अजय
वर्मा
शिवराजसिंह
चौहान
ने
मध्यप्रदेश
की
बागडोर
उस समय
सम्हाली
जब
राजनीतिक
ज्वार-भाटे
ने
प्रदेश
के
सरकार
रूपी
जहाज को
किनारे
का रूख
करने को
विवश कर
दिया
था।
राजनैतिक
उठा-पठक
का
वातावरण
और
प्रशासनिक
अनुभवहीनता
के
ठप्पे
की
आशंकाओं
के मध्य
मध्यप्रदेश
के
मुख्यमंत्री
की कमान
फूलों
का
सिंहासन
नहीं
था।
विधानसभा
निर्वाचन
की
चुनौती
भी दूर
नहीं
थी। यह
चुनौतियाँ
आज पीछे
मुड़कर
देखने
पर ये
मामूली
या आसान
प्रतीत
होती है
इतिहास
गवाह है
ऐसी
चुनौतियों
ने कई
दिगगजों
को
धराशायी
किया
है।
श्री
शिवराजसिंह
चौहान
ने न
केवल
प्रशासनिक
आशंकाओं
और
राजनीतिक
अटकलों
को
विराम
दिया,
वहीं
प्रदेश
की जनता
को
संवेदनशील
और
आत्मीय
शासन-प्रशासन
का
अहसास
भी
कराया।
शासन
सूत्रों
के
संचालन
की
स्थापित
मान्यताएँ
और
प्रचलित
औपनिवेशिक
धारणाओं
को अपनी
सहज
सादगी
और दिल
की बोली
"मैं
हूँ ना "
से नया
स्वरूप
देने का
कार्य
सफल
किया
है।
उन्होंने
पिछले
पांच
साल में
प्रशासन
के फोकस
में आम
आदमी को
खास
बनाने
का
गैेरमामूली
कार्य
बिना
किसी
शोर-शराबे
और आत्म
वचना के
कर
दिखाया
है।
श्री
शिवराजसिंह
चौहान
ने आम को
खास
बनाने
के लिये
पूरी
सर्तकता
और
सहजता
के साथ
लोक
सेवा
प्रदान
गांरटी
विधेयक
के रूप
में वो
करिश्मा
कर
दिखाया
है
जिसने
आम आदमी
को कलम
के कुछ
शब्दों
से याचक
से दाता
का
दर्जा
दिला
दिया
है।
आम
आदमी को
मिलने
वाले
सेवाओं
के
विभागों
की 26
सेवाओं
की
गारंटी
देकर
शिवराजसिंह
चौहान
ने
प्रदेश
प्रत्येक
नागरिक
को "मैं
हूँ ना "
का
भरोसा
दिया
है।
निश्चित
समय में
सेवा
नहीं
देने
वाले
सरकारी
सेवक को
अपने
वेतन से
विलंब
की
क्षतिपूर्ति
के रूप
में
राशि
देनी
होगी।
यह राशि
250 रूपये
प्रतिदिन
के मान
से 5
हजार
रूपये
तक हो
सकती
है।
विशेषता
यह है कि
जुर्माने
की यह
राशि
सरकारी
खजाने
में जमा
नहीं
होती
बल्कि
कार्य
में
विलंब
से
पीड़ित
आवेदक
को ही दे
दी जाती
। "मैं
हूँ ना "
के
भरोसे
का यह
स्वप्रमाणित
उदाहरण
है।
पहले
बाबू
साहेब
के पास
आय-प्रमाण
पत्र के
लिये
अनुनय
विनय के
या फिर
परिजन
की मौत
से जीवन
पर लगे
प्रश्न
चिन्ह
में
आर्थिक
सहायता
की
गुहार
करते
मृतक के
परिजन
ऐसे
दृश्य
शासकीय
कार्य
की
दिनचर्या
में
आसानी
से
दिखाई
देतेे
थे।
वर्षों
से
स्थापित
यह
व्यवस्था
मध्यप्रदेश
में
खत्म हो
गई है
बिना
किसी
क्रांति
और करतब
के।
श्री
शिवराजसिंह
चौहान
के
जमीनी
हकीकतों
से
जुड़े
होने और
मानवीय
गुणों
को
समझने
की
अद्भुत
क्षमता
ही इस
उपलब्धि
का
एकमात्र
और
अंतिम
कारण
है।
सबको
लेकर
चलने की
कला के
पारखी
शिवराज
ने लोक
सेवाओं
की
निश्चित
समय में
पूर्ति
की
गारंटी
से
प्रदेश
के
प्रशासनिक
संगठन
में
आमूल-चूल
परिवर्तन
की ऐसी
प्रक्रिया
प्रारंभ
हो गई है
जिसमें
सही
मायने
में
जनता के
हाथों
में
राजसत्ता
सौंपने
की
करिश्माई
कामयाबी
