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कामधेनु
गाय आई-
खुशियां
लायी
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भोपाल, शनिवार, 19 दिसम्बर, 2009
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प्रदेश
के
आदिवासी
बहुल
जिलों में
म.प्र. आदिम
जाति
कल्याण
विभाग, म.प्र.
राज्य
सहकारी
दुग्ध संघ
द्वारा
भारत
सरकार की
विशेष
केन्द्रीय
सहायता से
संचालित 'कामधेनु-
एकीकृत
आदिवासी
डेयरी
विकास
परियोजना'
के
अंतर्गत
लाभांवित
अनेक
आदिवासी
हितग्राहियों
की आर्थिक
स्थिति
में सुधार
आया है।
इससे वे
अपनीं
आवश्यकताओं
को पूर्ण
करने में
जहाँ
सक्षम
हुये हैं
वहीं उनका
पलायन भी
रूका है।
आदिवासी
बहुल जिले
में मूलत:
आदिवासियों
को
पशुपालन
के माध्यम
से दुग्ध
व्यवसाय
अपनाकर
आजीविका
विकास के
नियमित
संसाधन
जुटानें
के लिये म.प्र.
के ग्यारह
जिले में 'कामधेनु-परियोजना'
संचालित
की जा रही
है।
वर्तमान
में यह
परियोजना
प्रदेश के
झाबुआ, धार,
बड़वानी,
खरगौन,
खण्डवा,
बैतूल,
छिंदवाड़ा,
सिवनी,
बालाघाट,
मण्डला
एवं शहडोल
जिले में
संचालित
है। इस
परियोजना
में गरीबी
रेखा से
नीचे जीवन
यापन करने
वाले
आदिवासी
परिवारों
को
सम्मिलित
किया गया
है।
प्रत्येक
चयनित
आदिवासी
को
पुशपालन
के माध्यम
से दुधारू
पशु युक्त
लघु डेयरी
इकाई की
स्थापना
हेतु तीन
उच्च नस्ल
के दुधारू
पशु, प्रथम
90 दिवस हेतु
नि:शुल्क
पशु आहार
प्रदाय कर
पशुओं के
लिये पशु
शेड तथा
चयनित
हितग्राही
को पशु
प्रबंधन
का
प्रशिक्षण
दिया गया
है।
झाबुआ
जिले की
तहसील
मेघनगर के
गांव
नानियासाथ
में रहने
वाले
आदिवासी
टीटू पिता
जालम सिंह
को
कामधेनु
परियोजना
के माध्यम
से रूपये 50
हजार की
तीन उच्च
नस्ल की
दुधारू
गाएं, दस
हजार
रूपये की
लागत का
पशु शेड व
पशुओं के
पानी पीने
की
व्यवस्था
तथा तीन
माह तक दस
हजार
रूपये का
पशु आहार
एवं चारा
दिया गया।
पशुपालन
व्यवसाय
अपनाने के
पूर्व
टीटू व
उसकी
पत्नि को
एसपीसीडीएफ
के
अन्तर्गत
कार्यरत
इंदौर
सहकारी
दुग्ध संघ
द्वारा 5
दिनों तक
झाबुआ में,
पशु पालन
एवं
प्रबंधन
का
प्रशिक्षण
दिया गया।
इस
प्रशिक्षण
से दुग्ध
व्यवसाय
अपनाने और
दुग्ध
व्यवसाय
के
विभिन्न
पहलुओं को
समझने में
टीटू व
उसके
परिवार को
आसानी
हुई।
वर्तमान
में टीटू
के पास तीन
गायें है।
टीटू ने 42
माह में
सहकारी
दुग्ध
समिति
नानियासाथ
को लगभग 1
लाख 40 हजार
रूपये का
दूध बेचा।
रख रखाव के
खर्च लगभग 65
हजार
काटकर
टीटू को
शुद्ध 75
हजार
रूपये की
आय हुई। इस
प्रकार
दुग्ध
व्यवसाय
अपनाने से
टीटू को एक
हजार 785
रूपये
प्रतिमाह
की आमदनी
हुई।
टीटू
ने अपनी
बचत से
अपने घर की
मरम्मत
कराई, मोटर
साईकिल
खरीदी तथा
लगभग 15 हजार
रूपये की
राशि बचत
खाते में
बैंक में
जमा की है।
इसके
अलावा
उसनें
पशुओं से
उत्सर्जित
गोबर का
उपयोग खाद
के रूप में
किया।
इससे
पिछले तीन
वर्षों से
टीटू को
मजदूरी
हेतु
पलायन
नहीं करना
पड़ा तथा
उसके घर
में ही
बच्चों के
लिये दूध,
घी, छाछ की
उपलब्धता
हो गई।
इसी
प्रकार की
कहानी
नानीयासाथ
के बीपीएल
परिवार के
कालू पिता
दलजी,
पेटलावद
तहसील के
गांव
करडावद के
लक्ष्मण
पिता हेमा
तथा
बेडावली
गांव के
तेरसिंग
की है।
कालू ने
दुग्ध
व्यवसाय
से अर्जित
बचत का
उपयोग
अपने
कच्चे
मकान को
पक्का
करने में
किया। वही
लक्ष्मण
ने इस
व्यवसाय
से 60 हजार
रूपये की
बचत की।
खेती के
लिये
रासायनिक
खाद के
स्थान पर
गाबर खाद
का उपयोग
किया तथा
अपना नया
मकान
बनाया।
कामधेनु
परियोजना
के माध्यम
से झाबुआ
जिले के
आदिवासियों
के जीवन
में
आर्थिक
उन्नति के
साथ-साथ
नियमित
रोजगार का
साधन
उपलब्ध
हुआ है,
रोजगार की
खोज में
पलायन
रूका है
तथा
परिवार के
सदस्यों
हेतु दूध
उपलब्ध
हुआ है।
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