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समुद्र
तल में जो
जीवाश्म
चिन्ह
मिलते हैं,
वे शायद
विशालकाय
अमीबाओं
की करतूत
हैं। ऐसे
अमीबा 1.8
अरब वर्ष
पूर्व
समुद्र के
पेंदे में
रहा करते
थे। यहां
विशालकाय
शब्द का
प्रयोग
सिर्फ
आजकल के
अन्य
अमीबाओं
को देखते
हुए किया
जा रहा है।
हाल
ही में
टेक्सास
विश्वविद्यालय
के मिखैल
मैट्ज ने
बहामास के
समुद्र की
छानबीन
करते हुए
अमीबा की
एक नई
प्रजाति
की खोज की
है। इस
प्रजाति
को
ग्रोमिया
स्फेरिका
नाम दिया
गया है।
अंगूर की
साइज का यह
अमीबा जब
समुद्र के
पेंदे पर
लुढ़कता
है, तो यह
मिट्टी को
निगलता है
और वापिस
थूकता है।
इस
प्रक्रिया
में यह
अपने पीछे
क्यारियां-सी
छोड़ता
जाता है।
प्राचीन
काल के
कीचड़ में
भी इस तरह
की
क्यारियां
मिलती हैं
जो पुरा-जीव
वैज्ञानिकों
को चक्कर
में डालती
रही हैं।
वैज्ञानिकों
का मानना
था कि इस
तरह की
क्यारियां
बनाने की
क्षमता
सिर्फ कुछ
बहु-कोशिकीय
जंतुओं
में रही
होगी, जो
करीब
साढ़े
बावन
करोड़ साल
पहले,
कैम्ब्रियन
युग में
रहे
होंगे।
मगर इस तरह
के जीवों
के कोई
जीवाश्म
नहीं मिले
हैं जो इन
क्यारियों
से मेल
खाएं।
इसकी
व्याख्या
के लिए यह
सोचा गया
कि शायद ये
जीव
मुलायम
शरीर वाले
रहे होंगे,
जिनके
जीवाश्म
आमतौर पर
नहीं
मिलते या
बहुत कम
मिलते
हैं। मगर
इस
सिद्धांत
में एक
दिक्कत यह
भी थी कि
ये
क्यारियां
बहु-कोशिकीय
जीवन के
विकास से
पूर्व की
हैं।
मैट्ज
को लगता है
कि यह जो
समुद्री
अंगूर
मिला है,
इस तरह के
जीव के
पूर्वज इन
क्यारियों
के
निर्माण
के लिए
जवाबदेह
हो सकते
हैं।
मैट्ज का
तो कहना है
कि
कैम्ब्रियन-पूर्व
युग से
सम्बन्धित
किसी भी
जीवाश्म
चिन्ह को
सिद्धांतत:
तो आप
प्रोटोजोआ
जीवों के
मत्थे मढ़
सकते हैं।
और यहां तो
आपको एक
वास्तविक
जीव मिल भी
गया है जो
ऐसी करतूत
कर सकता
है।
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