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बंगलौर
स्थित
इंडियन
इंस्टीट्यूट
ऑफ साइंस (आईआईएस)
के एक शोध
में 23
अगस्त को
दावा किया
गया है कि
ग्रीन
इंडिया
मिशन से
ग्रीनहाउस
गैस के
उत्सर्जन
में कमी
उससे कहीं
अधिक हो
सकती है
जितना
पहले
अनुमान
लगाया गया
था। इस शोध
के अनुसार
यह गैस
उत्सर्जन
में कमी का
आंकड़ा
अनुमान से
चार
प्रतिशत
तक अधिक हो
सकता है।
पर्यावरण
और वन
मंत्रालय
के 'ग्रीन
इंडिया
मिशन' के
तहत
अनुमान
लगाया गया
था कि देश
में होने
वाले
वनारोपण
से ग्रीन
हाउस
गैसों के
उत्सर्जन
में 6.4
प्रतिशत
तक की कमी
होगी जबकि
नया शोध
कहता है कि
वास्तव
में यह कमी
10.5 प्रतिशत
तक हो सकती
है।
हालांकि
अभी इस शोध
की
समीक्षा
की जा रही
है उसके
बाद इसे
आईआईएस की
पत्रिका 'करेंट
साइंस' में
प्रकाशित
किया
जाएगा। 'ग्रीन
इंडिया
मिशन' भारत
सरकार की
योजना है
जिसके तहत
देश में एक
करोड़
हैक्टेयर
क्षेत्रफल
में
वनारोपण
का
कार्यक्रम
है ताकि
पेड़
पर्यावरण
में मौजूद
कार्बन को
अवशोषित
कर लें।
इससे
कार्बन और
ग्रीन
हाउस
गैसों के
उत्सर्जन
में कमी
आने की
उम्मीद की
जा रही है।
ये मिशन
अभी जनता
के
परामर्श
के लिए रखा
गया और अभी
लागू नहीं
किया गया
है। इस
मिशन में 44,000
करोड़
रुपए खर्च
होने का
अनुमान
है। अगर ये
नए आंकड़े
सही निकले
तो भारत के
कार्बन
उत्सर्जन
में काफी
कमी आ सकती
है।
शोधकर्ता
का कहना है
कि 2005 को अगर
आधार वर्ष
माना जाए
तो साल 2020 तक
ग्रीन
हाउस
गैसों में
20 से 25
प्रतिशत
तक आसानी
से कम किया
जा सकेगा।
उल्लेखनीय
है कि
दिसंबर 2009
में
कोपेनहेगन
में हुए
जलवायु
सम्मेलन
से पहले ही
भारत 2020 तक 20
प्रतिशत
कार्बन
उत्सर्जन
कम करने का
भरोसा दे
चुका है।
यह शोध
आईआईएस के
प्रोफेसर
एनएच
रविंद्रनाथ
के
प्रतिनिधित्व
में किया
गया है।
उनका
कहना है कि,
"कार्बन
दो तरह से
जमा होता
है। एक तो
कार्बन
लकड़ी में
और जड़ों
में जमा
होता है
जिसे जमीन
के ऊपर का
जैव ईंधन
कहते हैं
या फिर
मिट्टी के
अंदर
कार्बन
जमा होता
है। सरकार
ने जो
अनुमान
लगाए हैं।
वह सिर्फ
जमीन के
ऊपर के जैव
ईंधन के
आधार पर
लगाए हैं।"
सरकार ने
वर्ष 2020 के
लिए 'मिटिगेशन
पोटेंशियल'
का अनुमान
1.5 प्रतिशत
लगाया है
जबकि
प्रोफेसर
रविंद्रनाथ
का कहना है
कि उनके
मॉडल के
अनुसार ये
अनुमान 6.4
प्रतिशत
होना
चाहिए। 'मिटिगेशन
पोटेंशियल'
ग्रीनहाउस
गैस के
उत्सर्जन
को काबू
में करने
की क्षमता
होती है
जिसे
कोमैप नाम
के मॉडल से
नापा जाता
है। 'ग्रीन
इंडिया
मिशन' के
तहत
अनुमान
लगाया गया
है कि एक
करोड़
हैक्टेयर
में
वनारोपण
किए जाने
से नए
जंगलों
मेंे
कितना
कार्बन
जमा होगा
और इससे
भारत का
उत्सर्जन
कितना कम
हो पाएगा।
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