मनोज
पाठक
सोलहवीं
सदी के
मध्य
में
भारत
में
विदेशियों
द्वारा
लाया
गया
तम्बाखु
आज
आधुनिक
भस्मासुर
का रूप
धारण
करता जा
रहा है।
इस बात
का
अंदाजा
लगाने
के लिये
किसी
स्वास्थ्य
सर्वेक्षण
के
परिणामों
में
नहीं
बल्कि
अपने
आसपास
ही
झाँकना
काफी
है।
मुँह
पूरा
नहीं
खुलना,
मुख एवं
शरीर से
बदबू
आना,
साँसें
जोर-जोर
से चलना,
उच्चारण
में
अस्पष्टता,
होंठ
काले
होना,
आँखों
का लाल
होना,
दाँतों
में
पीलापन
एवं
धब्बे,
काम
करते
वक्त
साँसें
फूलना,
दिनभर
सुस्ती
छायी
रहना,
मुँह
में
छाले
आना,
खाँसी
एवं
सीने
में
घरघराहट
होना
इत्यादि
कुछ ऐसे
सामान्य
लक्षण
हैं जो
तम्बाखु,
गुटका,
खैनी, नस,
सिगरेट,
बीड़ी
इत्यादि
किसी भी
तम्बाखु
उत्पाद
का सेवन
करने
वाले
व्यक्ति
में
जरूर
मिलेंगे।
यह भी तय
है कि
उनका
तम्बाखु
सेवन
इसी तरह
से जारी
रहा तो
उनमें
से किसी
को मुँह
का
कैंसर,
किसी को
गले का
कैंसर,
किसी को
फेफड़े
या छाती
का
कैंसर,
किसी को
टी.बी.
या किसी
को
नपुंसकता
या कोई
अन्य
बीमारी
जरूर हो
जायेगी
और वे एक
भयानक
मौत एवं
दु:खदाई
मौत का
शिकार
भी हो
सकते
हैं।
तम्बाखु
के कारण
प्रतिवर्ष
भारत
में 8
लाख
लोगों
की
मृत्यु
हो रही
है।
भारत
में
बीमारियों
की
रोकथाम
एवं
इलाज पर
होने
वाले
खर्चे
में से 40
प्रतिशत
तो
सिर्फ
तम्बाखु
से होने
वाली
बीमारियों
के इलाज
पर ही
खर्च हो
जाता
है।
बच्चों
को
सभ्यता
एवं
संस्कार
देने
वाले
बड़े
एवं
वयस्क
लोग आज
उन्हें
तम्बाखु
की भीषण
बीमारी
से
संरक्षण
देने के
बजाय
तम्बाखु
का
अभिशाप
उत्तराधिकार
में दे
रहे हैं,
यह बात 2004
के
ग्लोबल
यूथ
टोबैको
सर्वे
से
सामने
आती है
कि
ज्यादातर
बच्चे 13
से 16
वर्ष की
उम्र
में
तम्बाखु
का सेवन
शुरू
करते
हैं।
क्यों?
कारण
बिल्कुल
स्पष्ट
है
क्योंकि
वह
वयस्कों
को ऐसा
करते
देखते
हैं (इसी
सर्वे
के
मुताबिक
प्रत्येक
4
छात्रों
में से
एक के घर
पर कोई न
कोई
व्यक्ति
धूम्रपान
करता है)
और इस
उम्र
में
उनमें
अपने आप
को बड़ा
साबित
करने की
स्वाभाविक
वृत्ति
होती
है। जो
बच्चे
धूम्रपान
से बचना
भी
चाहते
हैं वे
भी नहीं
बच पाते
क्योंकि
वे
अप्रत्यक्ष
धूम्रपान
का
शिकार
होते
हैं।
अप्रत्यक्ष
धूम्रपान
से न
सिर्फ
बच्चे
बल्कि
अन्य
सामान्य
जन भी
प्रभावित
होते
हैं।
विभिन्न
अध्ययनों
से
ज्ञात
होता है
कि
अप्रत्यक्ष
धूम्रपान
भी
अत्यंत
घातक
होता
है।
अत:
आज
आवश्यकता
है कि हम
तम्बाखु
के
बढ़ते
प्रकोप
को
शीघ्रताशीघ्र
काबू
में
लायें
एवं उसे
इस
दुनियाँ
से मिटा
दें
