उमेश
त्रिवेदी
शिवराज
सिंह
चौहान 29
नवम्बर,
2011 को
अपने
मुख्यमंत्रित्वकाल
के छह
साल
पूरे कर
रहे
हैं। यह
भी
संयोग
है कि
इसी
नवम्बर
की पहली
तारीख
को
मध्यप्रदेश
अपने
निर्माण
के 56 वर्ष
पूरे कर
चुका
है।
शिवराज
प्रदेश
के ऐसे
दूसरे
बड़े
नेता
हैं,
जिन्होंने
मुख्यमंत्री
के रूप
में
इतने
वर्षों
तक
राज्य
में
शासन
किया।
इसके
पहले
कांग्रेस
के
दिग्विजयसिंह
एकमात्र
ऐसे
नेता थे,
जिनका
मुख्यमंत्री
के रूप
में
कार्यकाल
10 वर्ष का
रहा है।
इन
तथ्यों
को
रेखांकित
करने का
आशय
सिर्फ
यह है कि
इतिहास
निर्मम
होता है
और उसकी
समीक्षाएँ
उससे
ज्यादा
निर्मम
होती
हैं।
किसी भी
राज्य
की
विकास
की
इबारत
लिखने
और लय
बनाने
में उस
प्रदेश
के
सत्ताधीशों
का
महत्वपूर्ण
योगदान
होता
है। इन
संदर्भों
में जिन
कसौटियों
पर
शिवराज-सरकार
के
कार्यकलापों
की
समीक्षा
होनी है,
वो कोई
नरम या
लचीली
तो कतई
नहीं
होंगी।
उन्हें
भी राई-रत्ती
और तोला-माशा
की तर्ज
पर ही
तौला और
नापा
जाएगा।
जिंदगी
में कई
मुकाम
ऐसे
होते
हैं,
जहाँ
कसौटियों
का
काँटों
भरा ताज
हर वक्त
माथे पर
सजा
रहता
है।
सार्वजनिक
जीवन
में
मुख्यमंत्रित्व
भी एक
ऐसा ही
मुकाम
है।
सत्ता
का यही
तकाजा
है कि जब
तक आप
शासन पर
काबिज
हैं, तब
तक चैन
से बैठ
पाना
संभव
नहीं
है।
फूलों
के साथ
कांटे
को
शिरोधार्य
करना
सत्ता
की
नियति
है। फिर
राजनेताओं
के लिए
कसौटियाँ
भी कभी
एक जैसी
नहीं
होती
हैं।
सार्वजनिक
जीवन की
सबसे
बड़ी
चुनौती
ही यह है
कि कोई
आपकी 'बॉडी-लेंग्वेज'
को 'मीटर'
में
नापता
है, तो
कोई 'किलोग्राम'
में
तौलता
है।
कहीं
आपके
संवादों
को 'कम्युनिकेशन-मोड'
में
डालकर
समझने
की
कोशिश
होती है,
तो कभी
चेहरे
की
भावभंगिमा
के 'कोड'
को
तोड़ने
के
प्रयास
होते
हैं।
कभी
आँखों
की भाषा
पढ़ी
जाती है,
तो कभी
माथे पर
छलकती
पसीने
की
बूँदों
से कयास
लगाए
जाते
हैं। यह
भी
चर्चा
होती है
कि आपने
दायीं
तरफ
किसको
देखा और
बायीं
तरफ
किससे
नजरे
चुराईं।
आपके
संवादों
का
तापमान
क्या है
या किन
शब्दों
को आपने
वजनदारी
से बोला
है और
किन
शब्दों
को महज
फुसफुसा
दिया
है।
विज्ञान
में हर 'एलीमेंट'
या तत्व
की 'ग्रेविटी'
तय होती
है।
घनत्व
में
फर्क
नहीं
होता,
लेकिन
जीवन-शास्त्र
में ये
सभी 'वेल्यूज'
कदम-कदम
पर
बदलती
हैं।
समय,
परिस्थितियाँ,
जात-बिरादरी,
देश-परदेश
और
इतिहास-भूगोल
के मान
से
व्यक्ति-व्यक्ति
के स्तर
पर इन 'वेल्यूज'
में
बदलाव
होता
है।
सार्वजनिक
जीवन
में
लाखों
आँखें
आपको
देखती
