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सफलता की कहानी

रिक्शावाले बने काश्तकार

खेती-किसानी से बदल रही है आदिवासियों की जिन्दगी

शहडोल : 10 जून, 2010

शहडोल जिले के उत्तरी हिस्से यानी सोन नदी के तट के श्यामडीह खुर्द एवं श्यामडीहकला में खेतों की जमीन की बजह से इनके आसपास बसे कई आदिवासियों की जीवन शैली बदल रही है। इन बस्तियों में ननभईया, राजमणि सिंह, पुरूषोत्तम सिंह एवं छोटू सिंह स्वयं के खेत होने के बावजूद पहले रोजी-रोटी के लिए शहडोल शहर में किराए पर लेकर रिक्शा चलाते थे और दूसरों के खेतों में मजदूरी करते थे। लेकिन आज इन्ही खेतों की बदौलत वे मोटी रकम कमा रहे हैं। कल तक खेती की जमीन को बेकार समझने वाले ये लोग आज उससे सोना पैदा कर रहे हैं।

कल तक जिनके घर में किसी अतिथि को बिठाने के लिए केवल चारपाई का सहारा लेना पड़ता था, आज वहां प्लास्टिक की आधुनिक कुर्सियां नजर आने लगी हैं। यह बदलाव आया है राज्य सरकार के कृषि विभाग की पहल से। इस पहल ने इलाके के चार आदिवासी रिक्शावालों की जिन्दगी बदल दी है। इसी पहल की बदौलत कर्ज के लिए दूसरों के आगे हाथ फैलाने वालों के हाथ आज दूसरों को कर्ज देने के लिए उठने लगे हैं। आजीविका के लिए ये चारों आदिवासी रिक्शावाले शहडोल शहर आकर रिक्शा चलाते थे। पेट की आग बुझाने के लिए ये खाली समय में दूसरों के यहां दिहाड़ी मजदूरी के लिए भी मजबूर थे। इनका पूरा परिवार आजीविका के लिए अथक परिश्रम करता था, लेकिन फिर भी उन्हें फांकाकशी करना पड़ती थी।

चारों जनों ने रिक्शा चलाकर और मजदूरी करके जिन्दगी गुजारने की ठानी थी। इन्हें समाज में हेय नजरिए से देखा जाता था। उनके पास जमीन तो थी, मगर उसको सींचने के लिए पानी का संसाधन नहीं था। ऐसे समय में कृषि विभाग के मैदानी अमले ने खेती लायक जमीन के मालिक होने के बावजूद शहर में चन्द रूपयों के लिए रिक्शा खींच रहे इन चारों लोगों को न सिर्फ खेती-किसानी का रास्ता दिखाया, बल्कि राज्य सरकार की योजनाओं के तहत उन्हें बतैर अनुदान संसाधन भी मुहैया कराए। धान, गेहूं, चना, सब्जी आदि की खेती का सफर शुरू करने के लिए उन्हें अनुदान पर ट्यूबवैल, स्प्रिंकलर, उन्नत किस्म का धान, गेहूं, चना, सरसों, प्याज, लहसुन का बीज एवं खाद उपलब्ध कराया गया। उन्हें तकनीकी मार्गदर्शन भी दिया गया। सालभर की खेती में उनकी कड़ी मेहनत इतनी कामयाब हुई कि वे मालामाल हो गये। अब उन्हें शहर जाकर रिक्शा चलाने और दूसरों के यहां दिहाड़ी मजदूरी करने की जरूरत नहीं रही। आज वे जींस की पेंट पहनते हैं और मोबाइल फोन रखते हैं। क्षेत्र के वरिष्ठ कृषि विस्तार अधिकारी श्री अखिलेश नामदेव कहते हैं कि दूरदराज इलाकों में रहने वाले आदिवासियों के अर्थिक विकास के लिए खेती के लाभ की अवधारणा को साकार करने की कोशिश की जा रही है।

श्यामडीहखुर्द बस्ती के ननभइया रात में शहडोल में रिक्शा चलाकर चालीस रूपये और दिन में खेतों में मजदूरी करके दो जून की रोटी जुटाते थे। लेकिन आज ऐसा नहीं है। कृषि विभाग की ओर से संसाधन मिलने के बाद उनकी जिन्दगी ही बदल गई। पहले साल ही उन्हें 1 लाख 27 हजार रूपये की फसल मिल गई। उन्होंने कर्ज पटा दिया। मोबाइल फोन ले लिया। जिससे मण्डी से भाव पता करते हैं। वे कहते हैं कि आज हमें कृषि के काम से ही फुर्सत नहीं मिलती। इससे हमें अच्छी कमाई हो जाती है, इसलिए आज रिक्शा चलाने या मजदूरी करने की जरूरत नहीं है। ननभइया के साथी राजमणि सिंह बताते हैं कि एक ही साल की फसलों से 1 लाख 85 हजार रूपये की आमदनी आंकी गई हैं। चालीस हजार रूपये का कर्ज पटा दिया है और पुराने घर की मरम्मत करा दी है। लड़कियों की शादी के लिए पैसे इकट्ठा कर रहा गेहूं। इनके एक और साथी पुरूषोत्तम सिंह ने एक साल में 1 लाख 38 हजार 500 रूपये की फसलें प्राप्त कीं। उन्होंने दो कमरों का मकान बना लिया और एक साइकिल एवं मोबाइल फोन खरीदी। पत्नी को चांदी की करधनी भी दिला दी। वह बताते हैं कि हमें खेती से मोटी कमाई हो रही है।

श्यामडीह खुर्द के छोटू सिंह ने एक साल की फसलों से एक लाख रूपये से अधिक का उत्पादन लिया। उन्होंने खेती के पैसे से किराना दुकान खोल ली है और उन्होंने अपनी पत्नी को उपहार में बारह हजार रूपये का सोने का मंगलसूत्र दिया है। मकान भी बनवा रहे हैं। कर्ज अदा कर दिया है। उनके दिन तब और पलटे, जब गांव वालों ने पंचायत चुनाव में उन्हें समर्थन देकर उप सरपंच चुन लिया।

इस तरह चार साधारण इंसानों की असाधारण गाथाएं साकार हुईं। पैसे आने की वजह से इन लोगों का जीवन सुधर रहा है। उनकी सामाजिक हैसियत में सुधार का प्रमाण यह है कि गांव वाले अब इज्जत से उन्हें बैठने को कुर्सी देते हैं और कई मामलों में उनसे राय-मशविरा लेते हैं। जबकि कोई पहलें बैठने को उन्हें बोरा भी नहीं देता था। चारों की कामयाबी ने कई आदिवासी परिवारों को खेती-बाड़ी के लिए प्रोत्साहित किया है। शहडोल में आयोजित कृषि विज्ञान मेंले में इन चारों को प्रगतिशील कृषक के रूप में सम्मनित किया गया है।

जे.पी. धौलपुरिया

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