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आलेख

जन-आस्था पाने में सफल रहे हैं श्री शिवराज सिंह चौहान

भोपाल : शनिवार, 26 नवंबर, 2011


योगेश शर्मा

समय के साथ परिस्थितियों, मान्यताओं और धारणाओं में व्यापक बदलाव आ गये हैं। राजनैतिक नेतृत्व का क्षेत्र भी इस सच्चाई से अछूता नहीं रहा है। अब हर आम नज़रें ऐसे नेता की तलाश करती दिखती हैं जो अपनत्वपूर्ण और बिलकुल सामान्य या साधारण व्यक्तित्व का हो। मध्यप्रदेश में बीते आधे दशक में ऐसे ही एक चेहरे पर लोगों की नज़रें ठहरती दिखी हैं और यह आस्थापूर्ण विश्वास हासिल करने का हक पाया है मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने।

दो महीने पहले दिल्ली के रामलीला मैदान पर समाज-सेवी अण्णा हजारे के आव्हान पर जुटा जन-सैलाब और पूरे देश में इससे फैली नई क्रांति की लहर से समूचा विश्व भी आज अंजान नहीं है। उस व्यापक जन-समर्थन को सिर्फ अण्णा के आंदोलन की शक्ल में तौलना पर्याप्त नहीं है। वास्तव में तो यह जन-समर्थन त्यागपूर्ण जीवन, सिद्धांतपूर्ण कार्य-शैली, सामाजिक-राजनैतिक दुरावस्थाओं में बदलाव की प्रतिबद्धता और लोगों से भीतर तक जुड़ने की सार्मथ्य का प्रतीक था। इस जन-समर्थन ने यह भी साबित किया कि लोग अब कैसा नेतृत्व चाहते हैं। ऐसा नेतृत्व जिसने नि:संकोच आस्था जतायी जा सकती है। बल्कि, इसे यूँ कहें कि भारत-वर्ष में लोकतंत्र को सही मायनों में इसके मूल स्वरूप और अभिप्राय में पुनर्जीवित करने का वक्त आ गया है तो यह कदापि आश्चर्यजनक नहीं है।

मध्यप्रदेश में लोगों की ऐसे नेतृत्व की तलाश लम्बी नहीं रही है। इसे लेकर घर और बाहर अक्सर होने वाली चर्चाओं में श्री शिवराज सिंह चौहान का नाम आसानी से शुमार होता है। ऐसी चर्चाओं में इस नाम का जिक्र होने के पीछे बीते छह सालों के कई घटनाक्रम हैं जिनमें इस प्रदेश के मुख्यमंत्री के बतौर श्री शिवराज सिंह चौहान ने नये इतिहास रचे हैं। लोगों ने समाज-सुधार और प्रगति के कई उपायों में शिवराज सिंह के समर्पणपूर्ण, कर्मठ और जुझारु कृतित्व को ही नहीं आँका, बल्कि उनकी हर काम में लगातार मौजूदगी को भी परखा है। उनके प्रति बढ़ते जन-विश्वास और जन-आधार के ये ही स्वाभाविक और वास्तविक कारण हैं।

मध्यप्रदेश में अब तक के विभिन्न शासन-काल के नेताओं पर नज़रें दौड़ाएँ तो नितांत साधारण परिवेश, पृष्ठभूमि और आम व्यक्तित्व वाला एक ही नाम दिखलाई पड़ता है और वह श्री शिवराज सिंह चौहान का। आमतौर पर किसी भी राजनैतिक दल में चुनावों के बहुत पहले नेता विशेष को मुख्यमंत्री के रूप में उभार कर और उसके सहारे जीत हासिल करने की प्रवृत्ति रही है। सब जानते हैं कि श्री शिवराज सिंह चौहान को लेकर उनके राजनैतिक दल ने ऐसी कोई रणनीति नहीं अपनाई थी। मध्यप्रदेश में साल 2003 में विधानसभा का आम-चुनाव भारतीय जनता पार्टी ने उनके नाम पर नहीं लड़ा था और न ही चौहान को उस वक्त सरकार की बागडोर सौंपी गई। पार्टी हाई-कमान ने दो साल बाद उन्हें नेतृत्व की जिम्मेदारी सौंपी।

अपने मुख्यमंत्रित्व के दौरान मुख्यमंत्री के बतौर शिवराज सिंह चौहान ने न सिर्फ लोक-कल्याण के विभिन्न फैसले कर बल्कि वास्तविक अर्थों में लोगों से जुड़कर उनके दिलों में जगह बनाई। उनकी मेहनत, समर्पण और प्रगति की संघर्षपूर्ण कोशिशों ने ही उन्हें दोबारा सत्ता पर काबिज़ होने का हक़ दिया और साल 2008 में बनी राज्य सरकार के नेतृत्व के भी उन्होंने तीन कामयाब साल पूरे कर लिये हैं।

अण्णा हजारे जी ने देश में सिटीजन चार्टर लागू करने की माँग तीन महीने पहले उठाई है। मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान प्रशासनिक ढाँचे में कसावट के लिये खुद की प्रबल और दृढ़ इच्छा-शक्ति से डेढ़ साल पहले यह काम लोक सेवा गारंटी कानून लाकर कर चुके हैं। भारत में मातृत्व-शक्ति की गौरवमयी पर लुप्त हो चुकी परम्परा को न सिर्फ पुनर्जीवित करने बल्कि इसके लिये भविष्य की मजबूत बुनियाद कायम करने की पहली सार्थक कोशिश भी श्री शिवराज सिंह चौहान ने की है। उनके द्वारा शुरू की गई गाँव की बेटी, लाड़ली लक्ष्मी, मुख्यमंत्री कन्यादान जैसी कल्याण योजनाओं को सिर्फ तात्कालिक फायदों में तौलना ही पर्याप्त नहीं है। इन कोशिशों में वर्षों पुरानी सामाजिक दुरावस्थाओं और कुरीतियों को खत्म कर महिलाओं के हक में एक अत्यंत सुरक्षित तथा समृद्ध जीवन की निश्चितता साफ दिखलाई पड़ती है।

 


 

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