मनोज
पाठक
बचपन
में जो
जिन
हाथों
ने
हमारी
नन्हीं
उँगलियाँ
पकड़कर
हमें
अपने
पैरों
पर खड़ा
होना और
चलना
सिखाया,
जीवन की
संध्या
में
उन्हीं
डगमगाते
उम्रदराज
पैरों
और
काँपते
हाथों
को
सहारा
देने का
दायित्व
हमारा
है।
जीवनभर
खेतों,
कल-कारखानों
में
कड़ी
मेहनत,
व्यापार,
काम-धंधों
की
भागदौड़
जनसेवा,
लोकसेवा
और कठिन
पारिवारिक
दायित्वों
को
निभाने
के बाद
थके हुए
बाजुओं
को
थामने
के
जिम्मेदारी
भी हम
सबकी
है।
सदियों
से यही
परम्परा
और
व्यवस्था
है कि
युवावस्था
से लेकर
वृद्धावस्था
की
शुरूआत
तक एक
पीढ़ी
अपनी
पारिवारिक
सामाजिक
और
राष्ट्रहित
की
जिम्मेदारियों
को
निभाती
है और
फिर नई
पीढ़ी
को यह
दायित्व
सौंप
देती
है। यही
हमारी
भारतीय
सभ्यता
और
अनूठी
संस्कृति
है।
जीवन की
भागदौड़
से थक
चुके
बुजुर्ग
फिर यही
उम्मीद
करते
हैं कि
शेष बचे
हुए
दिनों
में
उन्हें
वही
सम्मान
और
सुरक्षा
उन्हें
मिले
जिसके
वे
हकदार
हैं।
ऐसे
भावनात्मक
रिश्ते
अब
दुनिया
के तमाम
देशों
में
लगभग
खत्म हो
चुके
हैं।
वहाँ
बुजुर्गों
को बोझ
मानकर
ओल्ड
होम भेज
दिया
जाता है
और
हमारे
यहाँ आज
भी "दादा-दादी,
नाना-नानी"
की
मौजूदगी
से
स्नेह
और
वात्सल्य
की
बिखरती
सुगंधों
में
ईश्वर
की
मौजूदगी
का
अहसास
होता
है।
लेकिन
कुछ
बुजुर्ग
दुर्भाग्यवश
पारिवारिक
तिरस्कार
और
उपेक्षा
की वजह
से अपनी
ही उस
बगिया
से दूर
चले
जाते
हैं
जहाँ
उन्होंने
बागवान
बनकर
जीवनभर
खुशहाली
के फूल
खिलाए।
अगर
हमारे
वटवृक्ष
रूपी
बुजुर्ग
जीवन के
अंतिम
दिनों
में
पारिवारिक
छाया से
दूर,
असुरक्षित
और
तिरस्कृत
जीवन
बिताने
को
मजबूर
हो
जायें
तो यह
विडम्बना
ही है।
मध्यप्रदेश
देश में
उन
राज्यों
में से
एक है
जहाँ आज
भी हर
चप्पे-चप्पे
में
सभ्यता
और
संस्कृति
की
सौंधी
महक
महसूस
होती
है।
यहाँ
वृद्धजनों
के आदर-सम्मान
और
सुरक्षा
के लिये
सरकार
और समाज
दोनों
मिलकर
दायित्वों
का
निर्वहन
कर रहे
हैं।
प्रदेश
में
सामाजिक
न्याय
विभाग
द्वारा
वृद्धजनों
के
कल्याण
की
अनेकों
योजनाओं
और
कार्यक्रमों
को
बेहतर
तरीके
से
संचालित
किया जा
रहा है।
केन्द्र
और
राज्य
सरकार
की इन
योजनाओं
को
जरूरतमंद
वृद्धजनों
तक
पहुँचाने
के लिये
सरकारी
अमले के
साथ-साथ
हर शहर,
गाँव,
कस्बों
में
स्वयंसेवी
आगे
बढ़कर
मदद कर
रहे
हैं। इन
बुजुर्गों
का
सहारा
बनी
सामाजिक-सुरक्षा
और
पेंशन
योजनाएँ
उन्हें
सम्मानजनक
रूप से
जीवन
जीने का
भरोसा
दिला
रही
हैं।
ऐसे
वरिष्ठजन
जिनकी
उम्र 60
वर्ष से 64
तक है और
जो
गरीबी
रेखा के
नीचे
जीवनयापन
करने
वाले
बीपीएल
परिवारों
के
सदस्य
हैं
उन्हें
इंदिरा
गाँधी
वृद्धावस्था
पेंशन
योजना
के तहत 200
रुपये, 65
से 75 वर्ष
आयु के
वरिष्ठजनों
को 275
रुपये
और 80 वर्ष
या उससे
अधिक
आयु के
वरिष्ठजनों
को 500
रुपये
मासिक
पेंशन
देने का
इंतजाम
किया
गया है।
इसके
अलावा 60
वर्ष या
अधिक
आयु के
जो
वरिष्ठजन
नि:शक्त,
निर्धन
और
निराश्रित
हैं तथा
गरीबी
की रेखा
के नीचे
जीवनयापन
करने
वाले
परिवारों
बीपीएल
से नहीं
हैं,
उन्हें 150
रुपये
मासिक
पेंशन
दी जाती
है।
पेंशन
की राशि
उन्हें
उनके
बैंक या
पोस्ट-ऑफिस
खातों
से
मिलती
है। इन
पेंशन
योजनाओं
का लाभ
लेने के
लिये
उन्हें
शहरों
में नगर
पालिक
निगमों
और नगर
पालिकाओं
तथा
ग्रामीण
इलाकों
में
जनपद
पंचायत
में
आवेदन
करना
होता
है। इन
योजनाओं
की
मंजूरी
देने के
मक़सद
से
सक्षम
अधिकारी
म.प्र.
