Department of Public Relation:Government of Madhya Pradesh

सावित्रीबाई फुले स्मृति दिवस 10 मार्च
ज्योतिराव के विचारों से प्रेरित थीं भारत की पहली महिला शिक्षिका
 

हम वर्तमान में 21वीं शताब्दी में हैं, लेकिन आज भी कुछ अशिक्षित लोग बेटियों को जन्म नहीं लेने देते। उन्हें पढ़ने से रोकते हैं, जिसकी वजह से समाज में महिलाओं और बालिकाओं के विकास की गति धीमी है। हालांकि हम ये भी मानते हैं कि धीरे-धीरे हमारे समाज में काफी बदलाव आये हैं, परन्तु आज भी वे महिलायें जो समाज के अन्तिम छोर पर निवासरत हैं, उनके सर्वांगीण विकास की ओर ध्यान देने की आवश्यकता है। जब आज की स्थिति ऐसी है, तो 187 वर्ष पूर्व के तत्कालीन समाज की स्थिति की कल्पना हम कर ही सकते हैं। इस समय हमारे समाज में सदियों से लैंगिक असमानता और रुढ़ीवादी पम्पराओं के कारण पिछड़ी हुई महिलाओं में शिक्षा की अलख जगाने का काम सावित्रीबाई ने किया। उन्होंने रुढ़ीवादी समाज से बिना डरें महिला शिक्षा और अधिकारों का अपना संघर्ष जारी रखा। महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगांव में एक कृषक परिवार के यहां 3 जनवरी 1831 को जन्मी महान विभूति का पूरा नाम सावित्रीबाई फुले था। उनके पिता खंडोजी पाटिल और माता लक्ष्मीबाई थीं। सन् 1840 में 9 वर्ष की आयु में ही उनका विवाह 12 वर्ष के ज्योतिराव फुले से हुआ। सावित्रीबाई और ज्योतिराव की दो संताने थी। जिसमें से यशवंतराव को उन्होंने दत्तक लिया था।

18 वर्ष की उम्र में देश की पहली बालिका पाठशाला की स्थापना की

शिक्षा की नेत्री सावित्रीबाई फुले न केवल पहली अध्यापिका और प्रधानाध्यापिका थीं अपितु वे सम्पूर्ण समाज के लिए एक आदर्श, प्रेरणा स्त्रोत, निःस्वार्थ समाज सुधारक, जागरुक और प्रतिबद्ध कवियित्री, विचारशील चितंक तथा सत्यशोधक समाज की कुशल नेतृत्वकर्ता  और महान नेता भी थीं। उनके पति, ज्योतिराव फुले से प्रेरणा पाकर वे स्वयं शिक्षित हुईं और ज्योतिराव के साथ कदम से कदम मिलाकर उन्होंने भारत में महिला शिक्षा और अधिकारो के प्रति जागरुकता लाने हेतु कई महत्वपूर्ण कार्य कियें। मात्र 18 वर्ष की उम्र में उन्होंने 1 जनवरी 1848 में पुणे के बुधवारा पेट में देश की पहली बालिका पाठशाला की स्थापना एक मराठी व्यक्ति सज्जन भिडे के यहां की। चार वर्ष में फुले दम्पत्ति 18 स्कूल विभिन्न स्थानों पर खोलने में सफल हुये। उस समय जब लड़कियों को पढ़ाना आवश्यक नहीं समझा जाता था, तब कितनी सामाजिक मुश्किलों का सामना करते हुये खोला होगा देश में एक अकेला बालिका विद्यालय। इस विद्यालय को खोलने के लिए ज्योतिराव के सहयोगी सखाराम यशवंत परांजपे और सदाशिव गोविंद हाटे उन्हें वित्तीय सहायता प्रदान करते थे।

सावित्रीबाई फुले का पूरा जीवन समाज में वंचित तबके खासकर महिलाओं के अधिकारों के लिए संघर्ष में बीता। उनकी एक बहुत ही प्रसिद्ध कविता है, जिसमें वह सबको पढ़ने-लिखने की प्रेरणा देकर सामाजिक बंधन तोड़ने की बात करती हैं :-

