News Search   ¨ÉÖJªÉ {ÉÞ¹` | ºÉÉ<] ¨Éä{É | ºÉ¨{ÉEÇò Eò®ä | +ÆOÉäVÉÒ ¨Éå näùJÉå | ºÉƺEÞòiÉ ºÉ¨ÉÉSÉÉ®ú: | =nÚÇ ºÉ¨ÉÉSÉÉ®ú | ¨ÉÖJªÉ {ÉÞ¹` ¤ÉxÉÉBäÆ
 
  iÉlªÉ ®úÉVªÉ{ÉÉ±É ¨ÉÖJªÉ¨ÉÆjÉÒ ¨ÉƇjÉ{ɇ®ú¹Énù ®úÉVªÉ Eäò +ÆMÉ ¨É.|É. xÉÒ‡iÉ ºÉÆOɽ +¤É iÉEò
+ÉVÉ Eäò ºÉ¨ÉÉSÉÉ®ú
+ÉVÉ EòÉ ¡ Éä]Éä ºÉÆOɽþ
‡VÉ›Éä E Ò JɤɮäÆ
º´ÉÌhÉ¨É ¨É.|É. ‡xɨÉÉÇhÉ EòÉ ºÉÆEò±{É
¨ÉÖJªÉ¨ÉÆjÉÒ Eäò {ÉÉÄSÉ ´É¹ÉÇ
xÉMÉ®úÒªÉ ‡xÉEòÉªÉ ‡xÉ´ÉÉÇSÉxÉ-2009
±ÉÉäEòºÉ¦ÉÉ ‡xÉ´ÉÉÇSÉxÉ-2009
‡´ÉvÉÉxɺɦÉÉ ‡xÉ´ÉÉÇSÉxÉ-2008
www.mpnewsarch.org
¨ÉvªÉ|Énäù„É ºÉ¨¨ÉÉxÉ
¨ÉvªÉ|Énäù„É MÉÉxÉ
¨É.|É. ¨Éå ‡GòªÉÉÎx´ÉiÉ ¨É½þi´É{ÉÚhÉÇ ªÉÉäVÉxÉÉBÆ
¨ÉvªÉ|Énäù„É ¤ÉVÉ]õ
±ÉÉäEò ºÉä´ÉÉ ‡´ÉvÉäªÉEò
{ÉjÉEòɇ®úiÉÉ {ÉÖ®úºEòÉ®ú
‡´ÉYÉÉ{ÉxÉ
+É+Éä ¤ÉxÉɪÉå +{ÉxÉÉ ¨ÉvªÉ|Énäù„É
¨ÉÖJªÉ¨ÉÆjÉÒ EòÒ {ÉÆSÉɪÉiÉå
Eò¨ÉÇ EòÒ nùÒ{ɇ„ÉJÉÉ
=xÉEòÉ ¦ÉÒ Eò½þxÉÉ ½èþ
EòÉä]ÂõºÉ £òÉì¨É nù |ÉäºÉ
+ÉMÉä +ɪÉå ±ÉÉ¦É =`öɪÉå
|ÉEòÉ„ÉxÉ
VÉxɺɨ{ÉEÇ ‡´É¦ÉÉMÉ
‡´É¦ÉÉMÉÒªÉ ´ÉÉ̹ÉEò |É„ÉɺɇxÉEò |ɇiÉ´ÉänùxÉ
+SÉ±É ºÉÆ{ɇkÉ EòÉ ‡´É´É®úhÉ
´ÉÒ‡b÷ªÉÉä ºÉÆOɽ
‡´ÉEòÉºÉ Mɇiɇ´É‡vɪÉÉÄ
¦ÉÉ®úiÉ {É´ÉÇ (MÉhÉiÉÆjÉ ‡nù´ÉºÉ : 2008)
+‡vɨÉÉxªÉiÉÉ ‡xɪɨÉ
ºÉÆSÉÉ®ú |ɇiɇxɇvÉ Eò±ªÉÉhÉ ºÉ½þɪÉiÉÉ ‡xɪɨÉ
ºÉ¡ò±ÉiÉÉ EòÒ Eò½þÉxÉÒ
VÉxÉºÉÆ{ÉEÇò ‡´É¦ÉÉMÉ 17 ‡¤ÉxnÖ ¨ÉèxªÉÖ+±É
‡´ÉYÉÉ{ÉxÉ ºÉÆ¤ÉÆvÉÒ ‡xÉªÉ¨É 2007
ºÉ½þɪÉEò ±ÉÉäEò ºÉÚSÉxÉÉ +‡vÉEòÉ®úÒ/+{ÉÒ±ÉÒªÉ |ÉɇvÉEòÉ®úÒ
ºÉÚSÉxÉÉ Eäò +‡vÉEòÉ®ú
Eò±ÉÉ B´ÉÆ ºÉƺEÞò‡iÉ 
ºÉ½Úþ‡±ÉªÉiÉå
¨É.|É. ¨ÉÉvªÉ¨É
+‡vɺÉÚSÉxÉÉ (ºÉÚSÉxÉÉ Eäò +‡vÉEòÉ®ú)
<¨ÉäVÉ ¤ÉäªÉÉäxb÷ nù ºÉ¡æòºÉ
Eèò±Éähb÷®ú
bÉ=xɱÉÉäb νxnÒ ¡ Éäx]
<Ç - ¨Éä±É
xÉÉMɇ®úEò {ÉjÉEòɇ®úiÉÉ (+É{ÉEòÉ {ÉzÉÉ)
xÉÉMɇ®úEò {ÉjÉEòɇ®úiÉÉ
ºÉÖZÉÉ´É ¦ÉäVÉå
xÉ´ÉÒxÉ ºÉÚSÉxÉÉBÆ
PÉ]õxÉÉGò¨É
VÉxɺɨ{ÉEÇò ¨ÉÆjÉÒ ¸ÉÒ ±ÉI¨ÉÒEòÉÆiÉ „ɨÉÉÇ EòÉ ®úÉVªÉÉå Eäò ºÉÚSÉxÉÉ ¨ÉƇjɪÉÉå Eäò ºÉ¨¨Éä±ÉxÉ ¨Éå ºÉÆ¤ÉÉävÉxÉ
EäòxpùÒªÉ ¨ÉƇjÉ{ɇ®ú¹Énù Eäò ºÉnùºªÉÉå EòÒ ºÉÚSÉÒ









