देवेन्द्र
जोशी
बसंत
के आगमन
के साथ
जब देश
प्रदेश
में
बासंती
रंगों
की छटा
बिखरेगी
वहीं
देश की
तस्वीर
को नए
रंगों
से
सजाने
का एक
अभियान
भी साथ-साथ
शुरू
होगा।
देश की
तस्वीर
में
विकास
के नये
रंग
भरने की
इस अहम
कवायद
में हर
घर, हर
परिवार
की
भागीदारी
होगी।
यह 100
करोड़
से
ज्यादा
लोगों
की
गिनती
कर
उन्हें
देश के
विकास
की धारा
से
जोड़ने
की
कवायद
है। इसे
हरएक
दशक के
अंतराल
से
अंजाम
दिया
जाता
है।
पिछली
जनगणना
2001 को हुई
थी।
यानी
बीते इन
दस
सालों
के बाद
हमें
सिर्फ
लोगों
की
संख्या
ही नहीं,
बल्कि
उनकी
जिंदगी
में हुए
बदलावों
की
जानकारी
भी इसी
जनगणना
के जरिए
मिलेगी।
इस बार
की
जनगणना
का
दूसरा
चरण 9
फरवरी
से 28
फरवरी
के बीच
होगा,
जिसमें
घर-घर
जाकर
लोगों
की
गिनती
करने के
साथ
उनकी
आथिर्क-सामाजिक
दशा को
भी दर्ज
किया
जाएगा।
इससे
पहले मई-जून
2010 में
खत्म
हुए
पहले
चरण में
मकानों
की
गिनती
कर
उन्हें
सूचीबद्ध
किया
गया था।
अब बारी
मकान के
भीतर
रहने
वाले
परिवारों
के बारे
में
जानकारी
लेने की
है।
दूसरे
चरण के
आखिर
में उन
बेघरों
की भी
गिनती
होगी,
जिन्हें
रहने के
लिए छत
नसीब
नहीं।
इसी माह 28
फरवरी
की मध्य
रात्रि
को ऐसे
लोगों
की
गिनती
की
जाएगी।
आबादी
के
प्रत्येक
हिस्से
तक
सरकारी
योजनाओं
का लाभ
पहुंचाने,
कृषि व
शहरी
विकास
योजनाओं
की
धनराशि
का
निर्धारण
व आकलन
और लंबी
अवधि की
विकास
रणनीति
बनाने
में
जनगणना
से
मिलने
वाली
जानकारियां
बेहद
अहम
हैं।
इसके
साथ ही
संसदीय
व
विधानसभा
क्षेत्रों
के नए
सिरे से
परिसीमन
व उनमें
आरक्षण
के नियम
लागू
करने
में भी
ये
आंकड़े
अहम
भूमिका
निभाते
हैं।
इससे
साफ है
कि
जनगणना
का काम
सभी
देशवासियों
की
तरक्की
से
जुड़ा
है,
इसलिए
इसमें
बढ़-चढ़कर
भाग
लेना
हमारी
जिम्मेदारी
बनती
है।
गणना
की
पुरानी
परंपरा :
|
29
सवाल
बताएंगे
देश का
हाल
जनगणना
का
सबसे
अहम
हिस्सा
होता
है
परिवार
अनुसूची।
इसमें
घर के
सभी
सदस्यों
की
उम्र,
शिक्षा,
वैवाहिक
स्थित
आदि
बिंदुओं
पर
सवाल
पूछे
जाते
हैं।
इस बार
सवालों
की
संख्या
29 है। इन
पर
नागरिकों
के सही-सही
जवाब
ही देश
का असल
हाल
बयां
करेंगे।
हम सभी
की यही
कोशिश
होनी
चाहिए
कि
सवालों
के सही
जवाब
दें,
इन्हें
टालें
नहीं
ताकि
हमारे
भारत
की
स्पष्ट
तस्वीर
उभरकर
सामने
आए। |
गिनने
की
इंसानी
आदत
बहुत
पुरानी
है।
बौद्धिक
क्षमता
के
विकास
के साथ
हमारे
पूर्वजों
ने जब
गांव
में
