|
मध्यभारत
की
रियासतों
,
भोपाल
नवाब
और
विंध्य
की
रियासतों
के
साथ
अंग्रेजों
ने
संधि
कर
उन्हों
अपने
संरक्षण
में
ले
लिया।
सन् 1885
में
भारतीय
राष्ट्रीय
कांग्रेस
के
दूसरे
अधिवेशन
में
मध्यप्रांत
से
बापूराव,
दादा
किनखेड़े,
गंगाधार
चिटणीस,
गोपाल
हरीभिड़े
और
अब्दुल
अजीज
ने
भाग
लिया।
सन 1891
में
कांग्रेस
का
सातवां
अधिवेशन
लागपुर
में
हुआ।
इससे
इस
क्षेत्र
में
राष्ट्रीय
चेतना
की
शुरूआत
हुई।
कांग्रेस
में
तिलक
के
प्रभाव
के
साथ
ही
मध्यप्रांत
मालवा
आदि
में
गणेशोत्सव,
शिवाजी
उत्सव,
अखाड़ों
आदि
के
माध्यम
से
राष्ट्रीय
भावना
का
प्रचार
होने
लगा।
खंडवा
के
सुबोध
बंधु
और
जबलपुर
के
जबलपुर
टाइम्स
के
प्रकाशन
के
साथ
राष्ट्रवाद
का
प्रचार
बढ़ने
लगा।
जादोराय
इस
वंश
का
संस्थापक
था।
इस
वंश
का
दूसरा
राजा
संग्रामशाह
था।
इसके
अधीन 52
गढ़
थे।
जबलपुर,
दमोह,
सागर,
सिवनी,
नरसिंहपुर,
मंडला,
होशंगाबाद,
बैतूल,
छिंदवाड़ा,
नागपुर
और
बिलासपुर
आदि
क्षेत्र
भी
इसके
अधीन
थे।
संग्रामशाह
ने
सन् 1480
से 1542 तक
शासन
किया।
इसके
बाद
दलपतशाह
शासक
बना।
इस
वंश
को
सर्वाधिक
कीर्ति
रानी
दुर्गावती
के
कारण
मिली।
अबुलफजल
ने
गोंडवाना
राज्य
की
सीमा
पूर्व
में
रतनपुर
(झारखंड),
पश्चिम
में
रायसेन,
उत्तर
में
पन्ना
और
दक्षिण
में
दमन
सूबे
तक
बताई
है।
सन्
1905 में
मध्यप्रदेश
में
कांग्रेस
का
पहला
अधिवेशन
नागपुर
में
हुआ।
दादा
साहब
खापर्ड़े
इसके
आयोजक
थे।
सन् 1906
में
गंगाधर
चिटणीस
ने
जबलपुर
में
प्रांतीय
अधिवेशन
बुलाया।
सन् 1907
में
सर
हरिसिंह
गौर
ने
इसका
आयोजन
रायपुर
में
किया।
पं.
रविशंकर
शुक्ला,
डॉ.
राघवेंद्र,
हरिसिंह
गौर
आदि
सक्रिय
हो
गए।
सन्
1920 में
मध्यप्रांत
में
तीन
कांग्रेस
समितियाँ
गठित
की
गइ।
इनमें
पहली
विदर्भ
के
लिए,
दूसरी
महाकौशल
के
हिंदी
क्षेत्र
के
लिए
तथा
तीसरी
नागपुर
के
लिए
थी।
इसके
माध्यम
से
भाषावार
प्रांतों
का
प्रतिपादन
किया
गया।
महात्मा
गांधी
द्वारा
कांग्रेस
का
नेतृत्व
संभालने
के
बाद
इस
क्षेत्र
में
असहयोग
आंदोलन,
सविनय
अवज्ञा
आंदोलन
आदि
प्रारंभ
हुए।
सेठ
गोविंददास,
द्वारिका
प्रसाद
मिश्र,
ठाकुर
लक्ष्मण
सिंह
और
रविशंकर
शुक्ल
आदि
ने इस
दिशा
में
पहल
की।
माखनलाल
चतुर्वेदी
ने
अपने
पत्र 'कर्मवीर'
के
प्रकाशन
से
राष्ट्रीय
चेतना
के
प्रसार
को नई
दिशा
दी।
सन्
1923 में
श्यामसुंदर
भार्गव,
सुभद्राकुमारी
चौहान,
अब्दुल
कादिर
सिद्दी
की
आदि
ने
धरना,
सत्याग्रह
एवं
प्रदर्शन
प्रारंभ
किए।
छत्तीसगढ़
में
रविशंकर
शुक्ल
और
महंत
लक्ष्मीनारायण
दास
सक्रिय
थे।
सन् 1938
में
खंडवा,
सीहोर,
जबलपुर,
रायपुर
आदि
स्थानों
में
नमक
कानून
तोड़ा
गया।
वर्धा
के एक
ग्राम
में
गांधी
आश्रम
की
स्थापना
से
प्रांत
में
आंदोलन
ने
जोर
पकड़ा।
जगन्नाथ
महोदय,
जमनालाल
बजाज,
भगवंतराव
मंडलोई,
मगनलाल
बागड़ी,
बृजलाल
वियाणी
मैदान
में
कूद
पड़े।
सन् 1942
में "भारत
छोड़ो
आंदोलन"
के
दौरान
प्रदेश
में
क्रांति
का
उग्र
रूप
दिखा
व
जबलपुर,
खंडवा,
होशंगाबाद,
दमोह,
सागर,
छत्तीसगढ़
आदि
में
व्यापक
आंदोलन
हुए
और
भारी
संख्या
में
गिरफ्तारियाँ
हुई।
कई
स्थानों
पर
सरकार
का
कामकाज
ठप्प
कर
दिया
गया।
सन्
1934 में
एन.पी.