हैं और
लाखों
आँखें
आँकती
हैं।
यदि आप
शिखर की
शख्सियत
हैं तो
परिस्थितियाँ
और कठिन
हो जाती
हैं,
क्योंकि
आपके
नजदीक
खड़ा
व्यक्ति
आप में
गुणों
से
ज्यादा
दोषों
की तलाश
करता
है।
सत्ता
के शिखर
पर
संतुलित,
संयमित
और
सतर्क
रहते
हुए
स्वयं
को
साधना
अपने आप
में
बड़ा
संघर्ष
है।
चाहें
आप
मुख्यमंत्री
हों या
कुछ और,
सत्ता
के शिखर
कभी भी
निरापद
नहीं
होते
हैं।
शिखर तक
पहुँचने
का
मार्ग
अपेक्षाकृत
आसान
होता है
बनिस्बत
इसके कि
आप शिखर
पर बने
रहें।
चाहे
सत्ता
का
सिंहासन
हो या
पहाड़ों
की चोटी,
कोई भी
शिखर
कभी भी
निरापद
नहीं
होता
है।
शिखर पर
धूप भी
झुलसाने
वाली
होती है
और
सर्दी
भी
काटने
वाली
होती
है।
साँसों
की थकान
भी
ज्यादा
महसूस
होती
है।
शिखर का 'एरिया'
भी नपा-तुला
और
फिसलन
भरा
होता
है। ऐसे
में खुद
को पहले
शिखर पर
स्थापित
करना,
फिर
अंगद की
तरह
पैरों
को
जमाकर
खड़े हो
जाना
अपने आप
में
श्रम
साध्य,
दम
साध्य
और दु:साध्य
राजनीतिक
कलाबाजी
और कसरत
है।
उसके
बाद
ऊर्जा
को
संजोकर
अलग-अलग
धरातल
पर
भिन्न-भिन्न
तुलाओं
के बीच
संतुलन
के साथ
राजनीतिक
और
प्रशासनिक
तोल-मोल
को
अंजाम
देना
दुरूह
काम
होता
है।
ऐसी
सभी
विपरीत
परिस्थितियों
को 'डील'
करने या
उनसे
निपटने
में
किसी
राजनेता
की
पारंगतता
ही शिखर
के
सिंहासन
पर आपकी 'लांगेविटी'
तय करती
है।
मुख्यमंत्री
शिवराजसिंह
चौहान
यदि छह
साल से
प्रदेश
के
मुख्यमंत्री
हैं तो
निश्चित
ही
उनमें
करिश्मा
है। वो
सत्ता
के शिखर
पर बिछी
शतरंज
की
बिछात
के हर
पांसे
को
बखूबी
खेलना
जानते
हैं। यह
इसलिए
भी
महत्वपूर्ण
है,
क्योंकि
भारतीय
जनता
पार्टी
में
पहली
पंक्ति
में
खड़े
नेताओं
की कमी
नहीं
है।
उनके
अरमान
भी
कुलांचे
भरते
हैं।
अरमानों
का यह
क्रीड़ांगण
समतल तो
कदापि
नहीं
है। फिर
भी यदि
सब कुछ
वर्तमान
गति से
चलता
रहा तो
अगले
विधानसभा
चुनाव
तक वो
मुख्यमंत्री
के रूप
में
अपनी
पारी के
आठ साल
पूरे कर
लेंगे।
मध्यप्रदेश
के गठन
के बाद
राज्य
में
कांग्रेस
के 10,
भारतीय
जनता
पार्टी
के छह और
संविद
के एक
नेता
मुख्यमंत्री
के नाते
प्रदेश
की कमान
संभाल
चुके
हैं।
इनमें
कांग्रेस
के
दिग्विजय
सिंह को
छोड़कर
किसी भी
नेता ने
सत्ता
की इतनी
लंबी
पारी
नहीं
खेली,
जितनी
शिवराजसिंह
ने खेली
है।
गौरतलब
यह है कि
शिवराजसिंह
अभी भी
पिच पर
बने हुए
हैं।
राजनीतिक
समीक्षकों
की
मानें
तो
फिलवक्त
मध्यप्रदेश
की
राजनीतिक-पिच
पर यदि
वो
स्वयं 'हिट
विकेट'
नहीं
हुए तो
उन्हें
आउट कर
पाना
