Department of Public Relation:Government of Madhya Pradesh

लगातार सीखते रहें तथा अपने सपनों को साकार करने के लिए रास्ते तलाशें

 ‘उड़ान’ स्तंभ के पिछले अंक में सर सी.वी. रमन के जीवन के बारे में जानने का हमें अवसर मिला। उनसे हमें माता-पिता की भावनाओं और इच्छाओं का सम्मान करने, मन-माफिक कार्य करने के लिए अवसरों की तलाश करते रहने, उतार-चढ़ाव के दौर में निराश न होने, धैर्य रखने, विकल्प तलाशने, मन-माफिक कार्य करने के लिए समय की ईकोनॉमी पर ध्यान देने, प्रखर अवलोकनकर्ता बनने, आइडिया को स्थापित करने के लिए गहन चिंतन व अध्ययन करने, सदैव सक्रिय रहने, प्रकृति से प्रेम करने, स्व-प्रेरित बने रहने, कठोर परिश्रम को सफलता की कुंजी मानने जैसी कई मार्गदर्शी एवं प्रेरणादायी टिप्स मिलती हैं। यहाँ मुझे जार्ज गेमौ (George Gamow ) की याद आ रही है, जिन्होंने उस समय भौतिकी के क्षेत्र में उभर रही ‘क्वांटम यांत्रिकी’ के बेहतर अनुप्रयोगों से ‘परमाणु’ की ‘नाभिकीय दुनिया’ के रहस्यों को उजागर करते हुए ‘कॉस्मोलॉजी’ तथा ‘जेनेटिक्स’ जैसे क्षेत्रों में प्रवेश कर कई मौलिक आइडिया दिये एवं क्रांतिकारी शोध-कार्य किये। आइये, अब हम देखते हैं कि किस तरह गेमौ हमारी प्रेरणा के स्रोत बनते हैं तथा मार्गदर्शन देते हैं, जो जीवन की नयी उड़ान के लिए हमें तैयार करने में सहायक सिद्ध होते हैं।
विभिन्न भाषाएं सीखें

जार्ज गेमौ के माता-पिता शिक्षक थे। उनके पिता ‘रशियन’ भाषा और साहित्य पढ़ाते थे, जबकि उनकी माता ‘भूगोल’ तथा ‘इतिहास’। उन पर इन दोनों का गहरा और सकारात्मक प्रभाव पड़ा, जो आगे चल कर अकादमिक क्षेत्र में उनकी चमक के रूप में सामने आया। बचपन से ही उनमें विभिन्न भाषाओं को सीखने के प्रति लगाव था। घर के वातावरण ने इसमें उनकी बहुत मदद की। उनके माता-पिता से उन्हें ‘रशियन’, ‘फ्रेंच’, ‘जर्मन’ तथा ‘अंग्रेजी’ सीखने में मदद मिली। यह ‘भाषाई ज्ञान’ आगे चलकर उनके बहुत काम आया जब उन्हें विभिन्न देशों में जाकर काम करने के अवसर मिले। इस तरह जार्ज गेमौ से हमें विभिन्न भाषाओं को सीखने की प्रेरणा मिलती है। हमारे देश में विभिन्न भाषाएं और बोलियाँ प्रचलन में हैं। ऐसे में जार्ज गेमौ का यह ‘भाषाई प्रेम’ हमारे लिए अनुकरणीय है।
बाधाओं के बावजूद अपने काम के सिलसिले को न थमने दें

जब गेमौ की माता का देहावसान हुआ, तब वे मात्र 9 वर्ष के थे। उनके पिता ने ही उनकी देखभाल की और उन्हें स्कूल भेजना जारी रखा। उन दिनों प्रथम विश्वयुद्ध (1914-1919) के उथलपुथल वाले और दुख भरे दिन थे, लेकिन वे कभी घबराये नहीं और अपने अध्ययन के सिलसिले को कभी थमने नहीं दिया। वैसे यह आसान नहीं था, क्योंकि वे जिस स्थानीय स्कूल में पढ़ते थे, वह बमबारी के डर से अक्सर बंद हो जाता था। इससे उनकी नियमित पढ़ाई में निश्चित बाधा आती थी, लेकिन वे इसकी पूर्ति घर पर ही स्वयं, बिना किसी की मदद के, अध्ययन कर पूरी कर लेते थे। इस तरह बाधाओं के बावजूद अपने काम के सिलसिले को न थमने देने की प्रेरणा हमें उनसे मिलती है।
धैर्य के साथ प्रकृति का निरीक्षण करें और अपने कैरियर की राह खोजें