श्री
चौहान
को मिली
है।
जन
को
जर्नादन
और
तंत्र
को सेवक
की बात
नहीं
बल्कि
दर्जा
ही
मध्यप्रदेश
की
लोकतांत्रिक
व्यवस्था
का आधार
बन गया
है। आम
को खास
बनाने
के लिए
श्री
शिवराजसिंह
चौहान
की
कार्यशैली
"मैं
हूँ ना"
और आम
आदमी के
साथ
आत्मीय
संबंधों
पर
आधारित
शासन
सूत्र
संचालन
की
व्यवस्था
है।
बच्चों
के मामा,
बहनों
के भाई
और
माताओं
के बेटे
ने
जमीनी
अनुभवों
से
नौकरशाहों
को जनता
या यूँ
कहें कि
आम आदमी
का सेवक
बना
दिया है
जिसे
जनता के
आदेशों
का पालन
समय-सीमा
में
करना
होगा
अन्यथा
जुर्माना
देना
पड़ेगा।
आम
आदमी को
व्यवस्था
में खास
का
दर्जा
दिलाने
की श्री
शिवराजसिंह
की
कार्यशैली
में
अन्त्योदय
मेलों
के
आयोजन
की
व्यवस्था
एक और
दूरगामी
पहल है।
समय-सीमा
में
कार्यों
की
गारंटी
से एक
कदम आगे
की
व्यवस्था
अन्त्योदय
मेले
है। आम
आदमी को
सरकार
की
सेवाओं
और
योजनाओं
के
लाभों
के लिए
किसी के
चक्कर
नहीं
काटने
पड़े।
सरकार
की
सहायता
और
अनुदान
की
पात्रता
और
उपयुक्तता
के लिए
खोजने-बीनने
का काम
नहीं
करना
पड़े इस
व्यवस्था
का नाम
ही
अन्त्योदय
मेला
है।
इसमें
शासकीय
सेवक
विभिन्न
योजनाओं
के
पात्र
व्यक्तियों
को
चिन्हित
कर आगे
बढ़कर
लाभान्वित
कर रहे
हैं।
यही
कारण है
कि
प्रदेश
में अभी
तक लगे 15
अन्त्योदय
मेलो
में 9
लाख 63
हजार 155
हितग्राहियों
को 462
करोड़
रूपये
की
अनुदान
और
सहायता
राशि
उपलब्ध
कराई गई
है। आम
को खास
बनाने
की नीयत
के साथ
नजरिए
में भी
बदलाव
श्री
शिवराजसिंह
चौहान
ने किया
है।
मेलों
की
आयोजन
व्यवस्थाओं
में आम
आदमी को
खास
व्यक्ति
का
स्थान
मिले,
आयोजकों
का
व्यवहार
शालीन
और
अनुशासित
हो,
मेलों
की
आयोजन
व्यवस्थाओं
के लिए
आयोजकों
को "हिकमतअमली"
या 'जुगाड़'
का जतन
नहीं
करना
पड़े,
इसलिए 15
करोड़
रूपये
का बजट
में
प्रावधान
किया
गया है।
इस बात
की
बारीक
पकड़
श्री
शिवराजसिंह
चौहान
की
प्रशासनिक
समझदारी
और
जमीनी
हकीकतों
से
वाकिक
निजाम
की
काबिलियत
दिखाती
है।
व्यवस्था
में खास
आदमी या
अमीर तो
हर जगह
एडजस्ट
होते
हैं या
हो जाते
हैं।
सरकार
की सबसे
अधिक
जरूरत
आम आदमी
या गरीब
को होती
है। इसी
"फन्डे"
पर चलते
हुए
श्री
शिवराजसिंह
चौहान
ने
प्रदेश
के
गरीबों
और
जरूरतमंदों
के
कल्याण
के लिए
संचालित
किए
जाने
वाले
कार्यक्रमों-योजनाओं
को सतत
स्वरूप
देने और
उनके
लिए
राशि की
कमी
नहीं हो
इसकी
पुख्ता
व्यवस्था
कर दी
है। इस
वर्ष
बजट में
50
प्रतिशत
राशि
गरीबों
के लिए
आरक्षित
रखने का
उचित
निर्णय
किया
है।
वहीं
छात्रवृत्ति,
राहत
आदि के
रूप में
दी जाने
वाली
राशि के
निर्धारण
के लिए
उसे
बाजार
मूल्य
सूचकांकों
से जोड़
कर दिए
जाने की
व्यवस्था
कर
सहायता
और
छात्रवृत्ति
को
समसामयिक
स्वरूप
दे दिया
है।
आम
आदमी को
खास
बनाने
के श्री
शिवराजसिंह
चौहान
के
कार्यों
की
श्रंखला
काफी
लंबी
है। एम.पी.
