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एक
हैरतअंगेज़
घटना
सुनिए।
जून 2007 में
एक
मॉकिंगबर्ड
एक महिला
डाकिए को
लगातार
तीन
सप्ताह
परेशान
करती रही।
घटना साउथ
गैरी
प्लेस,
टुल्सा,
ओक्लाहामा,
यूएसए की
है। घटना
असाधारण
इसलिए है
कि जहां
कुत्तों
के बारे
में तो
मशहूर है
कि वे
डाकियों (महिला-पुरुष
दोनों) के
बारे में
चिंतित
रहते हैं,
मगर एक
पक्षी, वह
भी नन्ही-सी
मॉकिंगबर्ड
ने न सिर्फ
इस महिला
डाकिए को
पहचाना
बल्कि
उसका पीछा
भी करती
रही।
एक
प्रयोग
व्यक्ति
विशेष को
पहचानना
कोई
असाधारण
घटना नहीं
है, यह बात
हाल ही में
किए गए एक
वैज्ञानिक
प्रयोग से
ज़ाहिर
होती है।
शहरों में
रहने वाली
मॉकिंगर्बड्स
जल्दी ही
मनुष्यों
को
पहचानना
सीख लेती
हैं। हाल
ही में डॉ.
डगलस जे.
लेवी और
उनके
साथियों
द्वारा
प्रकाशित
एक शोध
पत्र का
विषय यही
है।
प्रयोग
के तहत एक
ही इन्सास
को चार दिन
तक रोज़
विश्वविद्यालय
परिसर में
बने
मॉकिंगबर्ड
के घोंसले
के साथ
छेड़छाड़
करना था।
मॉकिंगबर्ड
ने शोरगुल
मचा दिया,
उस इन्सान
पर हमला
करने को
झपटी और हर
दिन उस पर
झपटती
रही। और हर
दिन वह तभी
हमला करने
की कोशिश
करती जब वह
महिला
घोंसले से
पहले दिन
की
अपेक्षा
ज़्यादा
दूरी पर
होती। मगर
पांचवें
दिन जब एक
अलग
व्यक्ति
घोंसले के
नज़दीक
आया तो
मॉकिंगबर्ड
ने ठीक वही
व्यवहार
किया जो
उसने पहले
दिन पहले
व्यक्ति
के साथ
किया था।
और वही
मॉकिंगबर्ड
उस चौराहे
से
गुज़रते
सैकड़ों
अन्य
राहगीरों
को लेकर
सहज थी,
बशर्ते कि
उसके
घोंसले से
पर्याप्त
दूरी पर
रहें।
ये
परिणाम
दर्शाते
हैं कि एक
आम शहरी
पक्षी,
मॉकिंगबर्ड,
जल्दी से
मनुष्यों
को
पहचानना
सीख लेते
हैं।
व्यक्ति
विशेष
द्वारा
घोंसले के
साथ 30-30
सेकंड की
दो
छेड़छाड़
इसके लिए
पर्याप्त
होती हैं।
शोधकर्ता
इस अध्ययन
के आधार पर
एक
सामान्य
निष्कर्ष
निकालते
हैं: ʅशहरी
पक्षी आम
तौर पर
प्रजनन
में उच्च
सफलता
हासिल
करते हैं
हालांकि
शहरी
आबादी में
घोंसले के
शिकारियों
की तादाद
ज़्यादा
होती है।
हमारा मत
है कि
मॉकिंगबर्ड
की
अनुभूति
और तेज़ी
से सीखने
की क्षमता
उन्हें नए
पर्यावरण
में सफलता
के लिए
तैयार
करती हैं।
अर्थात
हमने
जितना
समझा था,
पक्षी
उससे
ज़्यादा
होशियार
होते हैं।
कैम्ब्रिज
विश्वविद्यालय
के डॉ.
नाथन जे.
एमरी
पक्षियों
की
अक्लमंदी
पर शोध
करते रहे
हैं। इस
विषय को
उन्होंने
संज्ञानात्मक
पक्षी
विज्ञान
नाम दिया
है अर्थात
पक्षियों
में
बुद्धि का
विकास और
सिर्फ
मॉकिंगबर्ड
से
प्रभावित
होना
पर्याप्त
नहीं है।
एमरी
बताते हैं
कि पक्षी
दृश्य
छवियों के
बीच भेद
करने में
असाधारण
रूप से
कुशल होते
हैं।
कबूतर
हवाई
चित्रों,
मनुष्यों,
पेड़ों और
पानी,
कुर्सियों,
कारों,
व्यक्तियों
फूलों और
निश्चित
रूप से
कबूतर की
छवियों के
बीच भेद कर
सकते हैं।
एक
शोधकर्ता
डॉ. वाटनबे
का तो दावा
है कि
कबूतर
पिकासो,
सोनेट,
चगाल और
गॉग की
पेंटिंग्स
को भी अलग-अलग
पहचान
लेते हैं।
फिर
अफ्रीकी
भूरा तोता
है जिसका
नाम
एलेक्स
है। वह
वैज्ञानिकों
के बीच
बहुत
मशहूर है।
वह तो अलग-अलग
आकृतियों
व
पदार्थों
से बनी
लगभग 100
वस्तुओं
को पहचान
लेता था (जी
हां हाल ही
में उसकी
मृत्यु हो
गई।)
एरिज़ोना
विश्वविद्यालय
की डॉ.
