बदलते
दौर में
महिलाएं
घर
गृहस्थी
के दायरे
से निकलकर
रोजगार
क्षेत्र
में भी जगह
बना रही
हैं। समय
के साथ-साथ
महिलाओं
ने आज हर
क्षेत्र
को अपना
कार्यक्षेत्र
बनाने का
प्रयास
किया है।
महिलाएं
खेतों में
काम करने
से लेकर
मकान
बनाने तक
में हमेशा
बराबरी से
सब काम
करती हैं।
कुछ
ऐसी ही
स्थिति हो
गई है
प्रदेश के
शहडोल
जिले के
आदिवासी
बहुल छतवई
क्षेत्र
में फैले
कालीन और
दरी बुनाई
के कार्य
में लगी
आदिवासी
महिलाओं
की। ये
महिलाएं
भी हमेशा
कोई घरेलू
काम धंधा
करना
चाहती थीं,
पर उन्हें
यह मौका तब
मिला, जब
राज्य
सरकार के म.
प्र.
हस्तशिल्प
एवं
हथकरघा के
मैदानी
अमले
द्वारा
उन्हें
कालीन और
दरी का
प्रशिक्षण
देकर इनका
उत्पादन
करने को
कहा गया।
उन्होंने
तुरंत इसे
करने की
ठान ली। इन
महिलाओं
ने दरी और
कालीन का
प्रशिक्षण
लिया। आज
करीब तीन
सौ
आदिवासी
महिलाएं
कालीन और
दरी बुनाई
का काम
करती हैं।
इनके
हाथों की
बनी दरी और
कालीन आज
भोपाल
सहित
दिल्ली,मुंबई
एवं गोवा
तक के
बाजारों
में बिकती
हैं।
शुरू-शुरू
में जब ये
आदिवासी
महिलाएं
प्रशिक्षण
लेने जाती
थीं, तो लोग
उन्हें
ताज्जुब
से देखते
थे कि आखिर
ये
महिलाएं
क्या
वास्तव
में दरी व
कालीन
बुनना सीख
पाएंगी, पर
उन्होंने
इस बात को
झुठला
दिया।
सारे
पुरूषों
के बीच
उन्होंने
अपनी
दक्षता
दिखाई।
उन्हें
लगता था कि
अगर वे
मेहनत
करेंगी, तो
जरूर सफल
होंगी।
इसी
सिलसिले
में
उन्होंने
खूब मेहनत
की और आज
उनकी बनाई
हुई
दरियां और
कालीन
लोगों के
बीच बिक
रही हैं।
जिसका
सपना
उन्होंने
देखा और
उसमें
सफलता
पाईं।
म.प्र.
हस्तशिल्प
और हथकरघा
ऐसी
आदिवासी
महिला
उद्यमियों
को आगे
लाने के
लिए काफी
कोशिश कर
रहा है।
उन्हें
मंच
प्रदान
करता है,
उन्हें
प्रशिक्षण
तथा
प्रशिक्षण
के दौरान
भत्ता
देता है और
कच्चा माल
और माल
खरीदने की
भी उन्हे
सुविधा
प्रदान
करता है,
ताकि वे
आगे आएं और
अपनी
इच्छाओं
को
मूर्तरूप
दे सकें।
सपनों
से सुन्दर
आशियाने
की चाहत हर
कोई करता
है और इसकी
सुन्दरता
में चार
चांद
लगाती हैं
शानदार व
आकर्षक
दरी एवं
कालीन। घर
की साज-सज्जा
बढ़ाने में
नई तकनीक व
मॉर्डन
लुक वाले
कालीन व
दरी को
संवारने
में इन
आदिवासी
महिलाओं
का कौशल
देखते ही
बनता है।
कम आय
वालों में
दरी की
डिमांड
ज्यादा है,
जिनका
मल्टीपल
उपयोग
किया जा
सकता है।
दरी बुनाई
में दक्ष
सिन्दुरीभर्री
की
श्रीमती
रामकली
बैगा कहती
हैं, ''यह
काम पेट
पालने के
लिए सीखा
है। इसमें
अच्छी
कमाई होने
की आस थी।''
इसी गांव
की
श्रीमती
सियाबाई
बताती हैं,
''इसमें
जितनी
मेहनत
करेंगे,
उतनी कमाई
भी होगी।''
आर्थिक
निर्भरता
प्राप्त
होने पर ये
महिलाएं
परिवार पर
आश्रित
नहीं हैं।
मजे की बात
यह है कि ये
कामकाजी
महिलाएं
कार्यक्षेत्र
एवं घर
दोनों जगह
काम करते
हुए कुशल
भूमिका
निभा रही
हैं। अपने
बच्चों की
परवरिश वे
कुशलता से
करने में
सक्षम
हैं। उनकी
कमाई से
उनका घर
अच्छी तरह
चल रहा है।