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आलेख

मध्यप्रदेश हुआ छप्पन साल जवाँ

भोपाल : मंगलवार, 25 अक्टूबर, 2011


दिनेश मालवीय

एक नवम्बर को मध्यप्रदेश पचपन वसंत देख चुकने के बाद छप्पनवें साल में कदम रखेगा। वर्ष 1956 में जब यह राज्य बना था, तब से इसकी किसी भी तरह से तुलना करना बेमानी होगा, खासकर छत्तीसगढ़ बनने के बाद। पचपन सालों के दौरान नर्मदा में काफी पानी बह चुका है।

किसी बात को साबित करने के लिये आँकड़े परोसना बहुत जरूरी तो नहीं लेकिन ग़ैर-ज़रूरी भी नहीं। प्रदेशवासियों के लिये यह गौरव की बात है कि विकास की दौड़ में कभी बहुत पीछे रहने वाला उनका राज्य आज विकसित प्रदेशों की बराबरी में आने को तत्पर है। मध्यप्रदेश ने बीते तीन वर्षों में स्थिर मूल्यों (आधार वर्ष 2004-05) पर वार्षिक आधार पर 9 प्रतिशत से अधिक की विकास दर हासिल कर ली है। 11वीं पंचवर्षीय योजना में लक्षित 7.6 प्रतिशत दर की तुलना में सकल राज्य घरेलू उत्पाद दर 10.06 प्रतिशत होने की आशा है। प्रदेश में विकास दर सभी तीनों प्रमुख क्षेत्रों में शानदार रहने की उम्मीद है। विशेषज्ञों द्वारा प्रदेश में कृषि के क्षेत्र में पाँच प्रतिशत के लक्ष्य के विरुद्ध 9.38 प्रतिशत, उद्योग में 10 प्रतिशत लक्ष्य के विरुद्ध 11.25 प्रतिशत और सेवा क्षेत्र में 8 प्रतिशत लक्ष्य के विरुद्ध 10 प्रतिशत विकास दर हासिल किये जाने का अनुमान लगाया गया है।

यह कहने की ज़रूरत नहीं कि आर्थिक विकास में इस उल्लेखनीय उपलब्धि के पीछे आठ साल की कड़ी मेहनत और योजनाबद्ध प्रयास है। बेशक, केवल सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि ही विकास नहीं है। सामाजिक उत्थान, शिक्षा, चिकित्सा सुविधाएँ, सुशासन और सबसे बड़ी बात कथन-करनी में एक राजनैतिक नेतृत्व, इन सबसे मिलकर समग्र विकास होता है। खुशी की बात है कि विकास के इन सभी घटकों में प्रदेश का काम बहुत बेहतरीन रहा। जहाँ सब जगह हरा-हरा देखना उचित नहीं है, वहीं वास्तविक उपलब्धियों की अनदेखी भी न्यायोचित नहीं है। बीते करीब आठ सालों में प्रदेश में विकास की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि इसमें अधोसंरचना और सामाजिक क्षेत्र दोनों को समान रूप से महत्व दिया गया।

सरकार को नेतृत्व देने वाले युवा मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान के भीतर प्रदेश को विकसित राज्यों की श्रेणी में लाने तथा दलित, गरीब और कमज़ोर वर्गों पर विशेष ध्यान देते हुए, समाज के हर वर्ग को ऊपर लाने का जोश, जुनून और जज़्बा है। इसीके चलते प्रदेश विकास और कल्याण के क्षेत्र में एक के बाद एक नयी ऊँचाइयाँ तय करता रहा है। बेशक उनके लिये यह काम आसान नहीं रहा, लेकिन उन्होंने इसे बखूबी कर दिखाया है।

पुराने लोगों को एक मजेदार घटना याद होगी। जब पंडित रविशंकर शुक्ल, प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के पास प्रस्तावित मध्यप्रदेश का नक्शा लेकर पहुँचे, तो पंडितजी ने हँसी में कहा कि यह किस अजीब जंतु जैसा दिखाई देता है। हालाकि पंडित नेहरू जानते थे कि अकूत प्राकृतिक सम्पदा, मेहनतकश और शांतिप्रिय लोगों तथा भौगोलिक रूप से देश के बीचों-बीच स्थित होने के कारण मध्यप्रदेश में समृद्ध राज्य बनने की पूरी क्षमता है।

