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21वीं सदी की युगांतकारी खोज : गुरूत्वीय तरंग
ब्रह्माण्ड को देखने की एक सर्वथा नयी खिड़की

आज से 100 साल पहले अलबर्ट आइंस्टीन ने ‘सापेक्षता का सामान्य सिद्धांत’ (General Theory of Relativity) प्रस्तुत किया था जिससे गुरुत्वीय तरंगों की उत्पत्ति के बारे में प्रकृति के जिस रहस्य का उद्घाटन हुआ उस पर स्वयं उन्हें ही विश्वास नहीं हो पा रहा था। लेकिन तर्क से मार्गदर्शित उनका सिद्धांत इनके अस्तित्व में होने का स्पष्ट संकेत दे रहा था।

विज्ञान में सन् 1865 के बाद का समय संक्रमण का काल रहा जब विज्ञान को मार्गदर्शित करने का कार्य प्रयोगों के स्थान पर सिद्धांतों के हाथ में आ गया। आरंभ मैक्सवेल के विद्युतचुम्बकीय सिद्धांत से हुआ और इसके बाद आइंस्टीन के सापेक्षता से जुड़े दो महत्त्वपूर्ण सिद्धांत आये। इस बीच उन्होंने उद्यीपित उत्सर्जन का सिद्धांत भी प्रस्तुत किया जिसने लेसर को मूर्त रूप दिया। इसके बाद क्वांटम यांत्रिकी तथा क्वांटम फिल्ड सिद्धांत विकसित हुए। इनसे हुई भविष्यवाणियों ने प्रायोगिक भौतिकशास्त्रियों को मार्गदशित करते हुए नये प्रयोगों हेतु रास्ता सुझाना आरंभ किया। जैसे-जैसे भविष्यवाणियाँ सत्यापित होती गईं, वैसे-वैसे उनके तकनीकी अनुप्रयोगों की झड़ी लगने लगी। इनसे बीसवीं सदी और उसके बाद भौतिक प्रगति और विकास के जो रास्ते खुले, उन पर चलते हुए हमारे जीवन में आमूलचूल परिवर्तन होने लगे।

आइंस्टीन के इस सापेक्षता के सिद्धांत के अनुसार दिक् (Space) और काल (Time) आपस में गूँथे हुए हैं जो दिक्काल (Spacetime) बनाते हैं। इस तरह यह दिक्काल एक चतुर्विमीय आकाश है। सिद्धांतानुसार द्रव्यपिण्डों की अनुपस्थिति में यह सपाट चादर की तरह रहता है। लेकिन द्रव्यपिण्ड की उपस्थिति इसे विकृत करते हुए वक्र (Curved) बना देती है। इस द्रव्यपिण्ड-जन्य वक्र की त्रिज्या का संबंध पिण्ड के द्रव्यमान से होता है। ग्रेविटी इसी वक्रता का परिणाम है। हमारे सूर्य के कारण भी उसके आसपास के दिक्काल में वक्रता आ जाती है। और इसी के अनुसार पृथ्वी सूर्य के परितः घूमती है।

आइंस्टीन ने जिस सापेक्षता के सिद्धांत को गढ़ा, उसके अनुसार ‘त्वरित द्रव्यमान’ लहरें उत्पन्न करता है जिससे दिक्काल (Spacetime) में गुरुत्वीय तरंगें संचरित होने लगती हैं। यह ठीक उसी तरह से माना जा सकता है जिसतरह त्वरित आवेश से विद्युतचुम्बकीय तरंगें उत्पन्न होती हैं। अब अगर द्रव्यपिण्ड त्वरित होता है तो क्षणिक प्रभाव (transient effect) के रूप में दिक्काल में लहरें उत्पन्न होती हैं जो तरंगों के रूप में आगे बढ़ती हैं। इसे कई किलोमीटर दूर स्थापित साधारण उपकरणों से पकड़ना संभव नहीं होता। इन्हें पकड़ने के लिये अत्यंत सुग्राही उपकरणों की आवश्यकता होती है। हमारा सूर्य भी दिक्काल में वक्रता उत्पन्न करता है। दिक्काल की इस वक्रता को सबसे पहले आर्थर एडिंग्टन ने 1919 में पूर्ण सूर्यग्रहण के दिन दिखा कर आइंस्टीन के सिद्धांत की सत्यता पर मोहर लगा दी थी। लेकिन उनके सिद्धांत की एक और महत्त्वपूर्ण भविष्यवाणी ‘गुरुत्वीय तरंगों’ को देखना संभव नहीं हो पा रहा था।