संभव
नहीं
है।
राजनीति
की पिच
कभी भी
सपाट या
बेजान
नहीं
होती
है।
जरूरत
पिच को
पढ़कर
परिस्थितियों
के
अनुसार
गेंदबाजी
करने की
होती
है।
लेकिन
वर्तमान
में
प्रतिपक्षी
दल
कांग्रेस
की
गेंदबाजी
में न तो
तेजी है,
न ही
उछाल
है। वे
तो गेंद
को 'स्पिन'
या 'स्विंग'
भी नहीं
करवा पा
रहे
हैं।
नतीजतन
शिवराजसिंह
निरापद
और
निर्भयतापूर्वक
पिच पर
बने
रहने के
मामले
में
आश्वस्त
हैं। यह
कहना या
मानना
न्यायोचित
नहीं
होगा कि
शिवराजसिंह
को ये
आरामदेह
परिस्थितियाँ
उत्तराधिकार
में
उधार
खाते
में
मिली
हैं।
उन्होंने
यह सब
कुछ
अपने
राजनीतिक
पुरुषार्थ,
परिश्रम
तथा
पारंगतता
से
हासिल
किया
है।
उनके
ठेट
गंवई
परिवेश
में
सहजता,
सरलता
के साथ-साथ
एक
चातुर्यपूर्ण
सतर्कता
भी है,
जिसने
उन्हें
राजनीति
में
होने
वाली
अय्यारी
को
सूँघने,
समझने
और
समेटने
का
सार्मथ्य
दिया
है। वो
सत्ता
और
संगठन
में
पक्ष-विपक्ष
के पिच
पर हर
बाउन्सर,
स्विंग
या
फिरकी
गेंदबाजी
को
बखूबी
समझकर
बाउण्ड्री
के पार
भेजने
में
समर्थ
हैं।
शिवराज
एक बार
विधानसभा
चुनाव
का
सामना
कर अपनी
नेतृत्व
क्षमता
का लोहा
स्थापित
कर चुके
हैं और
दूसरे
चुनाव
का
सामना
करने को
तैयार
हैं।
तथ्य और
तर्क
शिवराजसिंह
के पक्ष
में
हैं।
मुद्दों
की पकड़
उनमें
है।
उनकी
उंगलियाँ
आम जन की
नब्ज को
बखूबी
पढ़ एवं
समझ
लेती
हैं।
शब्दों
को
भावनाओं
के
प्रवाह
के साथ
गढ़ने
तथा
गूँथने
की
नैसर्गिक
शक्ति
उनके
पास है।
व्यक्तित्व
की देशज
तरलता
उन्हें
दूरदराज
देहातों
के धूल-धूसर
देहातियों
के
नजदीक
स्वाभाविक
रूप से
खड़ा कर
देती
है। यह
उनका
जबरदस्त
'प्लस-पॉइंट'
है।
मध्यप्रदेश
का
इतिहास
पक्ष-विपक्ष
के
दिग्गज
नेताओं
की
राजनीति
के
किस्से-कहानियों
से पटा
पड़ा
है।
कुर्सी
के
संग्राम
में
यहाँ
हल्दी-घाटी
की
लड़ाइयाँ
भी लड़ी
गईं और
महाभारत
की
गाथाओं
का कूट-मंचन
भी
बखूबी
खेला
गया है।
राजनीति
में
जितने
भी
हथकंडों
का
इस्तेमाल
होता
रहा है,
वह यहाँ
भी हुआ
है। जो
भी नेता
यहाँ
मुख्यमंत्री
बने,
उन्होंने
अपने
राजनीतिक
कौशल से
उन
बाधाओं
को पार
किया, जो
अवरोध
बनकर
सामने
खड़ी
थीं। उन
सभी की
राजनीतिक
शैली की
अपनी
विशिष्टता
और
दक्षता
थी।
दिलचस्प
यह है कि
उन
दिग्गज
और
बुजुर्गवार
नेताओं
की जमात
में
तुलनात्मक
दृष्टि
से
शिवराजसिंह
भी किसी
भी स्तर
पर कमतर
नहीं
बैठते
हैं।
उन्होंने
खूब
राजनीति
की,
लेकिन
सत्ता
के बहाव
में
अपने
हाथ
गंदे
नहीं
होने
दिए।
यदि
मध्यप्रदेश
निर्माण
के बाद
पं.
