-
बैगा
(बैगायक
क्षेत्र,
मंडला
जिला)
-
भारिया
(पाताल
कोट
क्षेत्र,
छिन्दवाड़ा
जिला)
-
कोरबा
(हिल
कोरबा,
छत्तीसगढ़)
-
कमार
(मुख्य
रूप
से
रायपुर
जिला)
-
अबूझमाड़िया
(बस्तर
जिला)
-
सहरिया
(ग्वालियर
संभाग)
सहरिया
सहरिया
का
अर्थ
है शेर
के साथ
रहने
वाला।
सहरिया
जनजाति
का
विस्तार
क्षेत्र
अन्य
जनजातियों
के
छोटे
क्षेत्रों
की
तुलना
में
भिन्न
प्रकार
का है।
यह
जनजाति
मध्यप्रदेश
के
उत्तर
पश्चिमी
जिलों
में
फैली
हुई
है। यह
जनजाति
आधुनिक
ग्वालियर
एवं
चंबल
संभाग
के
जिलों
में
प्रमुखता
से पाई
जाती
है। इन
संभागों
के
जिलों
में इस
जनजाति
की
जनसंख्या
का 84.65
प्रतिशत
निवास
करता
है।
शेष
भाग
भोपाल,
सागर,
रीवा,
इंदौर
और
उज्जैन
संभागों
में
निवास
करता
है।
पुराने
समय
में यह
समस्त
क्षेत्र
वनाच्छादित
था और
यह
जनजाति
शिकार
और
संचयन
से
अपना
जीवन-यापन
करती
थी
किंतु
अब
अधिकांश
सहरिया
या तो
छोटे
किसान
हैं या
मजदूर।
इनका
रहन-सहन
और
धार्मिक
मान्यताएँ
क्षेत्र
के
अन्य
हिंदू
समाज
जैसी
ही हैं
किंतु
गोदाना
गुदाने
की
परंपरा
अभी भी
प्रचलित
है।
सहरिया
जनजाति
होने
के
कारण
मोटे
अन्न
पर
निर्भर
हैं।
शराब
और
बीड़ी
के
विशेष
शौकीन
है।
सहरिया
लोगों
के
स्वास्थ्य
परीक्षण
का
कार्य
2-3
वर्षों
में (1990-92)
सघन
रूप से
चला।
इंडियन
काउंसिल
ऑफ
मेडिकल
रिसर्च
की
शाखा
आर.एम.आर.सी.
के
निदेशक
डॉ.
रविशंकर
तिवारी
बतलाते
हैं कि
सहरिया
लोगों
में
क्षय
रोग
साधारण
जनता
की
तुलना
में कई
गुना
अधिक
विद्यमान
है, यह
भ्रांति
तोड़ता
है कि
क्षय
रोग
जनजातियों
में कम
पाया
जाता
है।
पारधी
पारधी
मराठी
शब्द
पारध
का
तद्भव
रूप है
जिसका
अर्थ
होता
है
आखेट।
मोटे
तौर पर
पारधी
जनजाति
के साथ
बहेलियों
को भी
शामिल
कर
लिया
जाता
है।
अनुसूचित
जनजातियों
की
शासकीय
सूची
में भी
पारधी
जनजाति
के
अंतर्गत
बहेलियों
को
सम्मिलित
किया
गया
है।
मध्यप्रदेश
के एक
बड़े
भाग
में
पारधी
पाए
जाते
हैं।
पारधी
और
शिकारी
में
मुख्य
अंतर
यह है
कि
शिकारी
आखेट
करने
में
बंदूकों
का
उपयोग
करते
हैं
जबकि
पारधी
इसके
बदले
जाल का
इस्तेमाल
करते
हैं।
पाराकीयों
द्वारा
बंदूक
के
स्थान
पर जाल
का
उपयोग
किन्हीं
धार्मिक
विश्वासों
के
आधार
पर
किया
जाता
है।
उनका
मानना
