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सफलता की कहानी

तदबीर से बदल गई तकदीर

भोपाल : 08 अक्टूबर, 2010

 

एक जमाना था, जब महिलाएं सिर्फ घर गृहस्थी संभालने का काम करती थीं। लेकिन धीरे-धीरे वक्त ने करवट ली और वे घर के भीतर और बाहर की रेखा को पार कर गईं। महिलाओं ने अपनी-कड़ी मेहनत से यह साबित कर दिया है कि महिलाएं न केवल क्षमतावान हैं, बल्कि अगर वे ठान लें, तो कोई भी मंजिल मुश्किल नहीं।

इन महिलाओं में दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने का जज्बा कूटकूट कर भरा है। यही नहीं, घर की चारदीवारी तक सिमटी रहने वाली महिलाओं ने भी देहलीज से बाहर आकर खुद को सशक्त और आत्मनिर्भर बनाया है। ये महिलाएं मजदूरी व अनेक तरह के सिलाई-बुनाई आदि के काम कर रही हैं और अपने पैरों पर खड़ी हैं और अपने खुद के फैसले ले रही हैं। साथ ही अपने परिवार को चलाने में आर्थिक मदद भी प्रदान कर रही हैं।

इन्हीं महिलाओं में से एक हैं प्रदेश के शहडोल नगर की तीस वर्षीया महिला पिम्पापाल, जिन्होंने अपनी कड़ी मेहनत और कुछ कर गुजरने के जज्बे के साथ विपरीत परिस्थितियों का डर कर या घबराकर पीछे हटने की बजाय उनका सामना करने में स्वयं को सक्षम बनाया है। यही वजह है कि आज वे सिलाई-कढ़ाई के क्षेत्र में पूरे उत्साह से सक्रिय हैं। उनके कैरियर को दिशा देने एवं आत्मनिर्भर बनाने में महिला एवं बाल विकास विभाग की सिलाई-बुनाई, कढ़ाई प्रशिक्षण योजना मददगार बनी है। जिसके माध्यम से पिम्पापाल ने प्रशिक्षण हासिल किया। सिलाई-कढ़ाई सीखने के बाद एक बच्ची की माँ पिम्पापाल ने पाण्डवनगर में सिलाई-कढ़ाई की दुकान खोलने के साथ-साथ प्रशिक्षण केन्द्र भी शुरू कर दिया। उनके कपड़े उच्च वर्ग के साथ-साथ मध्यम वर्ग के लिए भी बने होते हैं। पिम्पापाल भारतीय परंपरा और संस्कृति को ध्यान में रखकर कपड़ों की सिलाई करती हैं। उनकी सिलाई उन नवयुवतियों के लिए हैं, जिनके पास पैसे कम है, पर वे फैशन की शौकीन हैं। उनके कपड़े डिजाइन और आधुनिकता को ध्यान में रख कर सिले जाते हैं। उनके यहां परिधान सिलाने स्कूल, कालेज व होस्टल की लड़कियां ज्यादा आती हैं। आज पिम्पापाल आत्मनिर्भर हैं और बस उतना ही कमा पाती हैं, जितने में परिवार चल सके। वह कहती हैं, ''अगर शासन की मदद से सिलाई नहीं सीखी होती,तो पता नहीं आज क्या होता।''

कुछ इसी तरह की कहानी घरौला मोहल्ला की उन्तीस वर्षीया मेहरून्निशा की है। आज वे प्रत्येक चीज के लिए पति पर आश्रित नहीं हैं। उन्होंने अपने पैरों पर खड़े होकर न सिर्फ स्वयं को आत्मनिर्भर बनाया है, बल्कि वे परिवार का सहारा भी बनी हैं। अब वे अपने पति के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं और आत्मनिर्भर हैं। उनके पति के पास तीन रिक्शे हैं, जिनको किराये पर देकर वे आजीविका चलाते हैं। लेकिन मेहरून्निशा के लिए इतना काफी नहीं था। उन्होंने और अधिक संपत्ति के सपने देखे और साकार करने के लिए महिला एवं बाल विकास विभाग के सिलाई प्रशिक्षण ने इस सपने को पंख दिए।

मेहरून्निशा ने अपने घर पर ही मात्र 2 सिलाई मशीनों की सहायता से सिलाई का कार्य शुरू किया, तब उन्हें पता नहीं था कि यह काम इतना आगे बढ़ेगा और उन्हें इतनी कामयाबी मिलेगी। आज उनके यहां दूर-दूर से महिलाएं और लड़कियां कपड़े सिलाने कराने आती हैं । वे भी ग्राहक की पसंद पर डिजाइन और आधुनिकता को ध्यान में रखकर परिधानों की सिलाई करती हैं। आर्थिक निर्भरता प्राप्त होने पर मेहरून्निशा का समाज में रूतबा बढ़ा है और जीवन सुख-सुविधाओं के साथ बीत रहा है। वह कहती हैं, '' पहले से घर की आर्थिक स्थिति में काफी सुधार हुआ है। अपनी कमाई से एक पीको मशीन और दीगर सामान भी खरीद लिया है।''

जे.पी. धौलपुरिया/आर.एस. पाराशर

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