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"नमामि देवि नर्मदे"- सेवा यात्रा

दुनिया में नदियों के संरक्षण से ही बच सकती है संस्कृति

भोपाल : शुक्रवार, फरवरी 3, 2017, 18:43 IST

नर्मदा जयंती के अवसर पर सभी प्रदेशवासियों को हार्दिक बधाई। आज हनुवंतिया में माँ नर्मदा की पूजा-अर्चना एवं आरती करने के बाद केबिनेट की बैठक में मध्यप्रदेश के विकास की योजनाओं के संबंध में निर्णय लेकर आध्यात्मिक शांति की अनुभूति हुई है।

विश्व की सभी प्राचीन सभ्यताएँ नदियों के तट पर ही विकसित हुई हैं। नर्मदा घाटी भी इसका अपवाद नहीं है। नर्मदा घाटी का सांस्कृतिक इतिहास गौरवशाली रहा है। माँ नर्मदा का आसपास की धरती को समृद्ध बनाने में बहुत योगदान रहा है। नर्मदा नदी को मध्यप्रदेश की जीवन-रेखा कहा जाता है। माँ नर्मदा को भारतीय संस्कृति में मोक्षदायिनी, पाप मोचिनी, मुक्तिदात्री, पितृतारिणी और भक्तों की कामनाओं की पूर्ति करने वाले महातीर्थ का भी गौरव प्राप्त है।

नर्मदा नदी भारत की सात प्रमुख नदियों में से एक है। प्राचीन काल से ही नर्मदा की धारा में सामाजिक चेतना देखने को मिलती है। नर्मदांचल में अनेक पंथों के संतों का समय-समय पर आगमन हुआ। इनमें कबीर पंथ, सिख पंथ, तारण पंथ, राधावल्लभ पंथ और प्रणामी पंथ प्रमुख हैं। नर्मदा किनारे पर मैकल, व्यास, भृगु, अत्री और कपिल जैसे ऋषियों के तप करने का भी उल्लेख पुराणों में मिलता है। आदि शंकराचार्य ने भी इस भूमि पर तप किया। इन संतों ने अपनी वाणी और संदेश से नर्मदा क्षेत्र के धार्मिक वातावरण को उदार बनाया। इन्होंने इस क्षेत्र को धार्मिक विविधता प्रदान करते हुए यहाँ सामाजिक समरसता को बढ़ावा दिया, जो कि आज तक इस अंचल में विद्यमान है।

होशंगाबाद के सेठानी घाट का ऐतिहासिक महत्व है। ब्रह्म विद्या सोसायटी के संस्थापक हेनरी स्टल अलकाट ने यहाँ अपने अंतर्राष्ट्रीय सहयोगियों के साथ स्नान करके आध्यात्मिक आनंद प्राप्त किया था। इस घाट पर नर्मदा का जन्मोत्सव नर्मदा जयंती के रूप में वर्ष 1976 से मनाया जा रहा है। उस समय यह आयोजन नर्मदा में प्रदूषण के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिये ही प्रारम्भ किया गया था, जो आगे चलकर सामूहिक पूजा में बदल गया।

'नमामि देवि नर्मदे- नर्मदा सेवा यात्रा' अभियान इतिहास की उसी परम्परा का पुनर्जीवन है, जो कि प्रदेश के नागरिकों को माँ नर्मदा के ऐतिहासिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और आर्थिक पहलुओं से परिचित करायेगी। इस यात्रा का उद्देश्य नर्मदा और विश्व की सभी नदियों को प्रदूषण मुक्त रखने के संदेश और नर्मदा तपोभूमि के सामाजिक समरसता के विचार को पूरे प्रदेश, देश और समूची दुनिया में पहुँचाना है।

नर्मदा नदी के तट पर स्थित अमरकंटक, भेड़ाघाट, ओंकारेश्वर, महेश्वर और मंडलेश्वर जैसे धार्मिक पर्यटन स्थलों पर श्रद्धालुओं की गतिविधियों से भी लोगों को रोज़गार मिलता है। नर्मदा नदी के किनारे होने वाले अनेक मेले और सांस्कृतिक आयोजन भी लाखों लोगों को रोज़गार देते हैं। मैं तो कहता हूँ कि माँ नर्मदा अपने तट पर बसे प्रदेशवासियों को केवल रोज़गार ही नहीं देती है, बल्कि जो भी उसकी वंदना करता है, उस पर मुक्त हस्त से कृपा बरसाती हैं। आज हनुवंतिया जैसा अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन स्थल भी यहाँ विकसित हो पाया है। यह भी प्रदेश को एक नई पहचान देगा। माँ नर्मदा की कृपा से ही प्रदेश विकास की ओर अग्रसर है। मैया की कृपा से ही सूखे कंठों और खेतों को पानी मिल रहा है। माँ नर्मदा 4 करोड़ से अधिक लोगों को पीने के लिये पानी और 17 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई की व्यवस्था करती है। माँ की कृपा से ही हमारे अन्न के भण्डार भरे हैं और बिजली मिलने से घरों का अंधेरा दूर हुआ है। माँ नर्मदा की कृपा से 2400 मेगावाट बिजली उत्पन्न होती है। माँ की कृपा से ही प्रदेश को चार बार कृषि कर्मण अवार्ड प्राप्त हुआ है।