हाल ही में जैसे ही इन तरंगों के खोजे जाने की घोषणा हुई, वैज्ञानिकों को करीब 407 वर्ष पूर्व सम्पन्न हुए टेलीस्कोप-आधारित गैलिलियो के उस प्रयोग की याद दिला दी जिसने विश्व को चंद्रमा के पर्वत और घाटियों के साथ ही ब्रहस्पति के चंद्रमाओं को दिखा कर आधुनिक खगोलिकी (Astronomy) की नींव रखी थी। आज इस युगांतकारी खोज से एक ऐसा दरवाजा खुला है जहां से ब्रह्माण्ड को देखने के लिये एक सर्वथा नया रास्ता निकलता है। इससे हमें ‘शुरुआती ब्रह्माण्ड’ (Early Universe), ब्लेक होल (Black Hole) तथा न्यूट्रॉन तारों (Neutrons) आदि के कई अनजाने रहस्यों को उजागर करने में सफल हो सकेंगे क्योंकि अब ब्रह्माण्ड हमसे जिन गुरुत्वीय तरंगों के माध्यम से बात कर रहा है उसे हमने समझना शुरू कर दिया है।

इस खोज के पूर्व सिर्फ प्रकाशीय संकेत ही हमारी अधिकतर खोजों के आधार रहे हैं। प्रकाशीय संकेतों के विश्लेषण से ही हमने तारों के ताप, द्रव्यमान, उपस्थित तत्व, चुम्बकीय क्षेत्र, उनके केंद्र में चल रही संलयन क्रियाओं, ब्रह्माण्ड के लगातार विस्तारित होते रहने आदि के संबंध में कई अहम् जानकारियाँ प्राप्त कीं। एक्स-रे के रूप में मिले संकेतों को समझ कर हमने पल्सार (Pusar) और न्यूट्रॉन तारों सहित कई अनोखे खगोलीय पिण्डों का पता लगाने में सफलता प्राप्त की। फिर जब सन् 1953 में न्यूट्रिनो की खोज हुई, तब हमें ब्रह्माण्ड को देखने की एक दूसरी खिडकी प्राप्त हुई। चूँकि यह पदार्थ के साथ अत्यंत ही कम अंतःक्रिया करता है अतः इससे तारों और निहारिकाओं के केंद्र में चल रही गतिविधियों की जानकारी अविलम्ब मिलने का रास्ता सुलभ हो गया जो प्रकाशीय संकेतों से कदापि संभव नहीं हो पा रहा था। विशालकाय ‘न्यूट्रिनो आब्जर्वेटरीज’ से मिले परिणामों से कई नवाचारी तकनीकी अनुप्रयोगों के लिये रास्ते खुले हैं। और, अब गुरुत्वीय तरंगों के रूप में हमें एक और तीसरी खिड़की मिली है।