लेकिन, दुर्भाग्यवश इस प्राकृतिक सम्पदा के दोहन के लिये समुचित अधोसंरचना विकसित न हो पाने के कारण यह प्रदेश बहुत लम्बे समय तक पिछड़ेपन का कलंक ढोने को मजबूर रहा। चारों तरफ ज़मीन से घिरे मध्यप्रदेश की एक और कमज़ोरी यह रही कि इसके विभिन्न अंचलों में रहने वाले लोगों में ‘‘मध्यप्रदेशियत’’ और भावनात्मक रूप से संगठित होकर इसे आगे ले जाने में प्राण-प्रण से जुट जाने का जज़्बा वांछित रूप से विकसित नहीं हो पाया।

भावनात्मक एकीकरण

मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने इस तथ्य को अच्छी तरह समझकर प्रदेश में भावनात्मक एकीकरण का बीड़ा उठाया, जिससे कि सभी के सतिक्रय सहयोग से प्रदेश का समग्र और समावेशी विकास हो सके। इसके लिये वे ‘‘आओ बनाएँ अपना मध्यप्रदेश’’ यात्रा पर निकले। प्रदेश एकता की अलख जगायी। उन्होंने लोगों से एकजुट होकर प्रदेश के विकास में सक्रिय योगदान का आह्वान किया।

वह दूसरों के सामने स्वयं उदाहरण प्रस्तुत कर नेतृत्व करने में यकीन रखते हैं। उन्होंने यात्रा के दौरान स्वयं विकास और सुधार के कार्यों में हाथ बटाया। इसने लोगों का दिल जीत लिया और उन्होंने उनके संदेश को गहराई से आत्मसात किया।

देश को दिखाई राह

मुख्यमंत्री बार-बार यह दोहराते रहे कि राजनीति उनके लिये एक मिशन है। अपने कार्यों से उन्होंने यह सिद्ध भी कर दिया है। जनता से सीधे जुड़े होने के कारण उनकी तकलीफों को लेकर उनके मन में गहरी हमदर्दी है। इसी के चलते उन्होंने अनेक ऐसी योजनाएँ लागू कीं जो पूरे देश के लिये एक मिसाल बन गईं। लाड़ली लक्ष्मी योजना को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता और लोकप्रियता मिली। इसे कुछ अन्य राज्यों ने भी अपनाया। यह योजना इस मायने में अनूठी है कि इसका उद्देश्य कन्याओं के प्रति समाज के नजरिये में सकारात्मक बदलाव लाने के साथ-साथ उनकी समुचित शिक्षा, स्वास्थ्य, विकास और सही उम्र में विवाह की व्यवस्था सुनिश्चित की गई है। इस योजना के तहत अभी तक करीब साढ़े 8 लाख कन्याओं को लाभ मिल चुका है।

गरीब परिवारों में विवाह योग्य बेटियों की शादी के लिये माता-पिता को कितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है और कर्ज के दलदल में फँसना पड़ता है, इससे मुख्यमंत्री अच्छी तरह परिचित हैं। गरीब परिवारों को इस मजबूरी से निजात दिलाने के लिये उन्होंने मुख्यमंत्री कन्यादान योजना शुरू की, जिसके तहत गरीब परिवारों की कन्याओं का विवाह शासन के खर्च पर किया जाता है। अभी तक डेढ़ लाख से अधिक ऐसी कन्याओं का विवाह सम्पन्न हो चुका है।