आइरीन
पेपरबर्ग,
जिन्होंने
उसका
अध्ययन
किया था,
ने एलेक्स
के अध्ययन
: भूरे
तोतों की
संज्ञान व
संप्रेषण
क्षमताʆ
शीर्षक से
एक पूरी
किताब
लिखी है।
हालांकि
पक्षी
बुद्धि
सम्बंधी
अधिकांश
अध्ययन
कबूतरों,
तोतों,
मुर्गियों
और बटेरों
पर किए गए
हैं मगर
इनमें भी
ज़्यादा
ध्यान
कौओं और
तोतों को
मिला है।
इसका कारण
यह
आश्चर्यजनक
तथ्य है कि
इन
पक्षियों
का अग्र
मस्तिष्क
साइज़ में
लगभग
बंदरों और
वनमानुषों
के बराबर
होता है।
एमरी
बताते हैं
कि यह तथ्य
पक्षियों
के अग्र
मस्तिष्क
पर एक नई
रोशनी
डालता है।
पक्षी
व्यवहार
को
सामाजिक
इकॉलॉजिकल
समस्याओं
का समाधान
करने हेतु
अनुकूलन
के रूप में
देखा जा
सकता है।
यह लगभग
स्तनधारियों
के समकक्ष
है। उनका
हार्डवेयर
(यानी भेजा)
अलग है
हालांकि
यह भी उसी
तरह की
संरचना से
विकसित
हुआ है।
पेपरबर्ग
का कहना है
कि यदि
स्तनधारियों
के दिमाग
आईबीएम
पीसी जैसे
हैं तो
पक्षियों
के दिमाग
एपल
मैकिंटोश
के समान
हैं। इन
दोनों में
वायरिंग
और
प्रोसेसिंग
अलग-अलग है
मगर अंतिम
आउटपुट (यानी
व्यवहार)
एक जैसा
है।
प्रमुख
बात
प्रमुख
बात यह है
कि सिर्फ
दिमाग की
साइज़ को न
देखा जाए।
इसकी बजाय
ज़्यादा
उपयोगी
नाप दिमाग
की साइज़
और शरीर की
साइज़ का
अनुपात (भेजा-शरीर
अनुपात)
होगा। इसी
अनुपात के
आधार पर हम
समझ सकते
हैं कि
क्यों
नन्हे
चूहे लगभग
हमारे
बराबर
होशियार
हो सकते
हैं, या यह
क्यों कहा
जाता है कि
चिंपैंज़ी
लगभग 6
वर्ष के
बच्चे के
बराबर
बुद्धिमान
होता है।
इसमें
कोई संदेह
नहीं कि
मस्तिष्क
के अंदर के
विभिन्न
घटक भी
काफी
महत्वपूर्ण
होते हैं।
इसी के
आधार पर
प्रजातियों
के बीच
अंतर पैदा
होते हैं।
जैसे गाने
वाले
पक्षियों
और कौओं के
बीच या
बटेर और
मुर्गियों
के बीच।
नसीहत
विडंबना
यह है कि
इन
अध्ययनों
से नसीहत
यह मिलती
है कि किसी
व्यक्ति
को ʅबर्ड-ब्रेन्डʆ
यानी
पक्षी-बुद्धि
कहना अब
कोई अपमान
नहीं
बल्कि
तारीफ है।
इसका एक
उदाहरण यह
है कि
चिम्पैंज़ी
के समान
कौए भी सहज-भौतिकी
का उपयोग
करते हैं
और औज़ार
बनाते
हैं। यह
बात
सर्वविदित
है कि कौए
हुकनुमा
टहनी की
मदद से
पेड़ों के
सुराखों
में
इल्लियां
निकाल
लेते हैं।
एक कौए का
नाम बेटी
था जिसका
अध्ययन
ऑक्सफोर्ड
विश्वविद्यालय
के
वैज्ञानिकों
ने किया
था। यह कौआ
तो एक तार
से हुक बना
लेता था और
गिलास के
पेंदे में
रखे मांस
के टुकड़े
को उससे
उठा लेता
था।
अगली
बार जब आप
पंचतंत्र,
जातक
कथाएं या
इस तरह की
कहानियां
पढ़ेंगे
तो आपको यह
याद करके
मज़ा आएगा
कि कथा और
तथ्य काफी
करीब हो
सकते हैं।
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