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आलेख

भोपाल में राजा भोज प्रतिमा लोकार्पण

नई पीढ़ी भी जाने राजा भोज का योगदान और गौरवशाली इतिहास

भोपाल : शनिवार, 26 फरवरी, 2011


अशोक मनवानी

मध्यप्रदेश का पुरातात्विक वैभव विश्व भर के पुरातत्व और पर्यटन प्रेमियों को आकर्षित करता रहा है। पुरा संपदा प्रदेश की महत्वपूर्ण धरोहर होती है। इनमें से खजुराहों, ओरछा, महेश्वर, ग्यारसपुर, उदयगिरी और मांडव के मंदिर और स्मारक विश्व प्रसिद्व है। इसी तरह रायसेन जिले में स्थित भोजपुर का शिवमंदिर भोजपुर को एक विशेष सांस्कृतिक केन्द्र के रूप में प्रतिष्ठापित करता है।

भोजपुर के मध्ययुगीन मंदिर की स्थापत्य कला निराली है। रायसेन जिले की गौहरगंज तहसील में ग्यारहवीं सदी में परमार शासक राजाभोज (1010-1055 ईस्वी) की शख्सियत की पहचान कराने वाले शिवमंदिर के निकट एक प्राचीन बांध के अवशेष आज भी दृष्य है। भोपाल नगर अपने संस्थापक राज भोज के राज्यरोहण के एक हजार बरस पूरे होने पर कई आयोजन भी कर रहा है। भोपाल झील के वीरान बुर्ज पर राजाभोज की प्रतिमा स्थापित की गई है। इस प्रतिमा ने भोपाल की नई पहचान कायम की है। नई पीढ़ी को जानना चाहिए कि राज भोज कौन थे और भोजपुर का क्या महत्व है। युवाओं को इतिहास के अनजाने पहलुओं से परिचित कराने के प्रयास निरंतर होना चाहिए। जन कल्याण के लिए समर्पित शासकों के योगदान को जानने से नौजवानों को प्रेरणा भी मिलती है इस नाते भोपाल में राजा भोज की प्रतिमा का लोकार्पण अपने आप में उत्साह की भावना का संचार करता है।

यह एक संयोग ही है कि मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल की उत्तर, दक्षिण और पूर्व दिशाओं में स्थित तीन बड़े पुरातात्विक महत्व के स्थान रायसेन जिले में हैं। इनमें से दो विश्व धरोहर स्थल भी हैं । सांची और भीमबैठका को ये गौरव हासिल है लेकिन तीसरा स्थान भोजपुर भी किसी विश्व धरोहर से कम नहीं । यहां विश्व प्रसिद्व और संसार के सबसे बड़े शिवलिंग के दर्शन के लिये देशी विदेशी पर्यटक पहुंचते हैं । शिवरात्रि और संक्राति के दिन मेला भी भरता है। यही नहीं मध्यप्रदेश सरकार की ओर से सालाना भोजपुर उत्सव भी आयोजित होता है। वर्ष 2010 राजभोज द्वारा स्थापित शिवमंदिर और भोजपुर के लिये ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण वर्ष था जब निकट स्थित प्राचीन स्थल आशापुरी की पुरातात्विक धरोहर के संरक्षण की पहल हुई।

वेत्रवती (बेतवा) के निकट भोजपुर का शिवमंदिर पर्यटकों को बरबस ही आकर्षित कर लेता है। मध्यप्रदेश के पूर्वी मालवा क्षेत्र में भोपाल, रायसेन एवं सीहोर जिलों का यह भू-भाग सभ्यता के आरम्भ से ही सांस्कृतिक गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र रहा है। इस क्षेत्र में बिखरे प्रागैतिहासिक स्थल, मध्ययुगीन स्मारक तथा अठाहरवीं-उन्नीसवीं सदी के स्मारक मालवा में विकसित स्थापत्य कला एवं प्रतिमा कला की परम्परा को दर्शाते हैं। भोपाल, भोजपुर, भीम-बैठका एवं आशापुरी के क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति को देखा जाए तो पता चलता है कि यहां एक विशाल जलाशय था। इसे 16 वीं सदी में रिक्त किया गया और इसके बाद भूमि कृषि के लिये उपयोग में लायी जाने लगी।