बस्ती
बसाकर
रहना
शुरू
किया, तब
भी
लोगों
की
गिनती
का
सिलसिला
जारी
रहा।
करीब 800-600
ईसा
पूर्व
में
ऋग्वेद
काल के
दौरान
जनगणना
के पहले
प्रमाण
मिलते
हैं,
जिसमें
कहा गया
था कि
लोग
छोटे-छोटे
समुदाय
में दूर-दराज
के
गांवों
में
रहते
हैं। उस
समय देश
की
आबादी
छितरी
हुई थी।
जैसे-जैसे
जनसंख्या
बढ़ी,
गांव
शहरों
में
तब्दील
होते
गए। ईसा
पूर्व
सातवी
से चौथी
शताब्दी
के
दौरान
लिखे गए
बौद्ध
धर्मग्रंथों
में यह
साफ कहा
गया है
कि उस
समय
भारत की
आथिर्क
स्थिति
मध्यकाल
के
यूरोप
से भी
बेहतर
थी। एक
छोटे
शहर में 30
से 100
परिवार
रहते थे,
जबकि
उत्तर
भारत
में
लगभग 20
शहर
आबाद हो
चुके
थे। ये
जानकारियां
जनगणना
के जरिए
लोगों
की
जिंदगी
को करीब
से जाने
बगैर
संभव
नहीं।
इसी तरह
का
विवरण
मौर्य
कालीन
अभिलेखों
(321-296 ईसवी
पूर्व)
में भी
मिलता
है, जब
सिकंदर
महान ने
भारत पर
हमला
किया
था। तब
चंद्रगुप्त
मौर्य
की सेना
में सात
लाख
सैनिक
थे।
हालांकि,
पुरातन
काल में
जनगणना
से मिले
आंकड़ों
का
उपयोग
केवल कर
वसूली
के
अलावा
प्रशासन
तंत्र
को
बेहतर
बनाने
में कम
ही किया
जाता
था।
लेकिन
आधुनिक
जनगणना
देश की
तरक्की
की दशा
और दिशा
दोनों
तय करती
है।
आंकड़ों
में
छिपा
रहस्य :
|
नागरिक
अपनी
जिम्मेदारी
निभाएं
-
घर
आए
जनगणना
कर्मी
के
पूछे
गए
सवालों
के सही
जवाब
दें,
कुछ
छिपाएं
नहीं।
-
आपकी
दी हुई
तमाम
जानकारियां
गोपनीय
रखी
जाती
हैं।
यहां
तक कि
सूचना
के
अधिकार
कानून
में भी
इसे
जाहिर
करने
की
मनाही
है।
-
लोगों
का हर
जवाब
देश के
हर
परिवार
की
जिदंगी
को
बेहतर
बनाने
में
मददगार
होगा।
जनगणना
2011 की
प्रमुख
खासियतें
:
-
दुनिया
का
सबसे
बड़ा
अभियान।
2200
करोड़
रुपए
का
खर्च।
प्रति
व्यक्ति
लागत 18.33
रुपए।
दुनिया
की
सबसे
किफायती
जनगणना
है यह।
-
देश
के 28
राज्यों,
सात
केंद्र
शासित
प्रदेशों
के 640
जिलों
की 5961
तहसीलों
के
हरेक
ब्लॉक
में 21
लाख
प्रगणक
जुटेंगे
इस काम
में।
-
सड़क
और
फुटपाथ
पर
रहने
वाले
बेघरों
की
गणना 28
फरवरी
की
मध्यरात्रि
को
शुरू
होगी।
एक
मार्च
को इस
काम का
पुनरीक्षण
किया
जाएगा।
-
स्कूलों
में भी
जनगणना
का काम
होगा।
मध्यप्रदेश
के सभी
50
जिलों
के 1.15
लाख
स्कूलों
में
विशेष
किट
बांटे
गए
हैं।
इसके
अलावा
कक्षा
6 से
कक्षा
8 तक के
बच्चों
के
पाठ्यक्रम
में
जनगणना
के
महत्व
के रूप
में
विशेष
अध्याय
भी
जोड़ा
गया
है।
-
फोन,
एसएमएस,
वेबसाइट,
टीवी