जार्ज गेमौ के 13वें जन्मदिवस पर उनके पिता ने उन्हें ‘एस्ट्रॉनामिकल टेलीस्कोप’ (खगोलीय दूरदर्शी) उपहार में दिया। गेमौ इसे पाकर रोमांचित हो गए। लेकिन यह उनके लिए उपहार में मिला मात्र खिलौना नहीं था। यह उनके लिए एक ‘टूल’ बन गया, जिसकी सहायता से वे रात में बड़े धैर्य के साथ आकाश में विचरते ‘खगोलीय पिंडों’ और ‘तारा-समूहों’ का निरीक्षण करने लगे। प्रकृति में रची-बसी इन संरचनाओं के रहस्यों को जानने में उनकी रुचि गहराने लगी। इस तरह टिमटिमाते तारों को देखते-देखते उनके रहस्यों को जानने के लिए उनके मन में ‘एस्ट्रोनॉमी’, ‘एस्ट्रोफिजिक्स’ और ‘ऑप्टिक्स’ (प्रकाशिकी) के प्रति आकर्षण बढ़ने लगा और धीरे-धीरे इन विषयों से प्यार हो गया। इस प्यार ने उन्हें ‘वैज्ञानिक’ बनने के सपने को देखने में मदद की। वैसे भी पहले से ही उन्हें ‘गणित’ तथा ‘विज्ञान’ से लगाव था। अब अपने मन-पसंद क्षेत्र में वैज्ञानिक बनने के सपने को पूरा करने के लिए उन्हें ‘एडवांस्ड मैथेमैटिक्स’, ‘डिफरंशियल इक्वेशंस’ तथा ‘थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी’ सीखने को प्रेरित किया। उनकी आगे की गतिविधियों में उनका यह अध्ययन बहुत सहायक बना।  
सपने को साकार करने के लिए समुचित कदम उठाएं

अपने किशोर-वय् में देखे गये सपने को साकार करने के लिए गेमौ ने विचार-पूर्वक ‘भौतिकी’ पढ़ने का निश्चय किया और इसके लिए उन्होंने उस समय के श्रेष्ठ और जाने-माने ‘लेनिनग्रेड विश्वविद्यालय’ (University of Leninigrad ) में प्रवेश लिया। यहाँ उन्होंने विशेष रूप से ‘ऑप्टिक्स’ तथा ‘कॉस्मोलॉजी’ का गहराई से अध्ययन किया। सौभाग्य से यहाँ उन्हें प्रोफेसर अलेक्जेंडर फ्रिडमैन (Alexander Friedmsnn ) मिले। फ्रिडमैन वह वैज्ञानिक थे, जिन्होंने आईंस्टीन की ‘जनरल थ्योरी ऑफ रिलेटिविटि’ को आधार बना कर ‘ब्रह्माण्ड’ के विभिन्न ‘मॉडल’ विकसित किये थे। इनमें से एक ‘प्रसरणशील ब्रह्माण्ड’ भी था। फ्रिडमैन और उनके शोध-कार्यों से गेमौ बहुत प्रभावित हुए। वे उनके निर्देशन में पीएच.डी. के लिए अपना शोध-कार्य करना चाहते थे, लेकिन उनके असामयिक निधन के कारण यह संभव नहीं हो सका। हालांकि आगे चलकर फ्रिडमैन के इसी मॉडल को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने ‘हॉट बिगबैंग सिद्धांत’ को विकसित किया। इस तरह अपने सपने को साकार करने के लिए गेमौ से हमें बहुत सोच-विचार कर कदम उठाने की प्रेरणा मिलती है।
अपने आधार को मजबूत बनाने के लिए प्रतिभाशाली दोस्तों का साथ चुनें