रविशंकर
शुक्ल,
भगवंतराव
मंडलोई
या
कैलाशनाथ
काटजू
के
कालखंड
को छोड़
दिया
जाए, जब
प्रदेश
में
सत्ता
संघर्ष
अपेक्षाकृत
नगण्य
था, तो
सत्तर
के दशक
या उसके
बाद बने
मुख्यमंत्रियों
की
कहानियों
के परत-दर-परत
किस्से
या कूट-कथाओं
में
राजनीतिक
रोमांच
भरपूर
है।
कहानी
शिवराजसिंह
की भी कम
रोमांचकारी
नहीं
है। अब
वो भी एक
मँजे
हुए
नेता की
तरह लय
पकड़
चुके
हैं और
राजनीति
के आरोह-अवरोह
और
बंदिशों
की
क्लासिकी
में भी
वो किसी
गफलत
में
नहीं
फंसते
हैं।
प्रदेश
में हर
मुख्यमंत्री
की अपनी
कूट-शैली
और
रणनीतिक-व्यक्तित्व
रहा है।
पं.
द्वारकाप्रसाद
मिश्र
में
जहाँ
जैसी
बौद्धिकता
और
पटुता
थी, वहीं
उन्हें
अपदस्थ
करने
वाले
ठाकुर
गोविन्द
नारायण
सिंह की
भाव-भंगिमाओं
में
अहंमन्यता,
स्वत्व
और
प्रतिकारात्मकता
थी। पं.
श्यामाचरण
शुक्ल
की
कार्यशैली
में
आभिजात्य
गर्वीलापन
था, तो
प्रकाशचंद
सेठी
वाणिज्यिक
चतुराई
के साथ
तोल-मोल
करते
थे।
वीरेन्द्र
कुमार
सखलेचा
की सोच
में
संघी
ठसक तथा
कड़कपन
था, वहीं
कैलाश
जोशी के
मुख्यमंत्रित्व
में
सीधेपन
की सरल
रेखाएँ
थीं। इन
दोनों
के बाद
मुख्यमंत्री
बने
भाजपा
के
तीसरे
बड़े
नेता
सुन्दरलाल
पटवा के
राजनीतिक
व्यक्तित्व
में
संगठनात्मक
पराक्रम,
वणिक-चातुर्य
के साथ-साथ
अनुभवी
दृष्टि
एवं
प्रशासनिक
पहचान
थी।
कांग्रेस
की
श्रृंखला
में
प्रकाशचंद
सेठी के
बाद
अर्जुनसिंह
का क्रम
आता है।
अर्जुनसिंह
एक
बुद्धिमान
राजनेता
थे,
जिन्हें
सौजन्य,
संस्कृति
की
साजिश
की
राजनीति
में
माहिर
माना
जाता
था।
उनके
उत्तराधिकारी
के रूप
में
मोतीलाल
वोरा की
गिनती
सहज, सरल
और सपाट
राजनीतिज्ञों
में
होती
रही है।
दिग्विजयसिंह
की
राजनीतिक
चमक में
पारे
जैसी
तरलता,
तत्परता
और
त्वरितता
थी।
उन्हें
इस बात
में
महारत
हासिल
थी कि
राजनीति
के
तापमान
को
नापकर
उसके
अनुरूप
आकार
धारण कर
लें।
उमा
भारती
भाजपा
में
उन्मादी
तथा
अनियंत्रित
राजनीति
का
पर्याय
बनकर
उभरीं,
तो
बाबूलाल
गौर ने
अपनी
कार्यशैली
में एक
सधे और
कुशल
खिलाड़ी
होने का
परिचय
दिया।
और,
सबसे
अंत में
शिवराजसिंह
की
मीमांसा
करेंगे
तो सहज
ही समझ
में आ
जाएगा
कि वो
किस
मिट्टी
के बने
हैं?