गुरुत्वीय तरंगों की खोज का सिलसिला लम्बे समय से चल रहा है। वैज्ञानिकों ने ब्रह्माण्ड में बड़े तारों की मुत्यु के बाद ब्रह्माण्ड में बायनरी पल्सार जैसी संरचनाएं देखीं। इनमें एक न्यूट्रॉन तारा समीपस्थ दूसरे न्यूट्रॉन तारे के परितः चक्कर लगाता है। ऐसे ही एक पल्सार (पीएसआर 1913+16) से जब कक्षीय क्षय (Orbital decay्) देखा गया तब घटना के दौरान जबर्दस्त ऊर्जा उत्सर्जित हुई। जब इसकी गणना की गई तो वह आइंस्टीन के सिद्धांत से पूरी तरह मेल खाती हुई मिली। यह गुरुत्वीय तरंगों की उपस्थिति का अप्रत्यक्ष प्रमाण था। इस तरह हाल ही में हुई प्रत्यक्ष खोज के पूर्व इसके अस्तित्व के बारे में कोई संदेह नहीं रह गया था। इस खोज को अत्यंत महत्त्वपूर्ण मानते हुए नोबेल समिति ने इनके खोजकर्ता हल्स Hulse) तथा टेलर (Taylor) को 1993 के भौतिकी के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया। लेकिन तकनीकी अक्षमताओं के चलते गुरुत्वीय तरंगों को प्रत्यक्षतः प्राप्त करना अति दुर्ग्राह्य बना रहा।

वैज्ञानिकों ने इसके लिये अत्यंत सुग्राही प्रायोगिक व्यवस्था खड़ी करने का निर्णय लिया। इस नये विचार का आधार ‘व्यतिकरण’ (Interfrence) था। व्यतिकरण पर आधारित व्यवस्था को ‘व्यतिकरणमापी’ (Interferometer) कहते हैं। इसका उपयोग तरंगों के गुणों को माप कर विभिन्न समस्याओं के हल निकालने में किया जाता है। ‘व्यतिकरणमापी’ (इंटरफेरोमीटर) का उपयोग कर सन् 1880 के आसपास माइकल्सन और मोर्ली ने जो प्रयोग किये थे उनसे ईथर की अनुपयोगिता तथा प्रकाश के वेग के निरपेक्ष रहने का प्रमाण मिले थे। फिर सन् 1960 में प्रकाश के नये शक्तिशाली स्रोत ‘लेसर’ के आविष्कार के बाद प्रायोगिक मोर्चे पर आमूलचूल बदलाव आया। ‘इंटरफेरोमीटर’ से अध्ययन में अब लेसर प्रयुक्त होने लगा।

‘इंटरफेरोमीटर’ से प्रयोग करते समय प्रयुक्त लेसर पुंज को एक बीम-स्प्लीटर (Beam splitter) की सहायता से एक-दूसरे के लम्बवत दो भागों में बांटा जाता है। एक निश्चित समान दूरी तय कराने के पश्चात इन लेसर पुंजों को दर्पण की सहायता से परावर्तित करा कर पुनः योग करा कर ‘व्यतिकरण’ प्राप्त किया जाता है। व्यतिकरण के पैटर्न के सावधानीपूर्ण विश्लेषण से कई जानकारियाँ हासिल की जा सकती हैं।

वैज्ञानिकों ने गुरुत्वीय तरंगों का पता लगाने के लिये इस उपकरण के इस्तेमाल करने का विचार किया। उन्होंने सोचा कि इंटरफेरोमीटर में अगर एक दूसरे के लम्बवत लेसर पूंजों के रास्ते में पड़ने वाली दिक्काल की सतह सपाट है तब तो दोनों पूंज समान कला यानि फेज में आकर व्यतिकरण पैटर्न उत्पन्न करेंगे। लेकिन अगर किसी एक के रास्ते में पड़ने वाली दिक्काल की सतह गुरुत्वीय तरंगों के कारण प्रभावित होती है तो दो में से एक पुंज को अधिक दूरी तय करना पड़ेगी जिससे व्यतिकरण के समय उनमें कुछ कलांतर (Phase dirrerence) मिलेगा जिसकी जानकारी उनसे बनने वाले व्यतिकरण के पैटर्न में अवश्य ही मिलना चाहिये। उनके इस सोच का आधार आइंस्टीन का ही सिद्धांत था जो यह बता रहा था कि प्रकाश तरंगें हमेशा दिक्काल सतह को छूते हुए ही चलती हैं। वैज्ञानिकों को मालूम था कि अगर वे सफल हो गये तो गुरुत्वीय तरंगों की उत्पत्ति के स्रोत की प्रकृति सहित उसके द्रव्यमान तथा पृथ्वी से उसकी दूरी आदि की जानकारी भी प्राप्त कर सकेंगे जो ब्रह्माण्ड के गूढ़ रहस्यों को जानने में अहम् साबित होंगे। इसलिये वैज्ञानिकों ने गुरुत्वीय तरंगों की खोज के लिये ‘लेसर इंटरफेरोमीटर ग्रेविटेशनल वेव आब्जर्वेटरीज’ (LIGO) स्थापित करने का निर्णय लिया।

