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सफलता
की कहानी
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मनरेगा
से आई
बैडियांव
में
हरियाली
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विकलांगों
को भी
मिला
योजनांतर्गत
कार्य
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खंडवा
: 13 अगस्त, 2010
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वृक्षारोपण
कार्य
वर्तमान
परिस्थितियों
में सबसे
अधिक
महत्व का
कार्य बन
गया है
परंतु
केवल पौधो
को रोप
देना ही
वृक्षारोपण
की सफलता
नहीं है
वरन उन
पौधों को
हर विषम
परिस्थितियों
में जीवित
रख कर एक
वृक्ष का
रूप धारण
करवाना ही
सफल
वृक्षारोपण
है। खंडवा
जिले की
अधिकतर
पंचायतों
में पौधों
को रोपकर
उनकी
उत्तरजीविता
को
पूर्णतः
सुनिश्चित
किया गया
है।
महात्मा
गांधी
राष्ट्रीय
रोजगार
गारंटी
योजना
अंतर्गत
पूर्व में
किए गए
वृक्षारोपण
कार्य के
सुखद
परिणाम
ग्रामपंचातों
में सामने
आने लगे
हेै। ऐसी
ही एक
पंचायत है
खण्डवा
जनपद
पंचायत की
ग्राम
पंचायत
बैडियांव
जहां न
केवल
मनरेगा
अंतर्गत
पौधरोपण
किया गया
बल्कि उन
पौधों को
जीवित
रखने का हर
संभव
प्रयास भी
किया गया
है। इन
वृक्षारोपण
कार्यो की
एक
विशेषता
यह भी है कि
इन कार्यो
में गांव
की
महिलाओं
तथा
विकलांगो
को मनरेगा
अंतर्गत
अधिक से
अधिक
कार्य
दिया गया
है।
ग्राम
पंचायत
बैडियांव
में शमशान
घाट के पास
वर्ष 2006-07 में
2600 पौधों का,
वर्ष 2007-08 में
1960 पौधों का
रोपण किया
गया एवं
वर्ष 2008-09 में
1000 पौधे
रोपित
किये गये
है।
वर्तमान
में यह सभी
पौधे
वृक्ष का
आकर लेने
लगे है
इनमें
आवंला, नीम,
सूबबूल,
करंज आदि
के साथ 800
सीताफल के
पौधे भी
लगाये गये
है। इस
पौधरोपण
के बाद
बैडियांव
में वर्षो
से वीरान
पड़ी
शमशानघाट
वाली भूमी
बैड़ियांव
का सबसे
सुंदर
स्थान बन
गयी है।
मनरेगा
अंतर्गत
किये गये
इन
पौधरोपण
कार्यो
में कुल 11038
मानव दिवस
सृजित कर
गांव के
मजदूरो को
लगभग 823819 रू
मजदूरी का
भुगतान
किया गया
है।
मनरेगा
बनी
विकलागों
का सहारा
महात्मा
गांधी
राष्ट्रीय
रोजगार
गारंटी
योजना
जहां
ग्रामीण
परिवारों
को एक वर्ष
में 100 दिवस
का रोजगार
प्रदान
करके
गांवों
में
रोजगार का
सशक्त
जरिया बनी
है वही
बैडियांव
में
मनरेगा
गांव के
विकलांग
व्यक्तियों
के लिए भी
उनकी
अजीविका
का
महत्वपूर्ण
जरिया
साबित हुई
है। गांव
के
विकलांग
बंशीलाल
पिता
सुखलाल,
दिनेश
आशाराम,
सुभद्राबाई
पति दिनेश
तीनों ही
पैर से
विकलांग
है। पूर्व
में इनके
पास
अजीविका
का कोई
निश्चित
साधन नही
था । इन सभी
को मनरेगा
अंतर्गत
हुए
वृक्षारोपण
कार्य
मंें
पौधों को
रोपने
उनकी
निंदाई-गुडाई
जैसे कम
महनत के
कार्य
दिये गये
एवं
मजदूरी
भुगतान
किया गया।
बंशीलाल
पिता
सुखलाल
बताते है
कि पूर्व
में वह
मछली
पकडकर
अपना जीवन
यापन करते
थे परंतु
इस कार्य
में आमदनी
बहुत कम
होती थी
साथ ही
विकलांग
होने के
कारण पानी
में डूबने
से जान का
खतरा भी
बना रहता
था अब
उन्हें
मनरेगा
अंतर्गत
गांव में
ही काम मिल
जाता है
जिससे अब
रोजगार और
आमदनी
दानो ही
सुनिश्चित
हो गये है।
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