‘‘जाओ जाकर पढ़ो-लिखो,
बनो आत्मनिर्भर,
बनो मेहनती
काम करो-ज्ञान और धन इकट्ठा करो
ज्ञान के बिना सब खो जाता है,
ज्ञान के बिना हम जानवर बन जाते हैं।
इसलिए, खाली ना बैठो, जाओ, जाकर शिक्षा लो,
तुम्हारे पास सीखने का सुनहरा मौका है,
इसलिए सीखो और समाज के बंधन तोड़ दो।’’

सावित्रीबाई फुले उस दौर में न केवल स्वयं पढ़ीं, बल्कि अन्य लड़कियों के पढ़ने का भी बंदोबस्त किया। समाज के लोगों ने सावित्रीबाई और ज्योतिबा फुले के सामाजिक बदलाव के इन प्रयासों को रोकने के लिए कई जतन किये, ताकि सावित्री और ज्योतिबा द्वारा दी जा रही शिक्षा की ज्योति बुझ जायें। लोगों ने ज्योतिबा के पिता गोविंदराव को उनके विरुद्ध भड़काकर उन्हें घर से भी निकलवा दिया, परन्तु घर से बेघर होने के बावजूद भी सावित्री और ज्योतिबा ने हार न मानी और अपना कार्य सतत् जारी रखा।

लोगों की धमकियां करती थीं प्रोत्साहित

जब सावित्रीबाई फुले घर से बाहर लड़कियों को पढ़ाने, पाठशाला के लिए निकलती थीं तो लोग उन्हें ताने देते और गोबर-पत्थर तक फेंकते थे, परन्तु फिर भी वो डरी नहीं बल्कि वह उन्हें कहती थी कि ‘‘मेरे भाईयों आप मुझे प्रोत्साहन देने के लिए मुझ पर पत्थर नहीं फूलों की वर्षा कर रहे हैं, तुम्हारी इस करतूत से मुझे यही सबक मिलता है कि मैं निरन्तर अपनी बहनों की सेवा करती रहूं। मै तुमसे डरने वाली नहीं हूं।’’ उन्हें पहले मालूम होता था कि उनके साथ क्या होगा। इसलिए वे हमेशा अपने साथ अपने थैले में एक अतिरिक्त साड़ी रखा करती थीं, ताकि कपड़े गन्दे होने पर उसे बदलकर पाठशाला जा सकें और लड़कियाँ उनकी दुर्दशा देखकर विचलित व भयभीत न हों। इसके अलावा उन्हें रास्ते में रोक कर समाज के लोगोंे द्वारा भद्दी-भद्दी गालियाँ दी गई, अपशब्द कहें गये और उन्हें जान से मारने की धमकियाँ भी दी गईं। बालिका शिक्षा के लिए चलाए जा रहे स्कूल बंद कराने के भी अनेकों प्रयास किये गये, ताकि वे डर कर घर बैठ जायें। ऐसे ही एक बार एक बदमाश जो रोज सावित्रीबाई फुले का पीछा कर उन्हे तंग किया करता था। एक दिन वह व्यक्ति अचानक उनका रास्ता रोककर खड़ा हो गया और फिर उन पर शारीरिक हमला कर दिया, तब सावित्रीबाई फुले ने बहादुरी से उस बदमाश का मुकाबला करते हुए निडरता से उसे दो-तीन थप्पड़ जोर से मारे। एक महिला के अदम्य साहस को देखकर वह व्यक्ति शर्मसार हुआ और फिर दोबारा उनके रास्ते में नहीं आया।

