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केंद्रीय
वित्त
मंत्री
प्रणव
मुखर्जी
ने भारतीय
उद्योग
जगत से
वादा किया
है कि
सरकार
डायरेक्ट
टैक्स कोड
(डीटीसी)
के
संशोधित
प्रारूप
के साथ
सामने
आएगी। उसे
भी अंतिम
रूप देने
से पहले
उनकी राय
ली जाएगी।
फिक्की,
सीआईआई और
एसोचैम
आदि
औद्योगिक
संगठनों
के
संयुक्त
तत्वाधान
में 27
फरवरी को
नई दिल्ली
में
आयोजित
कार्यक्रम
में प्रणब
ने कहा कि
डीटीसी के
प्रारूप
में काफी
बदला किया
गया है।
यही
प्रारूप
जनता की
राय जाने
के लिए
सामने
लाया जाने
वाला है।
उन्हांेने
कहा कि
सरकार
अगले साल
व्यक्तिगत
करदाता की
बचत की
सीमा
बढ़ाने के
लिए
उद्योगों
से सलाह
चाहती है।
उसकी
योजना एक
लाख रुपये
तक की बचत
को कर के
दायरे से
बाहर रखा
जाएगा।
इसके
अतिरिक्त
इंफ्रास्ट्रक्चर
बांडों
में 20,000
रुपये तक
के निवेश
की आजादी
होगी।
ज्ञातव्य
है कि
सरकार ने
अगले साल
अगस्त में
1961 के आयकर
अधिनियम
की जगह
डीटीसी का
प्रारूप
चर्चा के
लिए पेश
किया था।
उद्योगों
ने इसके
प्रावधानों
के साथ मेट
की गणना के
तरीके पर
भी चिंता
जताई थी।
इसी को
ध्यान में
रखते हुए
वित्त
मंत्री ने
कहा कि
डीटीसी को
कानूनी
रूप
उद्योग
जगत की
प्रतिक्रिया
जानने के
बाद ही
दिया
जाएगा।
सरकार
मानसून
सत्र में
डीटीसी
विधेयक
लेकर
सामने आ
सकती है।
इसके बाद
विचार
विमर्श के
लिए इसके
स्टैंडिंग
कमेटी के
पास भेजा
जाएगा।
उन्होंने
भरोसा
जताया कि
संसद के
शीतकालीन
सत्र तक
स्टैंडिंग
कमेटी की
रिपोर्ट
मिल
जाएगी।
इसके
तुरंत बाद
से अंतिम
मंजूरी के
लिए संसद
में पेश
किया
जाएगा।
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पीपीएफ
भी कर के
दायरे
में |
ये
हैं
आपत्तियां |
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बचत
के लिए
डीटीसी
में
ईईटी (एक्जेंप्ट,
एक्जेंप्ट
टैक्स)
का मॉडल
अपनाया
जाएगा।
इसके
मायने
हैं सभी
प्रकार
की बचत
को केश
कराने
के अवसर
पर
टैक्स
लगेंगे।
ऐसा
होता है
तो
पीपीएफ
जैसे
सुरक्षित
निवेश
के
विकल्प
भी कर के
दायरे
में आ
जायेंगे।
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होम
लोन क
रीपेंट
पर मिल
रही
वर्तमान
छूट का
क्या
होगा।
इस बारे
में कुछ
भी नहीं
कहा गया
है।
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डीटीसी
के
अनुसार
किसी
कंपनी
पर मेट
कंपनी
के
अर्जित
मुनाफे
पर नहीं,
बल्कि
उसकी
ग्रॉस
एसेट पर
लगाया
जाना
चाहिए।
औद्योगिक
संगठनों
का कहना
है कि यह
प्रोडक्टिव
एसेट्स
पर
वेल्थ
टैक्स
लगाने
जैसा ही
है।
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आम
बजट में
मेट को 15
फीसदी
से
बढ़ाकर 18
फीसदी
कर दिया
गया है।
उद्योग
जगत
चाहता
है कि
शुल्क
बढ़ोतरी
वापस ली
जाए।
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