एक अनुकरणीय पहल करते हुए घटते लिंगानुपात को ठीक करने की दिशा में मुख्यमंत्री ने बेटी बचाओ अभियान शुरू किया है। जनसंख्या में बालकों की तुलना में बालिकाओं की घटती संख्या से चिंतित होकर मुख्यमंत्री ने यह अभियान शुरू किया। इसका उद्देश्य बेटियों को परिवार में बेटों के समान व्यवहार और सम्मान दिलाना और उनका समुचित विकास सुनिश्चित करना है। इस योजना के तीन भाग हैं- प्रोत्साहन, जागरूकता और दण्ड। प्रोत्साहन के रूप में उन्होंने ऐसे माता-पिताओं को 60 साल की उम्र होने पर पेंशन देने की घोषणा की है, जिनकी सिर्फ बेटियाँ हैं। इसके अलावा अन्य प्रोत्साहनों पर भी विचार किया जा रहा है। जागरूकता के तहत उन्होंने बेटियों के संरक्षण और सम्पोषण के लिये जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से यात्राएँ शुरू की हैं। उन्होंने पहली यात्रा दतिया से सेवढ़ा तक की, जहाँ जनसंख्या में लड़कियों का अनुपात बहुत चिंताजनक रूप से कम हो गया है। इस अभियान की शुरूआत करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि कन्याओं और महिलाओं के संरक्षण और विकास से संबंधित योजनाओं को पूरी सख्ती से लागू किया जायेगा। उन्होंने प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को भी इस योजना में सहयोग के लिये पत्र लिखा है।

आज जब पूरे देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ जन-मानस आंदोलित है, ऐसी स्थिति में मुख्यमंत्री ने लोक सेवा गारंटी अधिनियम के रूप में बहुत सकारात्मक कदम उठाया है। इस प्रकार का कानून न होने से भ्रष्टाचार लगातार बढ़ता चला जा रहा है। भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में अपनी तरह के इस कानून के तहत यह व्यवस्था की गई है कि समय-सीमा में सेवाएँ उपलब्ध न कराने वाले शासकीय सेवकों पर रोज का अर्थदण्ड लगेगा और यह अधिकतम 5 हजार रुपये तक हो सकता है। अधिनियम के तहत अभी तक 51 सेवाओं को लाया जा चुका है। जिन लोगों को समय-सीमा में सेवाएँ नहीं मिलती उनकी अपील की जिम्मेदारी भी सरकार ने अपने ऊपर ले ली है।

देश के 6 राज्यों ने इस कानून के प्रति रुचि दिखाई है और बिहार तथा दिल्ली ने इसे लागू भी कर दिया है। छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, पंजाब और उत्तरप्रदेश इसे लागू कर सकते हैं। यहाँ तक कि प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने भी बीना रिफायनरी के उद्घाटन कार्यक्रम में मुख्यमंत्री से इस कानून के विषय में जिज्ञासा प्रकट की।

महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ

देश में आज जब विशेषज्ञ कृषि उत्पादन को बढ़ाने के लिये माथापच्ची कर रहे हैं तब मध्यप्रदेश ने कृषि उत्पादन दर को तीन गुना बढ़ाकर सबको चकित कर दिया है। वर्ष 2004-05 में मध्यप्रदेश की कृषि उत्पादन वृद्धि दर 3.13 प्रतिशत थी, जो अब बढ़कर 9.38 प्रतिशत हो गई है। यह उपलब्धि इस अर्थ में और महत्वपूर्ण है कि प्रदेश की 32.03 प्रतिशत कृषि भूमि ही सिंचित है और प्रदेश के बहुत बड़े भू-भाग में लम्बे समय से सूखे की स्थिति रही। विशेषज्ञों की राय है कि बीते 5 वर्षों में प्रदेश में खेती का आधार मजबूत करने के लिये जो सार्थक प्रयास किये गये हैं उनके चलते अब प्रदेश में कभी भी कृषि की निगेटिव ग्रोथ नहीं होगी। कृषि के विकास को और फोकस्ड रूप से गति देने के लिये प्रदेश में कृषि केबिनेट का गठन किया गया है।