तत्कालीन सरकार ने किया सम्मानित

सावित्रीबाई शिक्षण और समाज सुधार दोनों ही तरह का कार्य किया करती थीं। उन्होंने ये सभी काम विशेष रूप से ब्रिटिश कालीन भारत में महिलाओं के विकास के लिये किये और जिसके लिए उन्हें तत्कालीन सरकार द्वारा सम्मानित भी किया गया था। 19वीं सदी का समाज परम्पराओं, अंधविश्वास और रूढ़ीयों से ग्रसित था,  जिसके अनुसार महिलाओं को पुनर्विवाह की अनुमति नहीं थीं। विधवा होने के बाद उस समय महिलाओं को अपने सिर के बाल कटवाने पड़ते थे और विवशतापूर्ण अत्यंत ही साधारण जीवन व्यतीत करना  पड़ता था। सावित्रीबाई और ज्योतिराव ऐसी महिलाओं को उनका अधिकार दिलवाना चाहते थे। इसीलिए उन्होंने विधवा महिलाओं के सर के बाल कटवायें जाने की प्रथा का पुरजोर विरोध कर उस पर रोक लगवाई।
सावित्रीबाई और ज्योतिराव ने एक बच्चे को अपनाने के बाद उसे यशवंतराव नाम दिया और यशवंतराव बड़ा होकर डॉक्टर बना।

1863 में महिलाओं की सुरक्षा के लिये केन्द्र की स्थापना की

महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों को देखते हुए सावित्रीबाई और ज्योतिराव ने सन् 1863 में महिलाओं की सुरक्षा के लिये एक केन्द्र की स्थापना की, और अपने केन्द्र का नाम ‘‘बालहत्या प्रतिबंधक गृह’’ रखा। सावित्रीबाई महिलाओं की सम्पूर्ण मन, कर्म, वचन से सेवा करती थीं। ज्योतिराव के सामाजिक समता और समानता से प्रेरित विचारों का प्रभाव सावित्रीबाई पर गहरा था, इसीलिए उन्होंने कभी भी किसी भी व्यक्ति के साथ किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया। 28 नवम्बर 1890 को महात्मा ज्योतिबा फुले के निधन के पश्चात् सावित्रीबाई ने बड़ी मजबूती के साथ उनके संघर्ष की जिम्मेदारी सम्भाली।

सावित्रीबाई फुले और उनके दत्तक पुत्र यशवंतराव ने 1897 में मरीजों का इलाज करने के लिये अस्पताल खोला था। अस्पताल पुणे के हड़पसर में सासने माला में खुली प्राकृतिक जगह पर स्थित है। अपने अस्पताल में सावित्रीबाई स्वयं प्रत्येक रोगी का ध्यान रखा करती थी तथा उन्हें हर स्तर पर मदद करने का प्रयास किया करती थीं।

प्लेग से पीड़ित लोगों की पूरी तन्मयता से की सेवा

सन् 1897 में पुणे में भयंकर प्लेग रोग फैला था और इस प्लेग से पीड़ित मरीजों की पीढ़ा को सावित्रीबाई देख न सकी और पूरी तन्मयता के साथ उनके इलाज मे जुट गईं। रोगियों के इलाज के दौरान वह स्वयं ही इस भयावह बीमारी की शिकार हो गयीं और रोग ग्रस्तता के कारण 10 मार्च 1897 को उनकी मृत्यु हो गयी।

सावित्रीबाई फुले 19वीं शताब्दी की पहली भारतीय समाज सुधारक थीं और भारत में महिलाओं के अधिकारों के विकास की श्रृंखला में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा, इसीलिए वह सम्पूर्ण देश की महानायिका के रुप में जानी जाती हैं। उन्होंने समाज के हर हिस्सें, वर्ग और धर्म के लिये काम किया। समाज में उनके द्वारा किये गये सामाजिक परिवर्तन के कार्य अनुकरणीय और अविस्मरणीय हैं। किसी भी विपत्ति से बिना डरे अपने पथ पर अडिगता से चलते रहने की उनके द्वारा प्रदान की गई शिक्षा सम्पूर्ण मानव समाज को सदैव प्रेरणा प्रदान करने का कार्य करती रहेगी।