लोक
सेवाओं
के
प्रदाय
की
गारंटी
अधिनियम
2010 के
अंतर्गत
पदाविहित
अधिकारी
घोषित
हैं।
बुजुर्गों
के
सम्मान
और
सुरक्षा
की इन
योजनाओं
का
फायदा
बुजुर्गों
को समय
पर
मिलेगा।
इसमें
लेटलतीफी
या भूल-चूक
करने
वाले
दण्डित
होंगे।
बुजुर्गों
की
हिफ़ाजत
और
उन्हें
तिरस्कार
से
बचाने
में
केन्द्र
सरकार
का
कानून
मददगार
बन गया
है। यह
कानून
माता-पिता
और
वरिष्ठ
नागरिकों
का भरण-पोषण
तथा
कल्याण
अधिनियम,
2007 है, जो
प्रदेश
में 23
अगस्त, 2008
से लागू
किया
गया है।
इस
कानून
की मदद
से
अभिभावक
और
वरिष्ठ
नागरिक
जो अपनी
आय या
सम्पत्ति
की आय से
अपना
भरण-पोषण
करने के
काबिल
नहीं
हैं अब
वे अपने
वयस्क
बच्चों
अथवा
संबंधियों
से भरण-पोषण
का हक ले
सकते
हैं। अब
यह
कानून म.प्र.
माता-पिता
और
वरिष्ठ
नागरिकों
का भरण-पोषण
तथा
कल्याण
नियम-2009
के रूप
में
लागू
है।
इस
अधिनियम
के तहत
जिले
में
उपखण्डों
में
पदस्थ
अनुविभागीय
अधिकारी
(राजस्व)
की
अध्यक्षता
में भरण-पोषण
अधिकरण
तथा
समस्त
जिलों
में
जिला
मजिस्ट्रेट
की
अध्यक्षता
में
अपील
अधिकरण
तथा
समस्त
जिलों
में
जिला
मजिस्ट्रेट
की
अध्यक्षता
में
अपील
अधिकरण
गठित
है।
अधिकरण
द्वारा
वृद्धजनों
के
मासिक
भरण-पोषण
के लिये
अधिकतम
दस हजार
रुपये
तक देने
का आदेश
दिया जा
सकता
है।
वरिष्ठ
नागरिकों
की
उपेक्षा
और
परित्याग
एक
संज्ञेय
अपराध
माना
गया है,
जिसके
लिये
पाँच
हजार
रुपये
तक का
जुर्माना
या तीन
माह की
सजा या
दोनों
दण्ड एक
साथ हो
सकते
हैं।
अधिकरण
और
अपीलीय
अधिकरण
में
सहयोग
के लिये
सामाजिक
न्याय
विभाग
के
समस्त
जिला
अधिकारी
इस
अधिकरण
के तहत
भरण-पोषण
अधिकारी
के रूप
में
पदाविहित
हैं और
उनकी
सम्पत्ति
की
सुरक्षा
के लिये
पुलिस
अधीक्षक
जिम्मेदार
बनाये
गये
हैं।
वरिष्ठजनों
को मानव
अधिकारों
के तहत
संरक्षण-
भरण-पोषण
और उनके
स्वास्थ्य
की
देखभाल
तथा
उपचार
के लिये
भी
प्रभावी
कार्य
हो रहे
हैं।
सभी
शासकीय
चिकित्सालयों
में
वरिष्ठ
नागरिकों
को
बीमारी
के समय
इलाज और
बिस्तर
की
उपलब्धता
सुनिश्चित
की गई
है।
उन्हें
अस्पतालों
में
लंबी
लाइनों
में
खड़ा न
होना
पड़े, यह
भी
ध्यान
रखा जा
रहा है।
हमारा
समाज भी
वरिष्ठजनों
की
हिफाज़त
के लिये
जागरूक
है।
सरकार
द्वारा
समुदाय
के
सहयोग
से
निराश्रित
और
उपेक्षित
वृद्धजनों
को
संरक्षण
और उनके
भरण-पोषण
के लिये
राज्य
में 53
वृद्धाश्रम
और 6 डे-केयर
सेंटर
संचालित
हैं। अब
सरकारी
योजनाएँ
और
कानून
बुजुर्गों
के लिये
आशा की
किरण और
मजबूत
सहारा
सिद्ध
हो रहे
हैं।
|