ऑन लाइन,
परख के
कार्यक्रमों
के
द्वारा
आम को
खास
बनाने
के
कार्य
को गति
मिली
है। आम
को खास
बनाने
में
शिवराजसिंह
चौहान
की
प्रशासनिक
क्षमता
भी
शामिल
है
उत्कृष्ट
प्रबंधक
के रूप
में
उन्होंने
विकास
की
योजनाओं
के लिए
धन राशि
की
उपलब्धता
सुनिश्चित
करने के
साथ ही
बेहतर
वित्तीय
प्रबंधन
द्वारा
मध्यप्रदेश
की
वृद्धि
दर को
विगत दो
वर्षों
में 8.67
प्रतिशत
और 8.49
प्रतिशत
रखने की
उपलब्धि
हासिल
की है,
इसमें
विशिष्ट
तथ्य यह
है कि
राज्य
की
वृद्धि
दर
राष्ट्रीय
औसत से
अधिक
है।
श्री
शिवराजसिंह
का "मैं
हूँ ना "
का
भरोसा
आमजन को
विकास
की धारा
में
शामिल
करने और
तंत्र
को भी
प्रबंधन
कौशल से
सजग और
सक्रिय
कर
वित्तीय
चिंताओं
से
मुक्त
रखने
में सफल
रहा है।
यही
कारण है
कि श्री
चौहान
ने
मुख्यमंत्री
के रूप
में
समाज के
कमजोर
निर्धन
वर्ग के
लिए
प्रसूति,
बच्चों
की
पढ़ाई,
बीमारी,
आकस्मिक
दुर्घटना,
विवाह
और
अन्त्येष्टि
जैसे
सभी शुभ-अशुभ
कार्यों
में
आर्थिक
सहायता
उपलब्ध
कराने
के लिए
मुख्यमंत्री
मजदूर
सुरक्षा
योजना,
भवन
संन्निर्माण
कर्मकार
कल्याण
मण्डल
की
निर्माण
श्रमिक
योजनाओं,
मण्डी
हम्माल
एवं
तुलावटी
कल्याण
योजना,
शहरी
घरेलू
कामकाजी
बहनों
के
कल्याण
की
योजना
और हाथ
ठेला
तथा
रिक्शा
चालक
कल्याण
योजना
का
संचालन
शुरू
किया
है। हाल
ही में
उन्होंने
शहरों
में
रैनबसेरों
में
रहने
वाले
गरीबों
को
मात्र 5
रूपये
की दर पर
भोजन
उपलब्ध
कराने
की
व्यवस्था
भी राम-रोटी
योजना
में कर
दी है।
आम
को खास
बनाने
के श्री
चौहान
के
प्रयासों
का यह
अंत
नहीं
आरंभ
है। अभी
और कई
तीर
उनकी
तरकश मे
हैं
जिनमें
भ्रष्टाचारी
की
सम्पत्ति
को
राजसात
करने,
आधुनिक
निजी
शिक्षण
संस्थाओं
में
गरीबों
के लिए
स्थान
का
आरक्षण
आदि
शामिल
है।
गरीबों
की
आशाओं
और
अपेक्षाओं
को पूरा
करने के
लिये -
"बड़ी-बड़ी
बातें
नहीं
मैं हूँ
ना, बस
ये शब्द
ही काफी
हैं
बदलाव
के लिए,
बहुत
नहीं, बस
शिवराज
ही काफी
है"
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