योजना को मूर्त रूप देने के लिये सन् 1992 में केलटेक (Caltch) के कीप थोर्न (Kip Thorne) एवं रोनाल्ड ड्रेवर (Ronald Drever) तथा एम.आय.टी. के रेनर वीस (Rainer Weiss) के निर्देशन में कार्य आरंभ हुआ। सिद्धांत आसान था लेकिन इंजीनियरिंग का कार्य आसान नहीं था। गुरुत्वीय तरंगों की तरंगदैर्य कुछ किलोमीटर से लगा कर ब्रह्माण्ड के साइज की हो सकती है तथा पृथ्वी तक पहुँचते-पहुँचते इनकी तीव्रता अत्यंत कम हो जाती है। अतः सबसे बड़ी चुनौती एक ऐसी साइट्स को चयनित करने की थी जहाँ वाहनों की आवाजाही और भूकम्पीय झटकों का न्यूनतम प्रभाव हो। इसके लिये बड़ी सावधानीपूर्वक अमरीका में 3002 किलोमीटर की दूरियों पर स्थित स्थानों, वाशिंगटन (Washington) के हेनफोर्ड (Henford) तथा लुसियाना (Lousiana) के लिविंग्स्टन (Livingston), का चयन किया गया। इसके बाद कुछ किलोमीटर लम्बी गुरुत्वीय तरंगों को माप सकने में सक्षम संसूचक की डिजाइन के लिये व्यतिकरणमापी (इंटरफेरोमीटर) की एल-आकार की भुजाओं को 4 किलोमीटर लम्बा रखा गया तथा उसमें उच्च-स्तरीय निर्वात उत्पन्न किया गया। अब संसूचक के रूप में प्रयुक्त इस इंटरफेरोमीटर की सभी व्यवस्थाओं को बड़ी कुशलता से लटकाया गया ताकि गुरुत्वीय तरंगों के अत्यंत क्षीण सिग्नल को पकड़ने में आसानी हो। सन् 1999 में इन दोनों आब्जर्वेटरीज को स्थापित करने का कार्य पूर्ण हुआ। इसके बाद इन ऑब्जर्वेटरीज से लिये जाने वाले अवलोकनों की विश्वसनीयता का परीक्षण किया गया। संतुष्ट होने के पश्चात सन् 2002 से विधिवत प्रयोग आरंभ हुए। लेकिन लगातार आठ वर्षों तक कोई सफलता हाथ नहीं लगी। ऐसे में निराश होने की बजाय वैज्ञानिकों ने इन ऑब्जर्वेटरीज को कुछ समय के लिये बंद करने का निर्णय लिया ताकि इनमें प्रयुक्त संसूचकों (Detectors) को और अधिक सुग्राही बनाने पर कार्य किया जा सके। विचार-विमर्श के पश्चात इसमें प्रयुक्त लेसर को ‘शक्तिशाली लेसर’ से प्रतिस्थापित किया गया तथा इसकी सुग्राहिता में करीब 4 गुना अधिक की वृद्धि के उपाय किये गये। अब यह बिना किसी त्रुटि के प्रोटॉन के एक हजारवें भाग तक के दूरी के अंतर को मापने में समर्थ हो गया। इससे गुरुत्वीय तरंगों के संचरण के कारण दिक्काल में आने वाले परिवर्तन को मापना पहले से अधिक सुगम हो गया। इस बार संसूचकों में गुरुत्वीय तरंगों की आवृत्ति को ध्यान में रखते हुए लीगो (LIGO) को इसतरह डिजाइन किया गया ताकि वे हमारी श्रव्य-सीमा (Aduidible Limit) में आ सकें और हम इन्हें सुन भी सकें।

