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बैगा
जनजाति के
धनीराम ने
अपनी
पहचान
बनायी
प्रगतिशील
किसान के
रूप में (धान
की
मेडागास्कर
विधि)
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भोपाल, गुरूवार, 26 नवम्बर, 2009
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अनुसूचित
जनजाति
वर्ग में
बैगा
जनजाति
समुदाय के
निर्धन और
एक मामूली
से किसान
धनीराम ने
जब 2008 में
शहडोल
जिले के
बुढ़ार
जनपद के
बिरूहली
गांव में
अपने
परिवार की
चार एकड़
जमीन पर
मेडागास्कर
विधि से
धान की
खेती करने
का फैसला
किया तो
उन्हें
जरा भी
अहसास
नहीं था कि
वे न केवल
स्वंय के
लिये इस
विधि से कई
गुणा अधिक
उत्पादन
लेने की
राह पर चल
पड़े हैं,
बल्कि
अन्य
गाँवों के
तमाम
किसानों
के लिये भी
ऐसी विधि
की राह खोल
रहे हैं और
उनके लिये
अधिक
आमदनी की
व्यवस्था
कर रहे
हैं।
बैगा
जनजाति के 27
वर्षीय
धनीराम
अपने
परिवार के
साथ
परम्परागत
तरीके से
छिटकवा
विधि से
धान, अरहर
और उड़द की
फसल लेते
थे तो
उन्होंने
इस विधि से
कृषि जगत
में अपना
भविष्य
बनाने की
कल्पना की
थी। उनके
पास 9 एकड़
खेती की
जमीन थी
जिसमें वे
धान की
परम्परागत
फसल लगाकर
अपने
परिवार के
लिये साल
भर के खाने
के उपयोग
के लिये ही
अनाज ले
पाते थे।
जैसे तैसे
उनके
परिवार का
गुजर-बसर
चल रहा था।
एक
दिन
क्षेत्र
के कृषि
अधिकारी
ने जब
उन्हें
धान की
मेडागास्कर
विधि बताई
तो
उन्होंने
इस विधि को
अजमाने का
फैसला
किया।
कृषि
विभाग ने
उनके खेत
के एक
भूखंड पर
इस विधि का
प्रदर्शन
किया।
उन्हें
अन्नापूर्णा
योजना के
तहत धान की
हाईब्रिड
डी.आर.एच.-775
नामक 12
किलोग्राम
बीज
उपलब्ध
कराया
गया।
धनीराम को
इस विधि से
पहले साल 105
क्विंटल
धान का
उत्पादन
मिला।
उनकी
आमदनी को
बढ़ता देख
गाँव के
अन्य
किसानों
ने भी धान
की
मेडागास्कर
विधि को
अपनाने का
फैसला
किया।
आज
धनीराम आस-पास
के गाँवों
में
प्रगतिशील
कृषक के
रूप में
अपनी
पहचान बना
चुके है।
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