‘लेनिनग्रेड विश्वविद्यालय’ में ‘सैद्धांतिक भौतिकी’ में रुचि रखने वाले लेव लैण्डाव (Lev Landau ) डमिट्री इवानेंको (Matvey ) तथा मटवे ब्रोंश्टीन (ग्ठ्ठद्यध्ड्ढन्र् एद्धदृदद्मण्द्यड्ढत्द) जैसे प्रतिभाशाली दोस्तों से मिल कर उनकी अकादमिक ‘कम्पनी’ बनी। इन दोस्तों के साथ वे अक्सर उस समय उभर रही ‘क्वांटम यांत्रिकी’ पर चर्चा और चिंतन करते। यह वह समय भी था, जब इर्विन श्रोडिंगर (कद्धध्र्त्द च्ड़ण्द्धदृड्डत्दढ़ड्ढद्ध), वर्नर हैजनबर्ग (ज़्ड्ढद्धदड्ढद्ध क्तड्ढत्द्मड्ढदडड्ढद्धढ़), पाल डिरॉक (घ्ठ्ठद्वथ् क़्त्द्धठ्ठड़) तथा मैक्स बॉर्न (ग्ठ्ठन् एदृद्धद) जैसे वैज्ञानिक इस नयी ‘यांत्रिकी’ को गढ़ रहे थे। गेमौ स्वयं बहुत कल्पनाशील युवा थे। वे नये विचारों का स्वागत करने वाले तथा पुराने किसी विचार से बंधे होने के ‘पूर्वाग्रह’ से मुक्त थे। आगे चलकर जिस ‘क्वांटम यांत्रिकी’ के अनुप्रयोगों ने उन्हें विश्व-प्रसिद्ध वैज्ञानिक बनाया, उसकी गहरी समझ उन्हें उनके दोस्तों के साथ लगातार हुई चर्चा और चिंतन के कारण मिली थी। इस तरह आगे बढ़ने के लिए आवश्यक ‘आधारों’ को मजबूत बनाने के लिए हमें उनसे ‘प्रतिभाशाली दोस्तों’ का ‘साथ’ चुनने की प्रेरणा मिलती है।
अपने परिवेश पर नज़र रखें तथा अपनी प्रतिभा को दिखाने के लिए रास्ते तलाशें

जिस समय गेमौ ने ‘शोध की दुनिया’ में कदम रखा, उस समय वैज्ञानिकों की रुचि ‘रेडियोएक्टिविटि’ की प्रक्रिया को समझने में थी। यह एक ‘नाभिकीय प्रक्रिया’ है, जो ‘रासायनिक अभिक्रियाओं’ से भिन्न होती है। इस प्रक्रिया में कुछ ‘विशिष्ट परमाणुओं’ के ‘नाभिक’ (जैसे, यूरेनियम) स्वयमेव अल्फा, बीटा अथवा गामा कणों को उत्सर्जित करते हुए अपनी अवस्था को परिवर्तित करते पाये जाते हैं। उस समय प्राप्त डाटा की ‘सांख्यिकीय व्याख्या’ अर्नेस्ट रदरफोर्ड और फ्रेडरिक सॉडी (क़द्धड्ढड्डड्ढद्धत्ड़त्त् च्दृड्डड्डन्र्) ने कर, इसे ‘एक्सपोनेशियल’ प्रकृति का दिखाया था। लेकिन, इस प्रक्रिया के दौरान मिलने वाले अल्फा कणों के उत्सर्जन (अल्फा-क्षय) को समझना वैज्ञानिकों के सामने कठिन चुनौती प्रस्तुत कर रहा था। वे यह नहीं समझ पा रहे थे कि बिना पर्याप्त ऊर्जा के आखिर ये ‘अल्फा कण’ (जो हाइड्रोजन से चार गुना भारी यानि हीलियम के नाभिक के भार के बराबर होते हैं) किस तरह नाभिक में से नाभिकीय बैरियर को पार कर पाने में स्वतः ही समर्थ हो सकते हैं? उस समय की प्रचलित ‘पारंपरिक (चिर-सम्मत) भौतिकी’ इसे समझाने में सफल नहीं हो पा रही थी। ऐसे में इस समस्या के समाधान में उनके दिमाग में नवोदित ‘क्वांटम यांत्रिकी’ आयी। इस ‘यांत्रिकी’ में ‘क्वांटम निकाय’ (अत्यंत सूक्ष्म निकाय जैसे परमाणु या नाभिक) की विभिन्न अवस्थाओं को गणितीय ‘तरंग फलन’ के माध्यम से प्रदर्शित किया जाता है। मैक्स बॉर्न ने ‘तरंग फलन’ की व्याख्या ‘प्रायिकता’ (घ्द्धदृडठ्ठडत्थ्त्द्यन्र्) के रूप में की थी। गेमौ यहाँ चिंतन के लिए रुके और सोचने लगे कि इसका मतलब तो हुआ कि ‘चिर-सम्मत भौतिकी के अनुसार ‘असंभव’ दिखाई देने वाली घटना भी क्वांटम यांत्रिकी के अनुसार असंभव नहीं होती’। इस निहितार्थ के दिमाग में आने के बाद उन्हें ‘अल्फा-क्षय’ को समझने में ‘क्वांटम यांत्रिकी’ का अनुप्रयोग करना उपयोगी नज़र आने लगा। उन्होंने इस घटना के घटित होने की ‘प्रायिकता’ की गणना की तथा बता दिया कि कम ऊर्जा होने के बावजूद ‘अल्फा कण’ के ‘नाभिकीय बैरियर’ को पार कर बाहर निकल कर आने की ‘प्रायिकता’ पर्याप्त होती है’। इस तरह पर्याप्त ऊर्जा न होने के बावजूद, अल्फा कणों का नाभिक से निकल कर बाहर आना वास्तव में ‘क्वांटम प्रभाव’ है। इसे उन्होंने ‘सुरंगन प्रभाव’ (च्र्द्वदड्ढथ्थ्त्दढ़ ड्ढढढड्ढड़द्य) कहा। इस तरह पहेली बन रहे ‘अल्फा-क्षय’ को समझाने में वे सफल हो गये। इस शोध के दौरान उन्होंने अपनी जिस मौलिक प्रतिभा का परिचय दिया, उसने उन्हें विश्व-प्रतिष्ठित वैज्ञानिक बना दिया और इस तरह उनका बचपन का सपना साकार हो गया। यह सब उनकी समस्याओं को पहचानने तथा विज्ञान के क्षेत्र में हो रहे नवीनतम अनुसंधानों से तैयार हो रहे परिवेश पर नज़र रखने तथा अपनी प्रतिभा को दिखाने के लिए रास्तों की तलाश में लगे रहने के कारण संभव हो सका। इस तरह हमें उनसे अपने परिवेश पर नज़र रखने तथा अपनी प्रतिभा को दिखाने के लिए रास्ते तलाशते रहने का मार्गदर्शन मिलता है।
समस्याओं को देखने तथा
समझने के लिए अपने
मौलिक तरीके अपनाएं

