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सफलता की कहानी

मुर्गियों ने बदल दी जीवन की धारा

भोपाल : 01 मई, 2010

मुर्गियों से कमाई राठौर परिवार के लिए कमाऊ धंधा बन गई है और इसने उनकी दुनिया बदल दी है। राठौर परिवार की कहानी वाकई काफी उतार-चढ़ाव से भरी है। अनूपपुर जिले के भगतबांध ग्राम के राठौर परिवार की यह तब की बात है, जब उनके दिन बहुत गरीबी में गुजर रहे थे। उनकी आजीविका का एकमात्र साधन दूसरों के यहां मजदूरी करना था और मजदूरी में जो कुछ मिल जाता था, उसी से परिवार को गुजारा करना पड़ता था। परिवार चिन्ता में डूबा रहता था। उनके भविष्य के बारे में यही कल्पना की जा सकती थी कि वह मजदूरी करते सारा जीवन बिताएंगे और गरीबी से कभी पीछा नहीं छुड़ा पाएंगे। लेकिन राठौर परिवार के रामचरण राठौर और राजू राठौर के इरादे कुछ और ही थे। वे कुछ अलग करना चाहते थे और इस काम में उनकी मददगार बनी राज्य सरकार की आजीविका परियोजना।

आजीविका परियोजना ने पांच महिलाओं एवं पांच पुरुषों, कुल दस लोगों का स्व-सहायता समूह बनाकर मुर्गीपालन व्यवसाय के लिए तीस हजार रुपये की आर्थिक मदद दी, जिसमें पन्द्रह हजार रुपये का अनुदान शामिल है। उन्हें मुर्गीपालन का प्रशिक्षण भी दिया गया। इस वित्तीय मदद से रामचरण ने फार्म बनाया और उसमें मुर्गी के चूजे रख दिए। पन्द्रह दिन बाद ही उनका फार्म बड़े आकार वाले भूरे रंग के एक हजार पक्षियों से चहचहा रहा था। मुर्गी पालने में कोई विशेष जोखिम नहीं है और कमाई खूब है। ये पक्षी महीने में पन्द्रह हजार रुपये दिलाते हैं। एक परिवार ने जिस काम को तीस हजार रुपये की पूंजी से शुरू किया था, आज वही लाखों रुपये के फलते-फूलते कारोबार में तब्दील हो गया है। उनका यह उपक्रम पारिवारिक कारोबार में तब्दील हो गया है और अब दो फार्म कार्यरत हैं। मुर्गियों ने राठौर परिवार की जिंदगी बदल दी।

मुर्गियों की कमाई से कुछ ही वर्षों में उन्होंने अच्छा मुनाफा कमा लिया। पूरा परिवार इस कारोबार में हाथ बंटाने लगा। उनकी मुर्गियां कोतमा, पेण्ड्रा, राजेन्द्र ग्राम, धनपुरी, शहडोल से व्यापारी उनके फार्म पर ही आकर ले जाते हैं। परिवार ने पक्का घर बना लिया है और एक मोटर साइकिल खरीद ली है। मुर्गियों के लिए पानी की व्यवस्था हेतु एक मोटर पंप खरीद लिया है। मुर्गी की कमाई से राजू की शादी हो गई है, दो मुर्गी फार्म बना लिए हैं। रामचरण ने अनूपपुर में साइकिल की दुकान भी खोल ली है। एक भाई रजत राठौर ने खेती शुरू कर दी है। उनकी सामाजिक हैसियत में सुधार का प्रमाण यह है कि लोग उन्हें इज्जत से सेठजी कहकर बुलाते हैं। जबकि गरीबी के दिनों में वही उन्हें हेय नजरों से देखा करते थे। रामचरण का बच्चे अच्छे इंगलिश मीडियम स्कूल में पढ़ रहा है।

समूह से जुड़े राजू राठौर बताते हैं हमारे परिवार के बुरे वक्त में मुर्गियां वरदान बनकर आईं। जब मेरा बच्चा बीमार हुआ, तो मैंने उसकी बीमारी पर सहजता से बीस हजार रुपये खर्च कर दिये। यह सब मुर्गियों की कमाई से ही संभव हुआ समूह की अध्यक्ष और राजू की मां श्रीमती राधाबाई बताती हैं मुर्गी के धंधे में हमें उस मुकाम पर ला दिया है कि आज हम अच्छा खा-पी रहे हैं और अच्छा पहन-ओढ़ रहे हैं।

मुर्गियों के धंधे ने राठौर परिवार को फर्श से अर्श पर ला दिया है और आज वह आसपास के क्षेत्रों में एक प्रतिष्ठित व्यवसायी के रूप में पहचाने जाते हैं।

जे.पी. धौलपुरिया

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