है कि
महादेव
ने
उनहें
वन
पशुओं
को जाल
से
पकड़ने
की कला
सिखाकर
बंदूक
से
पशुओं
के
शिकार
के पाप
से बचा
लिया
है।
फिर भी
इनके
उपभेद
भील
पारधियों
में
बंदूक
से
शिकार
करने
में
कोई
प्रतिबंध
नहीं
है।
भील
पारधी
भोपाल,
रायसेन
और
सीहोर
जिलों
में
पाए
जाते
हैं।
पारधियों
के
उपभेद
गोसाई
पारधी : गोसाई
पारधी
गैरिक
वस्त्र
धारण
करते
हैं।
तथा
भगवा
वस्त्रधारी
साधुओं
जैसे
दिखाई
देते
हैं।
ये
हिरणों
का
शिकार
करते
हैं।
चीता
पारधी : चीता
पारधी
आज से
कुछ सौ
वर्ष
पूर्व
तक
चीता
पालते
थे
किंतु
अब
भारत
की
सीमा
रेखा
से
चीता
विलुप्त
हो गया
है।
अतएव
अब
चीता
पारधी
नाम का
पारधियों
का एक
वर्ग
ही शेष
बचा
है।
चीता
पारधियों
की
ख्याति
समूची
दुनिया
में
थी।
अकबर
और
अन्य
मुगल
बादशाहों
के
यहाँ
चीता
पारधी
नियमित
सेवक
हुआ
करते
थे। जब
भारत
में
चीता
पाया
जाता
था तब
चीता
पारधी
उसे
पालतू
बनाने
का
कार्य
करते
और
शिकार
करने
की
ट्रनिंग
देते
थे।
किंतु
यह सब
बाते
हैं
बीते
युग की
जब
चीते
और
पारधियों
का एक
चित्र
हजारों
पौंड
मूल्य
में
यूरोप
में
खरीदा
गया।
भील
पारधी : बंदूकों
से
शिकार
करने
वाले।
लंगोटी
पारधी : वस्त्र
के नाम
पर
केवल
लंगोटी
लगाने
वाले
पारधी।
टाकनकार
और
टाकिया
पारधी : सामान्या
शिकारी
और
हांका
लगाने
वाले
पारधी।
बंदर
वाला
पारधी : बंदर
नचाने
वाले
पारधी।
शीशी
का तेल
वाले
पारधी : पुराने
समय
में
मगर का
तेल
निकालने
वाले
पारधी।
फांस
पारधी : शिकार
को जाल
में
पकड़ने
वाले।
बहेलियों
का भी
एक
उपवर्ग
है जो
कारगर
कहलाता
है। यह
केवल
काले
रंग के
पक्षियों
का ही
शिकार
करता
है।
इनके
सभी
गोत्र
राजपूतों
से
मिलते
हैं,
जैसे
सीदिया,
सोलंकी,
चौहान
और
राठौर
आदि।
सभी
पारधी
देवी
के
आराधक
है।
लंगोटी
पारधी
चांदी
की
देवी
की
प्रतिमा
रखते
हैं।
यही
कारण
है कि
लंगोटी
पारधियों
की
महिलाएँ
कमर से
नीचे
चांदी
के
आभूषण
धारण
नहीं
करती
और न ही
घुटनों
के
नीचे
धोती,
क्योंकि
ऐसा
करने
से
देवी
की
बराबरी
करने
का भाव
आ जाता
है यह
उनकी
मान्यता
है।
अगरिया
अगरिया
विशष
उद्यम
वाली
गोधे
की उप
जनजाति
है
अगरिया
मध्यप्रदेश
के
मंडला,
शहडोल
तथा
छत्तीसगढ़
के
जिलों
एवं
इण्डकारण्य
में
पाए
जाते
हैं।
अगरिया
लोगों
के
र्प्रमुख