लेकिन
यह
कार्य
एक दिन
में
संभव
नहीं है
बल्कि
इसके
लिये
दृढ़
इच्छाशक्ति,
प्रभावी
जन-जागरण,
संयुक्त
प्रयास,
समाज के
सभी
वर्गों
की
प्रभावी
सहभागिता
एवं
योजनाबद्ध
रणनीति
की
आवश्यकता
है।
तम्बाखु
को जड़
से
मिटाने
हेतु एक
सतत्
कार्यक्रमों
को
चलाने
के
अतिरिक्त
प्रतिवर्ष
31 मई को
विश्व
तम्बाखु
निषेध
दिवस के
रूप में
मनाया
जाता
है। इस
दिन का
विशेष
महत्व
इसलिये
है कि इस
दिन
पूरा
विश्व
तम्बाखु
को जड़
से
मिटाने
हेतु
कृतबद्ध
होता
है। इस
अवसर का
उपयोग न
केवल
अपने
विरोध
प्रकट
करने के
लिये
बल्कि
जन-जागरण,
तम्बाखु
के
विरुद्ध
पैरवी
एवं
सारी
दुनियाँ
को इस
मुहिम
में
जोड़ने
के लिये
भी
उपयोग
होता
है।
प्रत्येक
वर्ष की
भाँति
इस वर्ष
भी 31 मई
को भारत
सहित
पूरे
विश्व
में
विश्व
तम्बाखु
निषेध
दिवस
मनाया
जायेगा।
इस वर्ष
तम्बाखु
निषेध
दिवस का
मुख्य
विषय "तम्बाखु
नियंत्रण
के लिये
विश्व
स्वास्थ्य
संगठन
का
फ्रेमवर्क
कनवेन्शन
(FCTC)''
है।
तम्बाखु
के
उपयोग
को
हतोत्साहित
करने के
लिये
विश्व
स्वास्थ्य
संगठन
के
माध्यम
से
विश्व
के 170
देशों
द्वारा
अंतर्राष्ट्रीय
संधि "तम्बाखु
नियंत्रण
के लिये
फ्रेमवर्क
कनवेन्सन
(FCTC)''
लागू की
गई है।
इस संधि
के
प्रमुख
उद्देश्य
निम्नलिखित
हैं:-
-
तम्बाखु
उत्पादों
को
नियंत्रित
करना
-
तम्बाखु
उत्पादों
के
हानिकारक
प्रभावों
के
प्रति
लोगों
को
जागरूक
करना।
-
लोगों
को
प्रत्यक्ष
एवं
अप्रत्यक्ष
धूम्रपान
के
दुष्परिणामों
से
बचाना।
-
तम्बाखु
उत्पादों
के
विज्ञापन,
प्रचार
एवं
प्रायोजन
पर
प्रतिबंध
लगाना।
-
तम्बाखु
का
उपयोग
करने
वालों
को उसे
छोड़ने
में
सहायता
करना
इत्यादि।
उपरोक्त
संधि को
भारत
में
लागू
करने के
लिए
भारत
शासन
द्वारा
तम्बाखु
नियंत्रण
अधिनियम
2003 एवं
राष्ट्रीय
तम्बाखु
नियंत्रण
कार्यक्रम
लागू
किया
गया है।
ऐसा
नहीं है
कि
विश्व
तम्बाखु
निषेध
दिवस के
अवसर पर
सिर्फ
उपरोक्त
मुद्दे
ही
उठाये
जायेंगे
बल्कि
जैसा कि
पूर्व
में कहा
गया है
इस दिन
पूरा
विश्व
तम्बाखु
को जड़
से
मिटाने
हेतु
संकल्पबद्ध
होगा।
इस
संकल्प
को जन-जागरण
रैली,
प्रदर्शनी,
विचार
गोष्ठी,
कार्यशाला,
सूचना
शिक्षा
एवं
संचार
गतिविधियाँ,
शालेय
कार्यक्रम
इत्यादि
अन्य
गतिविधियों
के
माध्यम
से
प्रकट
किया
जायेगा।
मध्यप्रदेश
में
तम्बाखु
के सेवन
की बात
करें तो
नेशनल
फैमली
हैल्थ
सर्वे-3, 2006
के
अनुसार
प्रदेश
में कुल
69
प्रतिशत
पुरुष
तम्बाखु
उत्पादों
का सेवन
करते
हैं
जबकि
प्रदेश
की 16
