-
बैगा
(बैगायक
क्षेत्र,
मंडला
जिला)
-
भारिया
(पाताल
कोट
क्षेत्र,
छिन्दवाड़ा
जिला)
-
कोरबा
(हिल
कोरबा,
छत्तीसगढ़)
-
कमार
(मुख्य
रूप
से
रायपुर
जिला)
-
अबूझमाड़िया
(बस्तर
जिला)
-
सहरिया
(ग्वालियर
संभाग)
कोरबा
कोल
प्रजाति
की
जनजाति
मध्यप्रदेश
में
छोटा
नागपुर
से ही
आयी
है। यह
बिलासपुर,
रायगढ़
और
सरगुजा
जिला
में
प्रमुख
रूप से
पायी
जाती
है।
डालटन
उनके
बारे
में
लिखता
है,
असुरों
के साथ
मिश्रित
तथा
उनसे
बहुत
अलग भी
नहीं,
सिवा
इसके
कि ये
यहां
अधिकतर
कृषक
हैं।
वे
वहां
के
धातु
गलाने
का काम
करने
वाले
लोग
हैं।
हम
सबसे
पहले
कोरबा
से
मिलते
हैं जो
कि
उक्त
नाम के
अन्तर्गत
"कालेग्मिन
श्रृंखला"
की
टूटी
हुई
कड़ी
है।
यही
जनजाति
पश्चिम
की ओर
सरगुजा,
रायपुर
तथा
पालाभाड़ा
पठार
पर से
होती
हुई
अधिक
संगठित
जनजाति
कुर
तथा
रीवा
के
मुसाइयों
तक
पहुंचती
है।
सेन्ट्रल
प्राविन्स
में वह
विन्ध्याचल
से
सतपुड़ा
तक
पहुंच
जाती
है।
बहुत
ही
पिछड़ी
जनजातियों
में से
एक है।
यह
जनजाति
उत्तरप्रदेश
के
मिर्जापुर,
मध्यप्रदेश
के
जशपुर
और
सरगुजा
और
बिहार
के
पलामू
जिलों
में
मुख्य
रूप से
पायी
जाती
है।
उत्तरप्रदेश
के
कोरबा
का
मजूमदार
और
पलामू
के
कोरबा
का
सण्डवार
नामक
विद्वानों
ने
विस्तृत
अध्ययन
किया
था।
पहाड़ों
में
रहने
वाले
कोरबा
पहाड़ी
कोरबा
कहलाते
हैं
तथा
मैदानी
क्षेत्रों
के
कोरबा
डीह
कोरबा
कहलाते
हैं।
मिर्जापुर
के
कोरबा
अपने
को डीह
कोरबा
तथा
पहाड़ी
कोरबा
के
अतिरिक्त
डंड
कोरबा
श्रेणियां
बताते
हैं।
शरीर
कोरबा
कम
ऊंचाई
के तथा
काले
रंग के
लोग
हैं।
ये
मजबूत
यष्टि
वाले
लोग
हैं
किन्तु
उनके
पैर
शरीर
की
तुलना
में
कुछ
छोटे
दिखई
पड़ते
हैं।
पुरूषों
की औसत
ऊंचाई 5
फिट 3
इंच
तथा
महिलाओं
की 4 फिट
9 इंच
पायी
जाती
है।
पहाड़ी
कोरबाओं
की
दाढ़ी
और
मूंछों
के
अलावा
शरीर
के बाल
भी
बड़े
रहते
हैं।
साधारणत:
वे
कुरूप
दिखलाई
देते
हैं।
सामाजिक
संगठन
इनकी
अपनी
पंचायत
है
जिसे "मैयारी"
कहते
हैं।
सारे
गांव
के
कोरबाओं
के बीच
एक
प्रधान
होता
है
जिसे 'मुखिया"
कहते
हैं।
बड़े-बुढ़े
तथा
समझदार
लोग
पंचायत
के
सदस्य
होते
हैं।
पंचायत
का
फैसला
सबको
मान्य
होता
है।
इनका
घर बहत
ही
साधारण
होता
है। ये
जंगल
में
घास-फूस
से बने
छोटे-छोटे
घरों
में
रहते
हैं।
जो लोग
गांव
में बस
गए हैं,
वे
बांस
और
लकड़ी
के घर
बनाते
और
खपरैल
तथा
पुआल
से
छाते
हैं।
पहाड़ी
कोरबा
पहले
बेआरा
खेती (शिफ्टिंग
कल्टिवेशन)
भी
करते
थे,
लेकिन
सरकारी
नियमों
के तरह
इस
प्रकार
की
खेती
पर
बंदिश
है।
डीह
कोरबा
साधारण
खेती
करते
हैं।
कोरबा
जनजाति
की एक
उपजाति
कोरकू
है और
जिस
तरह
सतपुड़ा
की
दूसरी
कोरकू
जनजाति
मुसाई
भी
कहलाती
है उसी
तरह
कोरकू
भी "मुसाई"
नाम से
पहचाने
जाते
हैं।
जिनका
शाब्दिक
अर्थ
है चोर
या
