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कई
लोग ऐसा
मानते हैं
कि यदि कोई
मुश्किल
निर्णय
लेने की
नौबत आ जाए,
तो रात भर
की नींद के
बाद सुबह
आप बेहतर
निर्णय कर
पाते हैं।
इसके पीछे
सोच यह है
कि हमारा
मस्तिष्क
दो तरह से
सोचता है-
एक तो चेतन
ढंग से (यानी
जब हम
जानबूझकर
किसी विषय
पर विचार
करते हैं)
और दूसरा
अचेतन ढंग
से जब हम
किसी और
काम में
लगे होते
हैं और
मस्तिष्क
हमारे
जाने बगैर
सोचता
रहता है।
कुछ लोग यह
भी मानते
हैं कि
अचेतन सोच
हमें
बेहतर
निर्णय की
ओर ले जाता
है।
जैसे
कुछ
वर्षों
पहले
एम्सटर्डम
विश्वविद्यालय
के
शोधकर्ताओं
द्वारा एक
प्रयोग
किया गया
था जिसमें
कुछ
वालंटियर्स
को कार का
चुनाव
करना था।
इन सबको
कुछ कारें
दिखाई गईं
और उनकी
खूबियां
बताई गईं।
इतना होने
के बाद
इन्हें दो
उपसमूहों
में बांट
दिया गया।
एक
उपसमूह को
यह कहा गया
कि अच्छे
से सोच
विचार कर
कार का
चुनाव
करें।
दूसरे
उपसमूह को
कुछ
मुश्किल
पहेलियां
करने को दे
दी गईं
ताकि वे
जानबूझकर
सोच विचार
न कर पाएं।
कुछ समय
बाद इन
सबसे कार
चुनने को
कहा गया।
यह देखा
गया कि जो
उपसमूह
पहेली
छुड़ाने
में लगा था
उसने
बेहतर
खूबियों
वाली
कारों का
चुनाव
किया था।
इसके आधार
पर
निष्कर्ष
निकाला
गया कि
अचेतन सोच
आपको
बेहतर
निर्णय की
ओर ले जाता
है (क्योंकि
ऐसा माना
गया कि
पहेली में
भिड़े लोग
अचेतन ढंग
से सोच रहे
थे)।
कुछ
अन्य
विद्वानों
को इस
निष्कर्ष
पर संदेह
था। तो
उन्होंने
एक अन्य
प्रयोग
रचा। एक
प्रयोग
एथेन्स के
ओहायो
विश्वविद्यालय
के समूह ने
किया था।
उनका
विचार था
कि
एम्सटर्डम
प्रयोग
में
वास्तव
में हुआ यह
था कि
पहेली
उपसमूह ने
कारों को
देखते ही
जो निर्णय
ले लिया था
वही
उन्हें
बाद में भी
याद रहा
जबकि
दूसरे
उपसमूह ने
बहुत सोच
विचार
करके अपना
निर्णय
बदला जो
प्रथम
दृष्टि
निर्णय से
बदतर
साबित
हुआ। इस
परिकल्पना
की जांच के
लिए
उन्होंने
उपरोक्त
प्रयोग को
थोड़ा अलग
ढंग से
किया।
अंतर
यह था कि
वालंटियर्स
को कारों
की
खूबियां
बताते हुए
कहा गया कि
वे उन्हें
याद कर
लें। इस
तरह से
उन्हें
तत्काल
निर्णय
करने से
दूर रखने
में मदद
मिली। अब
कुछ समय
बाद उस
उपसमूह का
निर्णय
बेहतर
साबित हुआ
जिसने सोच
विचार
किया था।
यानी इस
बार पहेली
उपसमूह
फिसड्डी
साबित
हुआ।
इसी
प्रकार का
एक प्रयोग
बेल्जियम
के
ब्रसेल्स
विश्वविद्यालय
के एक समूह
ने किया
जिसमें
कारों की
बजाय मकान
के बारे
में
निर्णय
करना था और
यह समूह भी
इसी
निष्कर्ष
पर पहुँचा
कि सोचकर
निर्णय
लेने वाले
बेहतर
निर्णय
करते हैं।
मगर
किस्सा
अभी पूरा
नहीं हुआ
है।
एम्सटर्डम
समूह का मत
है कि इस
बीच
उन्होंने
कुछ और
प्रयोग
किए हैं
जिनसे
उनके
अचेतन सोच
की धारणा
की पुष्टि
होती है।
वे जल्दी
ही इनका
प्रकाशन
करेंगे।
तो जहां
कुछ लोग
अचेतन सोच
की धारणा
को ही
निरस्त
करते हैं
वहीं कई
मनोविज्ञानी
मानते हैं
कि अचेतन
सोच
ज़्यादा
परिष्कृत
सोच का
द्योतक
है।
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