प्रतिशत
महिलाएँ
तम्बाखु
का सेवन
करती
हैं।
यदि
सिर्फ
धूम्रपान
के
आँकड़े
देखे तो
प्रदेश
के 40
प्रतिशत
पुरुष
धूम्रपान
करते
हैं एवं
0.5
प्रतिशत
महिलाएँ
भी
धूम्रपान
करती
हैं।
उपर्युक्त
तथ्यों
को
ध्यान
में
रखते
हुए
मध्यप्रदेश
ने
राष्ट्रीय
तम्बाखु
नियंत्रण
कार्यक्रम
प्रदेश
में
सक्रियता
से लागू
करते
हुए
विभिन्न
गतिविधियाँ
चलाई
हैं
ताकि
प्रदेश
के
लोगों
में
जागरूकता
आये एवं
तम्बाखु
का
नियंत्रण
किया जा
सके। इस
कार्यक्रम
के
प्रभावी
क्रियान्वयन
हेतु
मध्यप्रदेश
में
राज्य
तम्बाखु
नियंत्रण
प्रकोष्ठ
का गठन
भी किया
गया है।
पिछले
वर्ष की
भाँति 2011
में भी 31
मई को
विश्व
तम्बाखु
दिवस
प्रदेश
भर में
मनाया
जाएगा।
इसके
लिये
राज्य
स्तर से
लेकर
ग्रामीण
क्षेत्रों
में
विभिन्न
गतिविधियाँ
की
जायेंगी।
राज्य
स्तर पर
अधिकारियों,
विभिन्न
गैर
शासकीय
तथा
सामाजिक
संस्थाओं
की बैठक
आयोजित
होगी।
राज्य
स्तरीय
संकल्प
रैली
निकाली
जायेगी।
इसे
सत्याग्रह
का रूप
भी दिया
जायेगा।
इसी
प्रकार
तम्बाखु
के
विरुद्ध
महिला
सम्मेलन
भी
आयोजित
होंगे।
तम्बाखु
निषेध
के लिये
प्रिंट
एवं
इलेक्ट्रॉनिक
मीडिया
के
माध्यम
से
संदेश,
विज्ञापन
तथा
तम्बाखु
की
हानियों
की
जानकारी
देने के
लिये
कार्यक्रमों
को
प्रसारित
भी किया
जायेगा।
जिला
स्तर पर
शहरों
और
ग्रामों
में आम
लोगों
में
जागरूकता
लाने के
लिये
तम्बाखु
विरोधी
रैली,
तम्बाखु
विरोधी
सम्मेलन
एवं
परिचर्चा,
तम्बाखु
विरोधी
सामूहिक
शपथ
ग्रहण
कार्यक्रम,
पोस्टर,
स्लोगन,
निबंध
इत्यादि
प्रतियोगिताएँ
आयोजित
होंगी।
तम्बाखु
निषेध
के लिये
कार्यालय
एवं
अन्य
सार्वजनिक
परिसर
को
तम्बाखु
मुक्त
परिसर
घोषित
किया
जायेगा।
कार्यालय
या
परिसर
में
तम्बाखु
मुक्त
पोस्टर
या
तम्बाखु
निषेध
की
सूचना
चस्पा
होगी और
तम्बाखु
नियंत्रण
हेतु
तम्बाखु
नियंत्रण
प्रहरियों
की
नियुक्ति
की
जायेगी।
तम्बाखु
के
विरुद्ध
सत्याग्रह
के
जरिये
तम्बाखु
का सेवन
करने
वालों
को फूल
देकर
उनका
तम्बाखु
त्याग
कराने
का
प्रयास
होगा और
तम्बाखु
दुकानों
पर
दुकानदार
को
तम्बाखु
नियंत्रण
कानून
की
जानकारी
देना
एवं
इनका
पालन
करने
हेतु
आग्रह
किया
जायेगा।
लोगों
को
प्रोत्साहित
करने के
लिये
तम्बाखु
नियंत्रण
के
क्षेत्र
में
प्रशंसनीय
कार्य
करने
वाले
व्यक्तियों
एवं
संस्थाओं
को
पुरस्कृत
किया
जायेगा
तथा
तम्बाखु
का
त्याग
करने
वाले
व्यक्तियों
का
सम्मान
भी किया
जायेगा।
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