विज्ञापनों
और
फेसबुक,
ट्विटर
जैसी
सोशल
नेटवकिर्ंग
साइटस
के
जरिए
भी
लोगों
को
जनगणना
के
बारे
में
जानकारी
देने
का
इंतजाम
किया
गया
है।
-
हर
जिले
में एक
कंट्रोल
रूम
बनाया
गया
है।
|
जनगणना
के
आंकड़े
कई तरह
के
रहस्यों
को
छिपाए
रहते
हैं।
मुगल
सम्राट
अकबर को
इसकी
अहमियत
के बारे
में
जानकारी
थी और
इसीलिए
उन्होंने
पहली
बार इस
कृषि
प्रधान
देश में
काश्तकारों
की माली
हालत
जानने
की
कोशिश
की। आइन-ए-अकबरी
के
अनुसार,
जनगणना
के
अलावा
कृषि
भूमि,
सिंचाई
के
साधनों,
उत्पादन
और सूखे
के
कारणों
को
खोजने
का
प्रयास
किया
गया। उस
समय हुई
जनगणना
में
लोगों
की
आथिर्क
स्थिति
की
जानकारी
लेने के
साथ ही
उद्योग
व
कारोबार
से
जुड़े
आंकड़े
भी
जुटाए
गए। बाद
में यही
जानकारियां
प्रशासन
को
बेहतर
बनाने
में
मददगार
बनीं।
जनगणना
के काम
को
आधुनिक
स्वरूप
में
शुरू
करने का
काम
ब्रिटिश
शासन
में
हुआ। इस
दौरान 1871-72
प्रश्नावलियों
और
अनुसूचियों
के साथ
पहली
बार इस
काम को
अंजाम
दिया
गया।
हालांकि,
आबादी
की
गिनती
का यह
काम
अंग्रेजों
के
आधिपत्य
वाले
क्षेत्रों
में भी
पूरी
तरह से
नहीं हो
सका।
लेकिन
इससे
मिले
सबक ने 1882
में
पहली
देशव्यापी
जनगणना
की नींव
रखी।
इसमें
शहरी और
ग्रामीण
आबादी
को अलग-अलग
रखते
हुए
व्यवसाय,
शिक्षा,
धर्म,
जाति,
विस्थापन
और
निश्क्तता
जैसे
बिंदुओं
को
जोड़ा
गया।
आजादी
के बाद 1948
में
जनगणना
कानून
पारित
हुआ और
इसके एक
साल बाद
ही
केंद्रीय
गृह
मंत्रालय
के अधीन
रजिस्ट्रार
जनरल और
जनगणना
आयुक्त
की
नियुक्ति
हुई।
क्यों
खास है
इस बार
की
जनगणना ?
यह
देश की 15वीं
जनगणना
है,
जिसके
साथ ही
नेशनल
पॉपुलेशन
रजिस्टर
(एनपीआर)
बनाने
का काम
भी शुरू
हो चुका
है। इस
रजिस्टर
में हर
नागरिक
का नाम
पूरी
जानकारी
के साथ
दर्ज
होगा और
इसी के
आधार पर
उसे एक
अद्वितीय
पहचान
पत्र
दिया
जाएगा।
इसे
देखते
हुए
जनगणना
2011 को
मानव
इतिहास
का सबसे
बड़ा
अभियान
कहा जा
सकता
है। देश
के 28
राज्यों
व आठ
केंद्र
शासित
प्रदेशों
के 640
जिलों
में 21 लाख
प्रगणक 9
से 28
फरवरी
तक घर-घर
जाकर इस
काम को
पूरा
करेंगे।
लिंगानुपात
और
निशक्तता
इस बार
की
जनगणना
के सबसे
प्रमुख
बिंदु
हैं।
इसके
अलावा
व्यक्ति
की
शैक्षणिक
स्थिति,
किरायाभोगी
या
अल्पकालिक
कर्मी
होने,
विस्थापन
का पता
लगाने
और
स्त्री
व पुरुष
के
विवरण
के साथ
एक
तीसरा (अन्य)
लिंग भी
शामिल
करने
जैसे नए
कदम
उठाए गए
हैं।
|