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सफलता की कहानी

पुलों से बदल रही है आदिवासियों की जीवन धारा

शहडोल : 28 अगस्त, 2010

शहडोल जिले के बुढ़ार विकास खण्ड में दो नवनिमिर्त पुलों की वजह से इस विकास खण्ड के करीब पचास गांवों में बसे पच्चीस-तीस हजार से ज्यादा आदिवासियों के जीवन की धारा बदल रही है। इस इलाके को जनकपुर (छत्तीसगढ़) से सीधे जोड़ने के लिए आदिवासियों की जीवन रेखा बन चुके इन पुलों की बदौलत इलाके के आदिवासियों की दिनचर्या में तेजी से बदलाव आ रहा है।

कुल एक करोड़ 16 लाख 18 हजार रूपये की लागत के इन दोनों पुलों के निर्माण का कार्य राज्य सरकार के लोक निर्माण विभाग ने हाथ में लिया था। इन पुलों से आदिवासी समुदाय के सुगम आवागमन की रफ्तार में तेजी आई है। इस इलाके से अनूपपुर या जनकपुर जाने के लिए रास्ते में एक नदीं और दो नाले पड़ते हैं, जिन पर एक भी पक्का पुल नहीं था। इस आदिवासी बहुल इलाके के लोगों का अनूपपुर और जनकपुर इलाके में रोटी-बेटी का संबंध बना हुआ है, लिहाजा उनका उस इलाके में प्राय: आना-जाना लगा रहता है। ग्राम खाम्हीडोल के नजदीक कसेड़ नदी पर पुल बन जाने से अब इस रास्ते पर रात्रि 11 बजे तक ग्रामीणों की आवाजाही बनी रहती है। पहले शाम आठ बजे से ही आवाजाही बंद हो जाया करती थी, क्योंकि नदी के बीच से होकर गुजरना पड़ता था और रात्रि में नदी में भालू पानी पीने आते हैं, जिनसे जान को खतरा बना रहता था।

इस पुल की वजह से लोगों को जनकपुर तक बारह घंटे की यात्रा नहीं करनी पड़ती, बल्कि अब चार घंटे का ही सफर रह गया है। खाम्हीडोल के पूर्व सरपंच श्री बारेलाल का कहना है, ' पहले बरसात में नदी के पानी से लबालब भरजाने के कारण रास्ता जाम हो जाता था। जो लोगबाजार में बेचने के लिए साइकिल पर सब्जी एवं दूध ढोकर ले जाते थे, उनका काम बंद हो जाता था और उनके सामने जीविकोपार्जन की समस्या पैदा हो जाती थी। अब पुल के कारण शहडोल जिले के करीब पचास गांव और छत्तीसगढ के पच्चीस गांव इस मार्ग से जुड़ गये हैं।'

कोटरी गांव के मध्य में स्थित करिया नाला पर भी पुल बन चुका है। पहले स्कूल पहुंचने के लिए बच्चों को इस नाले को पार करना पड़ता था। लेकिन बरसात में वे स्कूल नहीं जा पाते थे। और तो और, बारिश में नाला पार करते समय मवेशी बह जाते थे। नाले में उफान आने पर दूध वाले बाजार दूध बेचने नहीं जा पाते थे। मन मारकर उन्हें घरों में रूकना पड़ता था। गांव के पंच श्री सनई प्रसाद बताते हैं, ' बरसात में बीमार व्यक्तियों के तो जीवन पर ही बन आती थी। उन्हें अस्पताल नहीं ले जा पाते थे। विवश होकर नीम-हकीमों की शरण लेनी पड़ती थी। उनके लिए तो पुल जीवनदायिनी है। पुल बन जाने से तो मोटरसाइकिलें भी सरपट दौड़ रही हैं।  चार-पांच घंटे में जैतपुर पहुंचने का सफर अब दो घंटे तक सिमट गया है।'

इन गांवों की बस्तियों में रहने वाले हजारों लोग पहले बरसात में नदी और नालें में उफान आने के कारण काम पर नहीं जा पाते थे। लेकिन आज इन्हीं पुलों की बदौलत वे बरसात में भी कमाई कर रहे हैं। अब बरसात के सीजन में भी हमेशा लोगों की आवाजाही लगी रहती है। कल तक जिनके लिए नदी-नाले परेशानी का सबब थे, आज उन पर बने पुल उनके लिए वरदान बन गये हैं। इन पुलों के अतिरिक्त बिछली नाला पर 63.75 लाख रूपये लागत के एक और पुल के निर्माण पर अभी काम चल रहा है। इसके बन जाने के बाद तो टैफिक की अधिकता और बढ़ जायेगी। लोक निर्माण विभाग के कार्यपालन यंत्री श्री आर. के व्यास का कहना है, ' आदिवासी बहुल क्षेत्रों में राज्य सरकार पुल-पुलियों के निर्माण पर विशेष ध्यान दे रही है, ताकि लोगों का आवागमन सुगम हो सके। अभी दो पुलों से ही ग्रामीण काफी सुकून महसूस कर रहे हैं।' श्री व्यास बताते हैं, ' तीसरा पुल बिछली नाले पर निर्माणाधीन है। इसके बन जाने के बाद तो ग्रामीण जनजीवन में और अधिक बदलाव नजर आयेगा।

जे.पी. धौलपुरिया

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