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सफलता की कहानी

तालाबों ने बदल दी है आदिवासियों की किस्मत

शहडोल : 22 सितम्बर, 2010

शहडोल जिले के जयसिंहनगर ब्लाक में चार गावों में बसे डेढ़ हजार से ज्यादा आदिवासियों ने अपने खेतों की सिंचाई के लिए जो सपना देखा था, वह मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान की पहल के फलस्वरूप दो बड़े तालाबों की वजह से हकीकत में बदल गया है। इन तालाबों के प्रभाव से इन आदिवासी किसानों की जीवन शैली में तेजी से व्यापक परिवर्तन आ रहा है। अब वे तीज-त्यौहारों और ब्याह-शादी में खुलकर खर्च कर रहे हैं।

दो साल पहले ग्राम अटरिया एवं बिनैका में बने एक-एक तालाब से सिंचाई के लिए पानी मिलना शुरू हुआ और इस अल्प अवधि के भीतर ही आदिवासी बहुल क्षेत्र में हो रहे जल संग्रहण ने खेतों में सिंचाई व्यवस्था को सुनिश्चित करने की दिशा में बढ़ते हुए विकास की नई इबारत लिखी है। इस इलाके के अटरिया, वैरिहा, बिनैका एवं बसनगरी के सैकड़ों लोग पहले रोजी-रोटी के लिए दूसरों के यहां दिहाड़ी मजदूरी करते थे, उनके पास जमीन तो थी, लेकिन पानी नहीं था। वर्षा पर निर्भर रहने के कारण सिर्फ कोंदों-कुटकी की ही फसल ले पाते थे।

ये काश्तकार अपने खेतों की प्यास बुझाने के लिए पानी का स्थाई इंतजाम होने का सपना देखा करते थे कि तभी 26 जनवरी 2007 को शहडोल जिले में सम्पन्न हुए जनदर्शन कार्यक्रम में मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने अटरिया में करीब डेढ़ करोड़ रूपये लागत के और बिनैका में करीब दो करोड़ रूपये लागत के तालाब का निर्माण कराने की घोषणा की। इस पर अमल करते हुए राज्य सरकार के जल संसाधन विभाग ने दो साल पहले ही इनका निर्माण कराया है। आज इन्हीं तालाबों की बदौलत वे हर साल मोटी रकम कमा रहे हैं। कल तक दूसरों के यहां मजदूरी करने वाले आज अपने यहां दूसरों को मजदूरी दे रहे हैं। वे धान, गेंहूं, चना, मक्का, अरहर, सरसों आदि की भरपूर पैदावार लेकर मालामाल हो रहे हैं। मवेशियों के पीने के पानी की किल्लत भी दूर हो गई है।

अटरिया तालाब से आदिवासियों के साथ-साथ कई पिछड़े वर्ग के काश्तकार भी अपना जीवन संवार चुके हैं। इन इलाकों में काश्तकारों की जीवन रेखा बन चुके इन दोनों तालाबों ने इलाके के लोगों की जिन्दगी बदल दी है। अटरिया क्षेत्र में काश्तकारों ने दो साल में कई बार सोना भी खरीदा है। फसलों का धन आते ही उन्होंने मकान का निर्माण कराया है और मोटर साइकिलें खरीदी है। एक घर में दो-दो मोबाइल हो गये हैं। पहली बार किसानों व परिवारजनों के रहन-सहन व जीवन शैली में परिवर्तन आया है। उनके बच्चे महंगे ब्रांड के कपड़े, जूते, और लड़कियां जीन्स पहन रही हैं। वास्तव में यह सब करिश्मा साल में तीन फसलों के दाम का ही है। तालाब की बदौलत अटरिया के कुछ काश्तकार तो गर्मी के मौसम में भी धान की फसल उगाते हैं। तालाब खेतों के उन हिस्सों में बनाए गये हैं, जहां बरसात में पानी अपने आप जमा हो जाता है। इनके इर्दगिर्द नहरें खोदी गई हैं । इन तालाबी सिंचाई योजनाओं से इलाके में जल स्तर बढ़ाने में मदद मिली है। इनकी नहरों ने जल स्तर बढ़ाने में प्रमुख भूमिका निभाई है।

बसनगरी गांव के अस्सी वर्षीय किसान गंगादीन का कहना है ''पहले बरसात में सिर्फ कोंदो-कुटकी की फसल ले पाते थे। हमें आजीविका के लिए दूसरों के यहां मजदूरी करने जाना पड़ता था। सिर्फ त्यौहारों पर गेंहूं का स्वाद लेने के लिए ब्यौहारी जाकर दो-चार किलों गेंहूं लाना पड़ता था। आज धान, गेंहूं, चना, मटर, तिल, मक्का, सब्जी, अरहर की फसल ले रहे हैं। आज हम हर तरह का भोजन कर रहे हैं। तालाब से मवेशियों के पीने के लिए पानी की व्यवस्था हो गई है। साल में तीन फसले लेने से ग्रामीणों की गांठ में चार पैसे हो गये हैं।

 

जेपी धौलपुरिया/आर.एस. पाराशर

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