्योति एवं सुखदेव महोबे को लगने लगा है कि एक दिन उनका बेटा भी सामान्य बच्चों की तरह स्कूल जा सकेगा।

बैतूल जिले के आमला सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र में जटिल प्रसव से 21 फरवरी, 2014 को जब जन्म हुआ तब वह रोया ही नहीं। चिकित्सकों ने उसे बैतूल रेफर किया जहाँ चिकित्सकों ने पाया कि वह फ्लेसिड और मोटरडिले बीमारी से ग्रसित है। ऋषभ को 15 दिन एसएनसीयू (गहन शिशु चिकित्सा इकाई) में भर्ती किया गया। ऋषभ ने रोना तो शुरू किया लेकिन उसे बहुत ज्यादा झटके आने लगे। तत्कालीन चिकित्सकों ने उस पर विशेष ध्यान दिया जिससे थोड़ा सुधार हुआ। चिकित्सकों ने परिजनों को समझाया कि बच्चा धीरे-धीरे सीखेगा और विकास की गति धीमी रहेगी। परिवार वाले एक महीने तक तो एसएनसीयू में लगातार दिखाते रहे परंतु फिर उन्होंने अस्पताल जाना छोड़ दिया।

ऋषभ सवा दो साल का हो गया और उसकी हालत में कोई सुधार नहीं आया। न वह गरदन सम्हाल पाता, न कुछ बोलता और न उठ-बैठ पाता। आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण महोबे दम्पत्ति भी उसे कहीं बाहर ले जाकर इलाज कराने में असमर्थ थे। इसी बीच मई-2016 में आमला के सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र में राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम शिविर लगा। ऋषभ के परीक्षण के बाद चिकित्सकों ने उसे डीईआईसी (जिला शीघ्र हस्तक्षेप केन्द्र) बैतूल ले जाने की सलाह दी। वे लोग बैतूल शिफ्ट हुए और उपचार के लिये रोज डीईआईसी सेंटर जाने लगे। वहाँ डॉ. आनंद गुप्ता ने ऋषभ को स्पीच थैरेपी, डॉ. सबा सक्स ने फीजियोथैरेपी और न्यूरो डेवलपमेंट और श्री कमलेश कासलेकर ने मेंटल अवेयरनेस का लगातार उपचार दिया। शुरू-शुरू में ज्योति मात्र दो घंटे के लिये ऋषभ को लेकर अस्पताल आती। उसे विश्वास नहीं था कि उसके बेटे की स्थिति में कोई सुधार होगा। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. प्रदीप मोजेस ने ज्योति को समझाया कि धैर्यपूर्वक नियमित उपचार से ही ऋषभ की स्थिति में सुधार होगा। ज्योति बच्चे को 4 घंटे रोज लाने लगी और सुधार भी दिखने लगा। इससे उत्साहित होकर ज्योति आज तक रोज बच्चे को केन्द्र में लेकर आ रही है और अब उसके चेहरे पर हताशा की जगह खुशी की मुस्कान और संतोष के भाव दिखने लगे हैं।

ज्योति कहती है मैं तो सोच भी नहीं सकती थी कि मेरा बेटा सामान्य बच्चों की तरह जीवन जीने लगेगा। इतनी बड़ी बीमारी का इलाज भी होगा। खर्च भी नहीं उठाना पड़ेगा। सेंटर में चिकित्सकों सहित पूरा स्टॉफ बहुत सहयोग कर रहा है।

सफलता की कहानी (बैतूल)


सुनीता दुबे
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