विज्ञापन



न्यूज क्लिपिंग्स



सफलता की कहानी

नरेगा के तालाब से तस्वीर ही बदल गई है काश्तकारों की

शहडोल: सोमवार, 29 मार्च , 2010

वर्षा पर निर्भर रहने के कारण सिर्फ धान की आधी-अधूरी फसल पर गुजारा करने वाले शहडोल जिले के विभिन्न क्षेत्रों के काश्तकार आज गेहूँ की भरपूर पैदावार लेकर मालामाल हो रहे हैं। नतीजतन इन क्षेत्रों में गेहूँ के रकबे में दो सालों में चार गुना बढ़ोत्री हो चुकी है।

वास्तव में इन क्षेत्रों के अधिकांश किसान पारंपरिक रूप से बारिश के पानी के भरोसे मुश्किल से धान ही पैदा कर पाते थे और उसके बाद शेष समय में आजीविका के लिए दूसरों के यहां मजदूरी करते थे। राज्य सरकार के जल संसाधन विभाग ने फसलों की उत्पादकता बढ़ाने के मकसद से गेहूं सहित अन्य फसलों की असीम संभावनाओं का दोहन करने के लिए जिले के गोहपारू, बुढ़ार, जयसिंहनगर, ब्यौहारी, सोहागपुर जनपद के कुछ क्षेत्रों में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारन्टी योजना (नरेगा) के तहत 2728.76 लाख रूपये की लागत से 67 तालाबों का निर्माण कराया इनसे सिंचाई के लिए नहरों का जाल बिछाया गया।

जिले के इन क्षेत्रों में गेहूं की वास्तविक खेती को दो साल पहले अपनाया गया है। यहां सिंचाई का रकबा 2 हजार 198 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला है। आज वे तीन फसलें ले रहे हैं। गेहूं की फसल लेने का प्रभाव यह हुआ कि इस क्षेत्र के काश्तकारों की जीवन शैली में तेजी से व्यापक परिवर्तन आ रहा है। गेहूं के सहारे से दांव खेलकर अब खेतों में जहां दूसरों को काम दिया जा रहा है, वहीं आवास निर्माण और अच्छे ब्रंड के कपड़े एवं अन्य सामान की तरफ भी किसानों ने कदम बढ़ाए हैं। किसान को समझ नहीं आ रहा है कि गेहूं के कारण उसके रूके सारे काम एक ही झटके में पूरे हो गये। अब उसके पास कहीं कोई तंगी नहीं है।