डकैत।
कूक
कोरबा
और कूक
को एक
ही
जनजाति
के दो
उपभेद
मानते
हैं।
जबकि
ग्रिमर्सन
भाषा
के
आधार
पर
उनकी
भाषा
को
असुरों
के
अधिक
निकट
पाते
हैंं।
कोरबा
लोगों
में "मांझी"
सम्मान
सूचक
पदवी
मानी
जाती
है।
संथालों
में भी
ऐसा ही
है।
पहाड़ी
कोरबा
मध्यप्रदेश
की
आदिम
जातियों
में से
है
जिसका
जीवन-स्तर
तथा
विकास
अत्यंत
ही
प्रारंभिक
व्यवस्था
में
हैं।
यह
उनके
जीवन
के
प्रत्येक
कार्यकलापों
में
देखा
जा
सकता
है।
रहन-सहन
के
मामले
में वे
शारीरिक
स्वच्छता
से
कोसों
दूर
हैं।
उनके
सिर के
बाल
मैल के
कारण
रस्सी
जैसी
लटाओं
में
परिवर्तित
हो
जाती
है।
महिलाओं
के
कपड़े
निहायत
गंदे
रहेते
हैं।
शरीर
के अंग
प्रत्यंगों
पर मैल
की परत
पायी
जाती
है।
महिलाएं
आभूषण
के
आधार
पर
केवल
लाल
रंग की
चिन्दियां
सिर पर
बांध
लेती
है।
उनकी
सामाजिक
मान्यताएं
भी
अन्य
आदिवासियों
की
तुलना
में
काफी
पिछड़ी
हुई है ,
जैसे
कहा
जाता
है कि
पहाड़ी
कोरबा
कुछ
परिस्थितियों
में
बहन से
भी
विवाह
कर
सकते
हैं।
पहाड़ी
कोरबा
में
विवाह
के लिए
माँ-बाप
की
अनुमति
की
आवश्यकता
नहीं
है।
शिकार
प्रियता
के साथ
शिकार
से
संबंधित
उनके
अंधविश्वास
ओर
टोने-टोटके
भी
हैंं,
जैसे
शिकार
प्रियता
के साथ
शिकार
से
संबंध्धित
उनके
अंधविश्वास
ओर
टोने-टोटके
भी
हैंं,
जेसे
शिकार
यात्रा
के समय
बच्चे
का
रोना
अशुभ
माना
जाता
है।
कुण्टे
महोदय
के
अनुसार
शिकार
यात्रा
पर
जाते
समय एक
व्यक्ति
ने
अपने
दो
वर्षीय
बच्चे
को
पत्थर
पर पटक
दिया
क्योंकि
उसने
रोना
चालू
कर दया
था।
इसी
भांति
वे
शिकार
की
यात्रा
के
पूर्व
मुर्गों
के
सामने
अन्न
के कुछ
दाने
छिटका
देते
हैं।
यदि
मुर्गों
ने ठोस
दाने
को
पहले
चुना
तो
यात्रा
की
सफलता
असंदग्धि
मानी
जाती
है।
कोरबा
के
लोगों
में
किसी
प्रकार
के
आदर्श
को
महत्व
नहीं
दिया
जाता,
जंगल
का
कानून
ही
उनकी
मानसिकता
है।
शिकार
यात्रा
के समय
बच्चे
का
रोना
अशुभ
माना
जाता
है।
कुण्टे
महोदय
के
अनुसार
शिकार
यात्रा
पर
जाते
समय एक
व्यक्ति
ने
अपने
दो
वर्षीय
बच्चे
को
पत्थर
पर पटक
दिया
क्योंकि
उसने
रोना
चालू
कर दया
था।
इसी
भांति
वे
शिकार
की
यात्रा
के
पूर्व
मुर्गों
के
सामने
अन्न
के कुछ
दाने
छिटका
देते
हैं।
यदि
मुर्गों
ने ठोस
दाने
को
पहले
चुना
तो
यात्रा
की
सफलता
असंदग्धि
मानी
जाती
है।
कोरबा
के
लोगों
में
किसी
प्रकार
के
आदर्श
को
महत्व
नहीं
दिया
जाता,
जंगल
का
कानून
ही
उनकी
मानसिकता
है।
इन
क्षेत्रों
में
जलाऊ
लकड़ी
का
विशेष
महत्व
है।
शीतकाल
में
आदिवासी
लकड़
जलाकर
ही
उष्णता
प्राप्त
करते
हैं।
नगद
पैसा
उन्हें
अधिकतर
अचार
की
चिरौंजी
से
मिलता
है।
चिरौंजी
की
मांग
तथा
मूल्य
दोनों
में
लगातार
वृद्धि
हो रही
है। ये
लोग
जड़ी-बूटियों
को
बेचना
तो दूर
उनके
बारे
में
किसी
अन्य
को
बताना
भी
पसंद
नहीं
करते। |