फरवरी 2015 में लीगो (LIGO) का उपर्युक्त प्रगत संस्करण (Advanced Ligo) तैयार हो गया, जिसे हेनफोर्ड तथा लिविंग्स्टन में प्रतिस्थापित किया गया। इससे सितम्बर 2015 में प्रथम बार गुरुत्वीय तरंगों का संकेत प्राप्त हुआ। लेकिन, यह तुक्का भी हो सकता है। अतः घोषणा के पूर्व अवलोकनों को ठीक से जांचना-परखना जरूरी था ताकि किसी प्रकार के संदेह की गुंजाइश न रहे। वैज्ञानिकों को जब पक्का भरोसा हो गया कि उनके अवलोकन सही हैं, तब कहीं जाकर 11 फरवरी 2016 को परियोजना से संबद्ध एक हजार बारह वैज्ञानिकों ने एक शोधपत्र के माध्यम से गुरुत्वीय तरंगों के खोजे जाने की घोषणा की। यह शोधपत्र ‘फिजिकल रिव्यू लेटर्स’ नामक भौतिकी के सुप्रसिद्ध शोध जर्नल में प्रकाशित हुआ।

गुरुत्वीय तरंगों के विश्लेषण से ज्ञात हुआ कि ये तरंगें 1.3 अरब साल पहले घटी घटना के कारण उत्पन्न हुई थीं जिसके एक अत्यंत छोटे कतरे (slice) को हम पकड़ने में कामयाब हुए हैं। इस स्लाइस को ‘जीडब्ल्यू150914’ नाम दिया गया। जब इसका बारीकी से अध्ययन किया गया तो वैज्ञानिकों को पता चला कि इन तरंगों की उत्पत्ति दो ब्लेकहोल्स के टकराने से हुई है जो एक-दूसरे के परितः परिभ्रमण कर रहे थे। इनमें से एक का द्रव्यमान करीब 36 सूर्य के बराबर तथा दूसरे का करीब 29 सूर्य के बराबर था। जब उनके ‘इवेंट होराइजन’ (ब्लेक होल के परितः घिरा वह क्षेत्र जिसमें से प्रकाश सहित कुछ भी बाहर निकल कर नहीं आ सकता) एक-दूसरे को छूने लगे तब एक क्षण के लिये उग्र डगमगाहट (violent wobbling) हुई तथा इनके द्रव्यमान का पुनर्वितरण होने लगा। इससे दोनों ब्लेकहोल्स संलयित होकर एक बनने लगे तथा करीब 3 सूर्य के बराबर का द्रव्यमान गुरुत्वीय ऊर्जा में बदल कर गुरुत्वीय तरंगों के रूप में आगे बढ़ने लगा। इन तरंगों के संचरण के दौरान रास्ते में पड़ने वाला दिक्काल ‘संकुचित और विस्तारित’ होने लगा। इसी प्रभाव को लीगो (LIGO) ने पकड़ने में सफलता प्राप्त की।

लीगो की व्यवस्था ने इस घटना के दौरान निकली ध्वनि को भी सुना दिया और बता दिया कि अब तारे चुप रहने वाले नहीं हैं। अब वे दिखेंगे भी और बोलेंगे भी। अब हमारी जान सकने वाली सीमाओं से परे घट रही अगम्य घटनाओं को जानना भी संभव हो गया।