भोपाल से 28 किलोमीटर दूर स्थित यह शिव मंदिर 11वीं शती में परमार नरेश भोज के बहुआयामी प्रतिमासम्पन्न व्यक्तित्व का परिचायक है। भोज वास्तुशिल्प के ज्ञाता थे। भोज द्वारा प्रणीत मंदिर वास्तुशिल्प की प्राचीन विधा भूमिज शैली का महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है। मंदिर में एक अति विशाल शिवलिंग 26 फुट की कुल उंचाई के तराशे हुए आधार पर स्थित है और इसकी गणना विश्व के सबसे विशाल शिवलिंग में की जाती है। भोजपुर का यह शिवमंदिर अपूर्ण ही रहा, परंतु मंदिर की संरचना और उसके आस-पास बिखरे स्थापत्य शिल्प खण्डों के अवशेष, चट्टानों पर उकेरा गया मंदिर का विस्तृत वास्तुविन्यास उस दौर की वास्तुकला में प्रयुक्त होने वाली उन्नत तकनीकी और अभियांत्रिकी का परिचायक है।

राजा भोज ने बेतवा और उसकी सहायक नदियों पर बांध बनवाकर उस युग की दक्ष यांत्रिकी क्षमता का परिचय प्रस्तुत किया। भोपाल की विशाल झील पर बनाये गये बांध के अवशेष इसी योग्यता और दक्षता को आज भी सिद्व करते हैं। कालियासोत बांध से बेतवा नदी के पानी के स्त्रोत को बढ़ाने का प्रयास राजा भोज के समय में प्रतिष्ठित उच्च यांत्रिकीय कौशल को सिद्व करता है। भोजपुर मंदिर के समीप ही जैन सिद्वायतन मंदिर में तीर्थकंर आदिनाथ की 20 फुट उँची विशाल प्रतिमा भी है।

परमार कालीन कलाशैली के लिए प्रसिद्व रायसेन जिले का ही ग्राम आशापुरी भोजपुर से सिर्फ पांच किलोमीटर दूरी पर स्थित है। आशापुरी, भूतनाथ, शिवमंदिर और जैन मंदिर के अवशेष इस बात के साक्षी हैं कि यहां उत्तुंग शिखरों से युक्त विशाल देवालयों का निर्माण किया गया था। भोजपुर की भांति ही यहां का वर्तमान भूतनाथ मंदिर भी बांध के विशाल घाट पर निर्मित किया गया था। इस बांध के अवशेष आज भी तत्कालीन निर्माण कला की श्रेष्ठता के प्रमाण के रूप में दिखलाई देते हैं। इन मंदिरों के ध्वंसावशेषों से प्राप्त लगभग 450 कलाकृतियों को आशापुरी ग्राम में ही एकत्रित करके रखा गया है। ये विष्णु और शिव तथा उनके विभिन्न स्वरुपों से संबंधित हैं। अन्य प्रतिमाओं में जैन यक्ष-यक्ष्ीणियां, नायक-नायिकाएं आदि परमार काल के लोकजीवन एवं मान्यताओं को बतलाते हैं। जल्द ही यहां एक आकर्षक संग्रहालय आकार ले लेगा।

भोजपुर और निकटवर्ती क्षेत्र में औबेदुल्लागंज से होशंगाबाद के पहाड़ी क्षेत्र में प्रागैतिहासिक चित्रकला से युक्त शैलाश्रयों की श्रृंखला देखने को मिलती है। इनमें सबसे महत्वपूर्ण केन्द्र भीमबैठका है जहां छह सौ से अधिक चित्रित शैलाश्रयों में लघु पाषाण काल से लेकर आरंभिक ऐतिहासिक काल तक के चित्र मिलते हैं। इनमें आरंभिक (लगभग 10 हजार वर्ष ईसा पूर्व) के चित्रों में आखेट दृश्य, युद्व, यात्रायें, मधु संचयन, नृत्य-गान तथा अन्य सामाजिक विषयों का चित्रण है। इसी के साथ वन्य प्राणियों का अंकन काफी महत्वपूर्ण है। भीम बैठका की सभागुफा, जू-रॉक और अन्य कुछ गुफाओं में गेरुए, सफेद और हरे रंग से चित्रकारी की गयी है। इन चित्रों के अलंकरण से प्राय: ऐतिहासिक युग में प्रचलित आभूषण और अलंकरणप्रियता का ज्ञान होता है। डॉ. वी.एस. वाकणकर ने ये शैलाश्रय खोजे थे। मध्यप्रदेश सरकार ने डॉ. वाकणकर की स्मृति में पुरातत्व के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य के लिए राष्ट्रीय सम्मान स्थापित किया है। राजाभोज की प्रतिमा भोपाल की शोभा में इजाफा करने के साथ ही एक कल्याणकारी शासक के स्मरण और नई पीढ़ी को इतिहास के इस अनूठे पक्ष से अवगत कराने की ठोस पहल का नतीजा है। 


 

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