मुख्यमंत्री श्री चौहान ने पहले दिन से ही अधोसंरचना विकास को सबसे ज्यादा प्राथमिकता दी है। बीते 7 वर्षों में 60 हजार किलोमीटर से अधिक सड़कों का निर्माण और सुधार कार्य किया गया। सभी संभागीय मुख्यालयों को 4 लेन सड़कों से तथा जिला मुख्यालयों को 2 लेन सड़कों से जोड़ा जा रहा है। अभी तक 48 जिला मुख्यालय 2 लेन सड़कों से जुड़ चुके हैं।

ऊर्जा के क्षेत्र में भी मध्यप्रदेश की स्थिति पहले से बहुत बेहतर है और आने वाले समयों में मध्यप्रदेश पूरे देश की ऊर्जा राजधानी बनने को तत्पर है। बीते 7 वर्षों में विद्युत उत्पादन क्षमता में 3757 मेगावॉट की वृद्धि हुई है। आगामी 3 वर्षों के दौरान प्रदेश में बिजली की उपलब्धता 5 हजार मेगावॉट बढ़ जायेगी। इसके अलावा घरेलू तथा अन्य सभी श्रेणियों के विद्युत उपभोक्ताओं को पर्याप्त बिजली देने के लिये 4150 करोड़ रुपये लागत से एक फीडर विभक्तिकरण परियोजना पर काम शुरू किया गया है। अभी तक 242 फीडर अलग करके 1900 गाँवों को लाभ पहुँचाया जा चुका है।

आलोच्य अवधि में लगभग 8 लाख हेक्टेयर अतिरिक्त सिंचाई क्षमता विभिन्न विभागों की योजनाओं के तहत निर्मित की गई है।

उच्च और तकनीकी शिक्षा के मामले में मध्यप्रदेश अब एक बड़ा केन्द्र बनता जा रहा है। स्कूली शिक्षा में भी काफी सुधार हुआ है। प्रदेश में स्थापित होने वाले उद्योगों को प्रशिक्षित जन-शक्ति उपलब्ध कराने के लिये एक महत्वाकांक्षी कौशल विकास कार्यक्रम शुरू किया गया है। प्रत्येक विकासखण्ड में एक आई.टी.आई. अथवा कौशल विकास केन्द्र स्थापित किया जा रहा है।

बीते 7 सालों में उद्योग के क्षेत्र में अभूतपूर्व काम हुआ है। इस वर्ष 11 हजार सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों से 23 हजार से ज्यादा युवाओं को काम मिला है। एक नई कुटीर एवं ग्रामोद्योग नीति को अंतिम रूप दिया जा रहा है। वर्तमान में औद्योगिक निवेश के मामले में मध्यप्रदेश देश में छठे स्थान पर है। पिछले साल खजुराहो में आयोजित ग्लोबल इन्वेस्टर समिट में 2 लाख 44 हजार करोड़ रुपये के 110 करारनामों पर दस्तखत किये गये। इनमें से 51 करारनामे उत्पादन, निर्माण और क्रियान्वयन के विभिन्न चरणों में हैं और शेष 59 पर सर्वे का काम चल रहा है। बीना में भारत-ओमन रिफायनरी परियोजना में उत्पादन प्रारंभ हो गया है। प्रदेश के खनिजों के वैज्ञानिक दोहन के लिये एक नई खनिज नीति प्रारंभ कर दी गई है।

मध्यप्रदेश में स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी अच्छा काम हुआ है। वर्तमान में 81 प्रतिशत जचकियाँ अब स्वास्थ्य संस्थाओं में होने लगी हैं, जबकि 7 साल पहले ऐसा सिर्फ 26 प्रतिशत मामलों में होता था। प्रदेश के 21 जिला अस्पतालों में नवजात सघन देखभाल इकाइयाँ तथा अत्यधिक कुपोषित बच्चों के पुनर्वास के लिये 234 पोषण-पुनर्वास केन्द्र स्थापित किये गये। इसके अलावा 36 अस्पतालों में आयुष विंग स्थापित की गई हैं।

सारी उपलब्धियों को एक लेख में समेटना संभव नहीं है। बहरहाल, उपरोक्त उपलब्धियों को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि मध्यप्रदेश अब 56 साल का बूढ़ा नहीं बल्कि 56 साल का जवाँ हो गया है।


 

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