देवता 'लोहासूर'
हैं
जिनका
निवास
धधकती
हुई
भट्टियों
में
माना
जाता
है। वे
अपने
देवता
को
काली
मुर्गी
की
भेंट
चढ़ाते
हैं।
मार्ग
शीर्ष
महीने
में
दशहरे
के दिन
तथा
फाल्गुन
मास
में
लोहा
गलाने
में
प्रयुक्त
यंत्रों
की
पूजा
की
जाती
है।
इनका
भोजन
मोटे
अलाज
और सभी
प्रकार
के
मांस
है। ये
सुअर
का
मांस
विशेष
चाव से
खाते
हैं।
इनमें
गुदने
गुदवाने
का भी
रिवाज
है।
विवाह
में
वधु
शुल्क
का
प्रचलन
है। यह
किसी
भी
सोमवार,
मंगलवार
या
शुक्रवार
को
संपन्न
हो
सकता
है।
समाज
में
विधवा
विवाह
की
स्वीकृति
है।
अगरिया
उड़द
की दाल
को
पवित्र
मानते
हैं और
विवाह
में
इसका
प्रयोग
शुभ
माना
जाता
है।
जिस
तरह
प्राचीन
काल
में ये
असुर
जनजाति
कोलों
के
क्षेत्रों
में
लुहार
का
कार्य
संपन्न
करते
रहे
हैं,
उसी
भांति
अगरिया
गोंडों
के
क्षेत्र
के
आदिवासी
लुहार
हैं।
ऐसा
समझा
जाता
है कि
असुरों
और
अगरियों
दोनों
ही
जनजातियों
ने
आर्यों
के आने
के
पूर्व
ही
लोहा
गलाने
का राज
स्वतंत्र
रूप से
प्राप्त
कर
लिया
था।
अगरिया
प्राचीनकाल
से ही
लौह
अयस्क
को साफ
कर लौह
धातु
का
निर्माण
कर रहे
हैं।
लोहे
को
गलाने
के लिए
अयस्क
में 49
से 56
प्रतिशत
धातु
होना
अपेक्षित
माना
जाता
है
किंतु
अगरिया
इससे
कम
प्रतिशत
वालीं
धातु
का
प्रयोग
करते
रहे
हैं।
वे
लगभग 8
किलो
अयस्क
को 7.5
किलां
चारकोल
में
मिश्रित
कर
भट्टी
में
डालते
हैं
तथा
पैरो
द्वारा
चलित
धौंकनी
की
सहायता
से
तीव्र
आंच
पैदा
करते
हैं।
यह चार
घंटे
तक
चलाई
जाती
है
तदंतर
आंवा
की
मिट्टी
के
स्तर
को
तोड़
दिया
जाता
है और
पिघले
हुए
धातु
पिंड
को
निकालकर
हथौड़ी
से
पीटा
जाता
है।
इससे
शुद्ध
लोहा
प्राप्त
होता
है तथा
प्राप्त
धातु
से
खेतों
के
औजार,
कुल्हाड़ियाँ
और
हंसिया
इत्यादि
तैयार
किए
जाते
हैं।
खैरवार
खैरवार
मुंडा
जनजाति
समूह
की एक
प्रमुख
जनजाति
है।
खैरवार
अपना
मूल
स्थान
खरियागढ़
(कैमूर
पहाड़ियाँ)
मानते
हैं,
जहाँ
से वे
हजारी
बाग
जिले
तक
पहूँचे।
विरहोर
स्वयं
को
खैरवान
की
उपशाखा
मानते
हैं।
मिर्जापुर
और
पालामऊ
मे
खैरवार
स्वयं
को
अभिजात्य
वर्ग
का
मानते
हैं और
जनेऊ
धारण
करते
हैं।
दरअसल
अपने
विस्तृत
विवतरण
क्षेत्र
में
खैरवारों
के
जीवन-स्तर
में
भारी
अंतर
देखने
को
मिलता
है।
जहाँ