समस्याओं को देखने तथा समझने का गेमौ का अपना तरीका था। यही कारण रहा कि जीवनभर उन्हें विभिन्न विषयों पर नवाचारी ‘आइडिया’ आते रहे। उनके पास इनकी कभी कमी नहीं रही। ‘बोहर्स इंस्टीट्यूट ऑफ थ्योरेटिकल फिजिक्स’ में फैलो के रूप में काम करते हुए उन्होंने नाभिक को ‘द्रव की बूंद’ की तरह मानने का ‘आइडिया’ दिया। उनका यह आइडिया नील्स बोहर (ग़्त्ड्ढथ्द्म एदृण्द्ध) तथा जॉन व्हीलर (ख्दृण्द ज़्ण्ड्ढड्ढथ्ड्ढद्ध) को इतना पसंद आया कि उन्होंने इसे आधार बना कर आगे चल कर ‘नाभिकीय विखंडन’ (ग़्द्वड़थ्ड्ढठ्ठद्ध ढत्द्मद्मदृद) की प्रक्रिया को समझने हेतु सिद्धांत गढ़ा। इस प्रक्रिया में ‘मंद न्यूट्रॉनों’ की बमबारी से यूरेनियम जैसे नाभिक विखंडित होकर ऊर्जा का स्रोत बनते हैं। इसके बाद वे कैम्ब्रिज स्थित ‘केवेंडिश लेबोरेटरीज’ में शिफ्ट हुए, जहाँ उन्हें अर्नेस्ट रदरफोर्ड के साथ काम करने का मौका मिला। ये वो रदरफोर्ड थे, जिन्होंने ‘अल्फा कणों के प्रकीर्णन’ का अध्ययन कर परमाणु में उपस्थित ‘नाभिक’ का पता लगाया था तथा इसके बाद ‘प्रोटॉन’ की खोज की थी। यहाँ गेमौ के मन में ‘नाभिक’ को ‘प्रोटॉन’ की सहायता से विखंडित करने का आइडिया आया और इसके लिए उन्होंने आवश्यक ऊर्जा की गणना की।
आगे चलकर जब गेमौ ‘जार्ज वाशिंगटन विश्वविद्यालय’ में प्रोफेसर बने, तो उन्होंने प्रतिभा के धनी युवा एडवर्ड टेलर को अपने यहाँ ‘फेकल्टी’ के रूप में नियुक्त किया। अब उनका ध्यान बीटा कणों के उत्सर्जन (‘बीटा-क्षय’) की प्रक्रिया को गहराई से समझने की ओर गया। उस समय ‘बीटा-क्षय’ को फर्मी द्वारा विकसित सिद्धांत के आधार पर समझा जाता था। इसके अनुसार बीटा-कण के साथ ‘न्यूट्रिनो’ नामक कण भी उत्सर्जित होता है। लेकिन, उस समय इस प्रक्रिया के सम्पन्न होने के लिए जिस ‘सिलेक्शन रूल’ (वरण नियम) को फर्मी ने खोजा था, उसमें उन्होंने कणों के ‘स्पिन’ को शामिल नहीं किया था। क्योंकि, फर्मी का मानना था कि क्षय के समय ‘बीटा-कण’ तथा ‘न्यूट्रिनो’ के ‘स्पिन’ एक दूसरे के विपरीत होते हैं, जिससे परिणामी स्पिन का मान शून्य होता है। लेकिन, प्रायोगिक परिणाम इससे मेल नहीं खा रहे थे। अतः गेमौ को इसमें ‘स्पिन’ (चक्रण) की भूमिका नज़र आई। फिर अपने इस आइडिया के आने के बाद टेलर के साथ मिल कर उन्होंने नये ‘सिलेक्शन रूल्स’ खोजे, जिन्हें उन दोनों के नाम से जाना जाता है। आगे चलकर पता चला कि उनका आइडिया सही है, क्योंकि ‘बीटा-क्षय’ की प्रक्रिया ‘क्षीण नाभिकीय अंतःक्रिया’ (ज़्ड्ढठ्ठत्त् ग़्द्वड़थ्ड्ढठ्ठद्ध क्ष्दद्यड्ढद्धठ्ठड़द्यत्दृद) से संचालित होती है, जिस दौरान कई भौतिक राशियाँ संरक्षित नहीं रह पाती हैं। ऐसे में ‘स्पिन’ पर विचार जरूरी होता है। यह सब उनके द्वारा अपनी समस्याओं को ध्यानपूर्वक देखने तथा समझने के लिए अपनाये गये मौलिक तरीकों के कारण संभव हो पा रहा था। इस तरह हमें उनसे समस्याओं को देखने, समझने तथा समाधान पाने के लिए मौलिक तरीकों को अपनाने की प्रेरणा मिलती है।
ध्यान से सोचें तथा
अंतर्संबंधों को स्थापित करें