मुझे इस बात की प्रसन्नता है कि आज 'नमामि देवि नर्मदे-नर्मदा सेवा यात्रा' अभियान एक जन आंदोलन बन गया है। सभी लोग बड़े उत्साह और उमंग के साथ दुनिया के सबसे बड़े नदी संरक्षण अभियान में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं। आध्यात्मिक गुरु और नोबेल शांति पुरस्कार विजेता श्री दलाई लामा जी, हमारे देश के महान अभिनेता श्री अमिताभ बच्चन जी, जिन्हें हम स्वर कोकिला के नाम से जानते है, ऐसी सुश्री लता मंगेशकर जी और नोबल शांति पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी जी के अलावा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ईस्ट तिमोर के नोबल शांति पुरस्कार विजेता जोस रामोस होर्ता और टयूनीथिया की नोबल शांति पुरस्कार विजेता श्रीमती बाहडेड बाउन्चेमोई जैसी हस्तियों का हमें समर्थन प्राप्त हुआ है। इससे हमारा मनोबल बढ़ा है।

माँ नर्मदा भविष्य में प्रदूषित न हों इसलिये हमने फैसला लिया है कि 15 शहरों के दूषित जल को नर्मदा में नहीं मिलने देंगे। इसके लिये हम 1500 करोड़ रुपये की राशि से सीवरेज ट्रीटमेंट प्लान्ट लगा रहे हैं। नर्मदा नदी के तट के सभी गाँवों और शहरों को खुले में शौच से मुक्त किया जायेगा। नर्मदा नदी के दोनों ओर बहने वाले 766 नालों के पानी को नर्मदा में जाने से रोकने के सुनियोजित प्रयास किये जायेंगे। नदी के दोनों ओर हम सघन व़क्षारोपण करेंगे ताकि नर्मदा में जल की मात्रा बढ़ सके। नर्मदा के तट पर स्थित गाँवों और शहरों में 5 कि.मी. की दूरी तक शराब की दुकानें नहीं होगी। सभी घाटों पर शवदाह गृह, स्नानागार और पूजा सामग्री विसर्जन कुण्ड बनाये जायेंगे ताकि माँ नर्मदा को पूर्णत: प्रदूषण रहित रखा जा सके।

मेरे विचार से हमें नदियों के महत्व को समझते हुए पूरी दुनिया में नदियों को बचाने के लिये लोगों को जागरूक करना चाहिये। जिन नदियों के किनारे हमारी प्राचीन सभ्यताएँ विकसित हुई हैं, यदि वह नदियॉ ही स्वच्छ नहीं रहेगी तो हमारी सभ्यता और संस्कृति के स्वस्थ रहने की कल्पना हम कैसे कर सकते हैं। लंदन की टेम्स नदी को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिये वहाँ के नागरिक आगे आये, उन्होंने उसे दुनिया की सबसे स्वच्छ नदी बना दिया। नर्मदा नदी भारत देश की सबसे कम प्रदूषित नदी है, इसे हम अब और प्रदूषित नहीं होने देंगे। हम निर्मल बनाकर ही दम लेंगे। इसी तरह से पूरी दुनिया में सभी लोगों को नदियों को बचाने के लिये आगे आना चाहिये।

मैं संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरस जी को पत्र लिखकर यह अनुरोध करूँगा कि वह पूरी दुनिया में संयुक्त राष्ट्र की अगुवाई में नदियों को संरक्षित और प्रदूषणमुक्त रखने के लिये लोगों को जागरूक करने अभियान चलायें, हम इसमें उनके साथ हैं।

आइये संकल्प लें कि हम पूरे विश्व में नदियों को स्वच्छ बनाने के लिये लोगों का आव्हान कर एक सुखी, समृद्ध और सुन्दर विश्व का निर्माण करेंगे।

धन्यवाद एवं शुभकामनाएँ।

 
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