जिले के कई हिस्सों में किसान की जीवन रेखा बन चुके नरेगा तालाब की बदौलत किसानों के जीवन स्तर में भी तेजी से बदलाव आ रहा है। सिंचाई से कई फसलों के मूल्य में यह तेजी किसान पर हर तरह से प्रभावकारी हो रही है। पहलीबार किसानों व परिवारजनों के रहन-सहन व जीवनशैली में परिवर्तन आया है। इन नरेगा तालाबों की सिंचाई से जुड़े काश्तकारों की देखादेखी यहां के अन्य किसानों ने भी गेहूं की पैदावार लेने की सोची। आज तमाम हिस्सों के किसान बड़े पैमाने पर गेहूं की खेती कर रहे हैं। यही बजह है कि जिले की जरूरत को यहां का गेहूं पूरी कर रहा है। वाकई तालाबों से सिंचाई की वजह से ली जानेवाली गेहूं व अन्य फसलों ने कई किसानों की जिन्दगी बदल दी।

इसे धनगवां के युवा कृषक अकालदास यादव से अधिक भला कौन जानता है। मौसम के चक्र के मुताबिक अकालदास मुख्य रूप से धान की फसल अपने खेतों में बड़ी मुश्किल से उपजा पाते थे और इसके लिए उन्हें पानी की समस्या से जूझना पड़ता था। धान की फसल बोने की तैयारी पानी बरसने पर ही शुरू हो पाती थी। उनके घर में साल में एक बार ही धान की फसल कटाई के बाद पैसा आता था। बाकी महीनों में उनके पास पैसे का अकाल बना रहता था। दो साल पहले उन्होंने नरेगा तालाब से सिंचाई की बदौलत गेहूं की फसल ली, तो मानो चमत्कार हो गया। धान की पैदावार भी बढ़कर दो गुनी हो गई थी। आज वह 5 एकड़ में धान एवं 6 एकड़ में गेहूं और 20 डिसमिल में सब्जी की जबरदस्त पैदावार ले रहे हैं और दूसरों को अपने खेतों में काम दे रहे हैं। अकालदास को खेती-किसानी का जुनून है। उनने मछली उत्पादन की योजना भी बना ली है। अकालदास का कहना है कि सिंचाई से फसलों का सीजन लाटरी की तरह आया, जो सब की इच्छाओं पूर्ति कर गया। भवन निर्माण और मोटर पंप की खरीद के साथ ही बाजार का उधार भी चुका दिया है। लड़के के ब्याह शादी की तैयारी चल रही है।

भोगड़ा गांव के तीस वर्षीय बाबू सिंह तालाब की सिंचाई से चार एकड़ जमीन में धान एवं गेहूं की ठेके पर खेती कर रहे हैं। नरेगा तालाब की ठेका खेती बहुत तेज गति से बढ़ी है। तीस-चालीस काश्तकार इससे जुड़े हैं। बाबू सिंह का कहना है कि पहले मजदूरी के लिए काम की तलाश में इधर-उधर जाना पड़ता था। नरेगा तालाब ने हालात बदल दिए हैं। उन्होंने मजदूरी के काम से मुंह मोड़ लिया है। भोगड़ा गांव के ही मइकू पानी की समस्या के कारण पहले धान की पैदावार ही मुश्किल से ले पाते थे। आज धान, गेहूं, सब्जी तीन फसलें ले रहे हैं। मइकू बताते है कि पहले कई दफा फांकाकशी करनी पड़ती थी। पर अब पहले जैसे हालत नहीं रहे। अब कहीं मजदूरी करने भी नहीं जाना पड़ता।

नरेगा तालाबों के कारण तीन फसलें लेने की खुशी में किसानों के परिवारों में खुशियां झलक रही हैं। इनकी कटाई के बाद ही जरूरत के सामान खरीदने का मौका मिलता है। इन तालाबों से जुड़े काश्तकारों में ज्यादातर आदिवासी वर्ग के हैं। पहले बरसात से धान की फसल लेने के बाद शेष महीने खेत खाली पड़े रहते थे। पर आज रबी में चारों ओर खेतों में गेहूं ही गेहूं नजर आती है। तीन फसलें और भरपूर पैदावार की कमाई से पहली बार किसानों व परिवारजनों के रहन-सहन व जीवन शैली में परिवर्तन आया है।

जे.पी. धौलपुरिया

पिछला पृष्ठ मुख्य पृष्ठ

Copyright © 2006 Department of Public Relations. All rights reserved, Disclaimer, Privacy Policy
Site Designed and Maintained by CRISP, Bhopal, (M.P.) INDIA