केलकर
के
नेतृत्व
में
कांग्रेस
ने एक
अखिल
भारतीय
प्रजा
परिषद
क गठन
किया।
बंबई
में
इसके
तीन
अधिवेशन
हुए।
कालांतर
में
मध्यभारत,
विंंध्य
प्रदेश
तथा
भोपाल
प्रजा
मंडल
की
स्थापना
हुई।
जमनालाल
बजाज
और
हरिभाऊ
उपाध्याय
मध्यभारत
और
राजस्थान
में
प्रजा
मंडल
के
काम
के
लिए
उत्तरदायी
बनाए
गए।
प्रजा
मंडलों
ने
ग्वालियर,
इंदौर,
रीवा
बड़वानी
एवं
अन्य
रियासतों
में
अपना
कार्य
प्रारंभ
किया।
आर्यदत्त
जुगरान,
पटवर्धन,
बैजनाथ
महोदय,
गोपीकृष्ण
विजयवर्गीय,काशिनाथ
त्रिवेदी,
पी.एस.खोड़े,
श्री
खादीवाला,
मिश्रीलाल
गंगवाल,
बाबू
लाभचंद
छजलानी,
बाबूलाल,
तख्तमल
जैन,
भूताजी
आदि
के
नेतृत्व
में
प्रदेश
में
आंदोलन
आदि
होते
रहे।
कैप्टन
अवधेश
प्रताप
सिंह,
शंभुनाथ
शुक्ल,
रामसहाय
तिवारी
आदि
विंध्य
प्रदेश
में
सक्रिय
थे।
भोपाल
में
शाकिर
अली
खाँ
तथा
विदिशा
में
रामसहाय
सक्सेना
कार्य
कर
रहे
थे।
क्रांतिकारियों
में
झाबुआ
निवासी
चन्द्रशेखर
आजाद
सशस्त्र
संघर्ष
के
नेता
बने
तथा
उन्होंने
असंभव
कार्यों
को
सरअंजाम
दिया।
अंत
में
प्रयाग
के
अल्फ्रेड
पार्क
में
अंग्रेजों
से
मोर्चा
लेते
हुए
वे
शहीद
हुए।
15
अगस्त,
1947 को
देश
स्वतंत्र
हुआ।
मध्यभारत
की
सभी
रियासतों
को
मिलाकर
मध्यभारत
राज्य
बनाया
गया।
रीवा,
पन्ना,
छतरपुर
आदि
का
एकीकरण
कर
विंध्य
प्रदेश
बना।
भोपाल
को
राज्य
घोषित
किया
गया।
कालांतर
में
राज्य
पुनर्गठन
आयोग
की
सिफारिश
पर
सारी
रियासतों
का
क्लीनीकरण
कर
दिया
गया
और
इनमें
सी.पी.एंड
बरार
के
महाकौशल,
छत्तीसगढ़,
बस्तर
आदि
भाग
जोड़कर
1
नवंबर,
1956 को
मध्यप्रदेश
राज्य
का
निर्माण
हुआ।
इस
राज्य
की
राजधानी
भोपाल
बनाई
गई।
1
नवंबर
2000 को
पृथक
छत्तीसगढ़
राज्य
बनने
के
बाद
वर्तमान
मध्यप्रदेश
अस्तित्व
में
आया। |