उन्होंने
राजनीति
का
साधारणीकरण,
सामाजिकीकरण
और
सरलीकरण
करके
उसमें
आमजनों
के लिए
जगह
बनाई
है।
उनके
शस्त्रागार
में
विनयशीलता,
विनम्रता,
विनोदशीलता
जैसे
हथियार
भी हैं,
जो उनके
व्यक्तित्व
का
नैसर्गिक
हिस्सा
हैं।
कूटनीतिक
नजरिए
से ये
गुण कई
मर्तबा
काफी
मारक
सिद्ध
होते
हैं।
सार्वजनिक
जीवन
में
सीधेपन
की
सौंधी
खुशबू
का असर
व्यापक,
गहरा
होता है
और एक
नेता को
आमजन के
नजदीक
खड़ा
करने
में
सबसे
ज्यादा
मददगार
होता
है।
शिवराजसिंह
के लिए
शायद
उनकी ये
खूबियाँ
लाभदायी
काम कर
रही
हैं।
सत्ता
की
उपलब्धियों
के ताने-बाने
में,
चाहे वो
किसी भी
राजनीतिक
दल
द्वारा
शासित
हों, कोई
विशेष
फर्क
नहीं
होता
है।
सरकार
एक
रंगहीन,
गंधहीन
उपक्रम
का नाम
है।
उसकी
प्रक्रियाओं
में
मतानुसार
और
मनानुसार
रंगों
और
गंधों
को भरा
जा सकता
है। सभी
सरकारें
ऐसा ही
करती
हैं,
क्योंकि
उनकी
गतिशीलता
एवं
गंतव्य
लगभग
समान या
उन्नीस-बीस
होते
हैं।
सरकारी
जुमलों
की भाषा
अथवा
निहितार्थ
भी लगभग
अपरिवर्तनीय
रहते
हैं।
सिर्फ
शब्दों
की हेरी-फेरी
करके या
नए
मुहावरों
को
गढ़कर
बदलाव
के भाव
पैदा
किए
जाते
हैं।
अंतर
केवल इस
बात से
पड़ता
है कि
आपकी
प्राथमिकताएँ
क्या
हैं और
वो आपके
कार्यकलापों
में
कैसे
परिलक्षित
हो रही
हैं?
उसकी
प्रस्तुति
में
क्या
कमाल
किया
गया है?
शिवराजसिंह
ने
प्राथमिकताएँ
चुनने
में गजब
की सूझ-बूझ
का
परिचय
दिया
है।
उन्होंने
देहातों
के मर्म
को समझा
है और
उसे
अपनी
राजनीति
का
हिस्सा
बनाया
है।
ग्रामीण
महिलाओं
की
जरूरतों
को
समझकर
उन्होंने
उनसे एक
भावनात्मक
रिश्ते
की डोर
बाँधी
है।
ग्रामीणों
में
आश्वस्ति
का यह
भाव ही
उनकी
सबसे
बड़ी
ताकत
है।
जाहिर
है कि
सफर अभी
जारी है
और
चुनौतियाँ
बेशुमार
हैं।
समाज के
मोर्चे
साधने
के साथ
उन्हें
उतनी ही
शिद्दत
से
प्रदेश
में
विकास
के
मुद्दों
को भी 'एड्रेस'
करना
है। (मध्यप्रदेश
संदेश
से)
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