यह एक भारी सफलता है और इक्कीसवीं सदी की अब तक की सबसे बड़ी खोज है। इस खोज में किसी एक वैज्ञानिक का हाथ नहीं है। इसमें विश्वभर के चोटी के वैज्ञानिक लगे थे। भारत का योगदान भी कम नहीं है। हमारे देश के वैज्ञानिकों का आरंभिक योगदान ब्लेकहोल्स की टक्कर की सैद्धांतिक समझ को विकसित करने में रहा। जहां वर्तमान खोज की बात है इसके लिये प्राप्त सिग्नलों के विश्लेषण हेतु आवश्यक अल्गारिदम (Algarithm) को डिजाईन करने का महत्त्वपूर्ण कार्य भारतीय वैज्ञानिकों ने किया। ज्ञातव्य हो कि हमारे देश के भौतिकशास्त्री ‘आयुका’ (Inter-University Centre for Astronomy and Astrophysics) के प्रोफेसर संजीव धरूंधर ने सबसे पहले सुझाव दिया था कि गुरुत्वीय तरंगों की मदद से ब्लेकहोल को संसूचित किया जा सकता है। उन्होंने इस महत्त्वाकांक्षी परियोजना से जुडे कई शोध समूहों का नेतृत्व भी किया जिन्हें इन ऑब्जर्वेटरीज से प्राप्त डाटा पर आधारित सिद्धांतों पर कार्य करना था। हमारे देश की नामी संस्था ‘रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट’ के बाला अय्यर और फ्रांस के वैज्ञानिकों ने मिल कर ब्लेकहोल तथा न्यूट्रॉन तारों से उत्सर्जित होने वाली गुरुत्वीय तरंगों की गणना की। हमारा देश ने इस परियोजना पर कार्य करने के लिये सन् 2009 में ‘इंडिगो’ (Indigo यानि Indian Initiative in Gravitational Observatories) स्थापना की। इसमें देश की नामी संस्थाओं यथा, टीआयएफआर, आयपीआर, आयुका, आरआर केट, आइआइएसईआर के करीब 60 वैज्ञानिक शामिल हैं। वर्तमान में सम्पन्न हुए प्रयोग के लिये ‘इंडिगो’ ने कई महत्त्वपूर्ण टास्क पूरे किये हैं। इनमें विभिन्न सिग्नलों के लिये लीगो की संवेदनशीलता का अध्ययन, ब्लेकहोल की गतिकी तथा टक्कर के समय ब्लेकहोल से उत्सर्जित ऊर्जा का विश्लेषण आदि शामिल हैं।

अब आगे का रोडमैप तैयार है। ‘लीगा’ की ही तरह भारत में भी एक ऑब्जर्वेटरी के निर्माण का कार्य प्रगति पर है जो वर्तमान में संचालित अमरीका की ऑब्जर्वेटरीज के साथ मिल कर कार्य करेगी। इटली और जापान भी इस दिशा में सक्रिय हैं। इनके साथ ही एक अति महत्वाकांक्षी परियोजना लीसा (Laser Interferometer Space Antenna) पर कार्य चल रहा है।

आशा है कि अब हमें वे जानकारियाँ मिलने लगेंगी जिसको अब तक मान चुके थे कि इन्हें प्रकृति हमारे साथ बाँटना नहीं चाहती हैं। लेकिन गुरुत्वीय तरंगों की खोज ने हमारी इस धारणा को निर्मूल साबित कर दिया है क्योंकि ब्लेक होल से प्रकाश तो बाहर नहीं आ सकता लेकिन गुरुत्वीय तरंगों के लिये कोई रुकावट नहीं है। चूँकि हम गुरुत्वीय तरंगों को पकड़ने में कामयाब हो गये हैं तथा हम ब्रह्माण्ड की तरंगों के रूप में लिखी और बोली इन नई भाषा को पढ़ने और समझने लगे हैं, अतः इस सदी में हमारे सामने ब्रह्माण्ड के बारे में कई रहस्योद्घाटन होने जा रहे हैं।