एक ओर
छोटा
नागपुर
में
उन्होंने
लगभग
सवर्ण
जातीय
स्तर
को
प्राप्त
किया
वहीं
अपने
मूल
स्थान
मध्यप्रदेश
के
अनेक
हिस्सें
में ये
विशिष्ट
धन्यों
वाले
आदिवासी
के रूप
में रह
गए।
मध्यप्रदेश
के
कत्था
निकालने
वाले
खैरवान
मध्यप्रदेश
के
बिलासपुर,
मंडला,
सरगुजा
और
विंध्य
क्षेत्र
में
कत्था
निकालने
वाले
खैरवारों
को
खैरूआ
भी कहा
जाता
है।
खैरवान
कत्था
निकालने
के
अतिरिक्त
वनोपज
संचयन
तथा
मजदूरी
का
कार्य
भी
करते
हैं।
मध्यप्रदेश
के उन
भागों
में
जहाँ
खैरवान
स्थाई
रूपसे
निवास
करते
हैं,
कत्था
निकालने
के
मौसम
के
पूर्व
ही
जंगलों
में
पहुँच
जाते
हैं और
अस्थाई
मकान
बना
लेते
हैं
तथा
काम
पूरा
होने
के बाद
झोपड़ियों
को
छोड़कर
फिर
अपने-अपने
मूल
ग्राम
की ओर
लौट
जाते
हैं।
परिका
(पनका)
पनका
द्रविड़
वर्ग
की
जनजाति
है।
छोटा
नागपुर
में यह
पाने
जनजाति
के नाम
से
जानी
जाती
है।
ऐसा
कहा
जाता
है। कि
संत
कबीर
का
जन्म
जल में
हुआ था
और वे
एक
पनका
महिला
द्वारा
पाले-पोसे
गए थे।
पनका
प्रमुख
रूप से
छत्तीसगढ़
और
विन्ध्य
क्षेत्र
में
पाए
जाते
हैं।
आजकल
अधिसंख्य
पनका
कबीर
पंथी
हैं।
ये 'कबीरहा'
भी
कहलाते
हैं।
ये
मांस-मदिरा
इत्यादि
से
परहेज
करते
हैं।
दूसरा
वर्ग 'शक्ति
पनका'
कहलाता
है। इन
दोनों
में
विवाह
संबंध
नहीं
है।
इनके
गोत्र
टोटम
प्रधान
हैं,
जैसे
धुरा,
नेवता,
परेवा
आदि।
कबीर
पंथी
पनकाओं
के
धर्मगुरू
मंति
कहलाते
हैं जा
अक्सर
पीढ़ी
गद्दी
संभालते
हैं।
इसी
प्रकार
दीवान
का पद
भी
उत्तराधिकार
से ही
प्राप्त
होता
है। एक
गद्दी 10
से 15
गांवों
के
कबीरपंथियों
के
धामिर्क
क्रियाकलापों
की देख-रेख
करती
है।
कबीरदास
जी को
श्रद्धा
अर्पण
के
उद्देश्य
से माघ
और
कार्तिक
की
पूर्णिमा
को
उपवास
रखा
जाता
है।
कट्टर
कबीर
पंथी
देवी-देवताओं
को
नहीं
पूजते
किंतु
शक्ति
पनिका
अनेक
देवी-देवताओं
की
पूजा
करते
हैं।
कबीरहा
पनका
महिला
एवं
पुरूष
श्वेत
वस्त्र
तथा
गले
में
कंठी
धारण
करते
हैं।
अन्य
आदिवासी
की
तुलना
में
छत्तीसगढ़
के
पनका
अधिक
प्रगतिशील
हैं।
इनमें
से कई
बड़े
भूमिपति
भी हैं,
किन्तु
ये
कपड़े
बुनने
का
कार्य
करते
हैं।
गरीब
पनके
हरवाहों
का काम
करते
हैं।
पनका
जनजाति
मूल
रूप से
कपड़ा
बुनने
का
कार्य
करती
है। |