बचपन में तारों को देखते हुए गेमौ के मन में ‘एस्ट्रोनॉमी’ के संसार में प्रवेश करने का सपना बना था। नाभिकों के अध्ययन के दौरान ‘क्वांटम यांत्रिकी’ के अनुप्रयोगों से मिली सफलता ने गेमौ को बहुत रोमांचित किया। रेडियोएक्टिविटि की प्रक्रिया के दौरान नाभिक अपना रूप बदलता है।
उदाहरण के लिए ‘बीटा-क्षय’ के दौरान ‘प्रोटॉन के न्यूट्रॉन में अथवा न्यूट्रॉन के प्रोटॉन’ में बदलने से नाभिक अपना रूप बदलता है, जिससे नये तत्व का निर्माण हो जाता है। ‘नाभिकीय रूपांतरण’ न्यूट्रॉन अथवा प्रोटॉन की अन्य नाभिकों पर बमबारी से भी होता है। इस पृष्ठभूमि में स्वयं की सोच को विकसित करते हुए अब उन्हें अपने बचपन के सपने ‘एस्ट्रोनॉमी’ की याद आई।
उन्होंने विचार किया कि किसी तारों के केंद्र में बहुत उच्च-ताप होता है जहाँ पदार्थ ‘प्लाज्मा’ अवस्था (आयनिक अवस्था) में रहता है। यहाँ आयनिक कणों के बीच लगातार टक्करें होती रहने से ‘न्यूक्लियर ट्रांसफार्मेशन’ की संभावना सदैव बनी रहती है। अतः गेमौ को तारों में विभिन्न तत्वों के निर्माण में इसकी महती भूमिका नज़र आयी। अब उन्हें लगने लगा कि तारों में उपस्थित तत्वों के निर्माण की प्रक्रिया को समझने में उनका अब तक का अर्जित ‘ज्ञान’ और ‘अनुभव’ बहुत काम आ सकता है। इस तरह अब तक ‘सूक्ष्म-जगत’ में चल रही ‘नाभिकीय प्रक्रियाओं’