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क्षिप्रा गंगा से भी अधिक पवित्र और पुण्य-प्रदायिनी

भोपाल : बुधवार, अप्रैल 20, 2016, 20:39 IST

भारतीय संस्कृति के विकास में नदी-नालों, झरनों, तड़ागों तथा अन्य जलीय-स्थलों का अमूल्य योगदान रहा है। अवन्ती के सिंहस्थ महापर्व का क्षिप्रा के अमृतमय जल से अन्योन्याश्रित संबंध है। प्राचीन-काल में इस क्षेत्र में क्षिप्रा, नीलगंगा, गंधवती तथा नवनदी पवित्र जल की प्रवाहिणी थीं। प्रत्येक धार्मिक कृत्य के पूर्व इनमें स्नान कर देह शुद्धि जरूरी थी। वर्तमान में गंधवती एक नाले के रूप में प्रवाहित है, परन्तु नीलगंगा एवं नवनदी के अस्तित्व का ज्ञान नहीं है।

यत्र क्षिप्रा महापुण्या दिव्या नवनदी प्रिया

नीलगंगा संगमं च तथा गंधवती नदी

पुराणों में क्षिप्रा में स्नान का पुण्य गंगा-स्नान से दस गुना अधिक बताया गया है। वापी, कूप, तड़ाग आदि में स्नान से जितना पुण्य मिलता है, उससे दस गुना अधिक फल नदी में नहाने से, इससे दस गुना ज्यादा फल ताप्ती और गोदावरी में स्नान करने से, इससे दस गुना ज्यादा फल रेवा और गंगा में स्नान करने से तथा इससे भी दस गुना ज्यादा फल क्षिप्रा में स्नान करने से प्राप्त होता है।

तस्माद्याशगुणा क्षिप्रा पवित्रा पापनाशिनी,

ईदृशां च नदी रम्या अवन्त्यां भुवि वर्तते।

इस प्रकार क्षिप्रा गंगा से भी अधिक पवित्र और पुण्य-प्रदायिणी है। मन, वचन और कर्म- तीनों द्वारा किये गये पापों का नाश करने की शक्ति क्षिप्रा-जल में विद्यमान मानी जाती है। देव विभूतियाँ अश्विनीकुमार, पवन, रुद्र आदि देवगण इस पुण्य-सलिला के तट पर सांध्य-भ्रमण के लिये आते थे। क्षिप्रा नदी के दीपदान का विशेष महत्व था।

सर्वेषामेव दानांन

दीपदानं प्रशस्यते।

क्षिप्रा नदी के जन्म के संबंध में अनेक दन्त कथाएँ तथा कथाएँ प्रचलित हैं। उज्जैन में अत्रि नामक एक ऋषि ने अपना एक हाथ ऊपर उठाये रखकर तीन हजार वर्ष तक तपस्या की। तपस्या के पश्चात् जब उन्होंने अपनी आँखें खोली तो देशा कि उनके शरीर से प्रकाश के दो स्रोत निकल रहे हैं। एक स्रोत आकाशगामी हुआ और कालांतर में चन्द्रमा बन गया। दूसरे स्रोत ने पृथ्वी पर क्षिप्रा नदी का रूप धारण किया। यह बैकुण्ठ में क्षिप्रा, स्वर्ग में ज्वरध्नी, यम द्वार पर पापध्नी और पाताल में अमृत संभवा नाम विख्यात है।

पुराणों में इस कथा का अनेक स्थलों पर वर्णन है कि आवेश में आकर शिवाजी ने ब्रह्मा का सिर काट लिया। फलस्वरूप उन्हें ब्रह्मा का कपाल लेकर भिक्षाटन के लिये समस्त भू-मण्डल में घूमना पड़ा, परंतु उन्हें कहीं भी भिक्षा नहीं मिली। अन्त में वे भगवान विष्णु के बैकुण्ठ लोक में पहुँचे और याचना की। भगवान विष्णु ने उन्हें अपनी तर्जनी दिखायी। इस पर क्रुद्ध होकर शिव ने इस तर्जनी पर त्रिशूल से प्रहार किया। तर्जनी के रक्त से कपाल भर गया और रक्त की धारा बहने लगी। इस प्रकार बैकुण्ठ में ब्रह्मा के कपाल से निकली यह रक्त धारा क्षिप्रा नदी के रूप में तीनों लोकों में गयी।

क्षिप्रा के ज्वरध्नी कहलाने की जो कथा प्रचलित है, उसके अनुसार कृष्ण बाणासुर युद्ध के दौरान अपने भक्त की रक्षा के लिये शिवजी को कृष्ण से लड़ने स्वयं आना पड़ा था। विभिन्न शस्त्रों और आयुधों का प्रयोग करने के बाद शिवजी ने माहेश्वर ज्वर और कृष्णजी ने वैष्णव ज्वर का प्रयोग किया। इन ज्वरों का शमन महाकाल वन में क्षिप्रा की धारा में हुआ। इस कारण क्षिप्रा ज्वरध्नी कहलाती है। कहा जाता है कि क्षिप्रा में स्नान से ज्वर शान्त हो जाते हैं। क्षिप्रा तट के निवासी ज्वर-बाधा से पीड़ित नहीं होते थे।

इसी प्रकार एक अन्य कथा है कि कोहट देश के अत्यन्त पापाचारी एवं नीच राजा दमनक का संयोग से महाकाल वन में सर्प दंश के कारण निधन हो गया। कौवों ने मांस भक्षण करते हुए राजा के मांस-पिण्डों को क्षिप्रा में पटक दिया। क्षिप्रा-जल का स्पर्श मिलते ही वह राजा शिवरूप में परिवर्तित हो गया। दण्ड देने की इच्छा से आये यमदूत यह चमत्कार देखकर वापस धर्मराज के पास पहुँचे। तब धर्मराज से बताया कि पतितपावनी क्षिप्रा के जल को स्पर्श करने वाले व्यक्ति को पाप स्पर्श नहीं करते तथा सभी पाप तुरंत नष्ट हो जाते हैं। केवल क्षिप्रा नाम का जप करने से भी शिवत्व की प्राप्ति होती है। वैशाख मास में क्षिप्रा में स्नान करने से अनन्त काल तक शिवरूप धारण कर विचरण करने की शक्ति प्राप्त होती है। देवता भी इस पुण्य-सलिला के दर्शन की अभिलाषा रखते हैं। यह पापों का नाश करने वाली पापध्नी है।

क्षिप्रा का अमृतसंभवा नाम पड़ने का कारण भी पौराणिक है। जब भूखे-प्यासे शिवजी नागलोक के सोमवत नगर में पहुँचे तब भी किसी ने उन्हें भिक्षा नहीं दी। क्रुद्ध शिवजी ने नागलोक की रक्षा के लिये रखे गये अमृत के सभी 21 कुण्डों का पान कर लिया जिससे पूरा नागलोक भयाक्रान्त हो गया। भयभीत वासुकि आदि नागराज भगवान विष्णु का ध्यान करने लगे तब आकाशवाणी हुई कि मृत्यु लोक के महाकाल वन में क्षिप्रा नामक पुण्यप्रभा, पतितपावनी, पापनाशिनी तथा सभी मनोरथ पूर्ण करने वाली नदी है। उसमें स्नान कर शिवजी की आराधना करने से अमृत कुंड पुन: भर जायेंगे। नागलोकवासियों ने ऐसा ही किया और शिवजी के आदेश से क्षिप्रा जल को खाली अमृतकुंडों पर छिड़क दिया। सभी कुंड अमृत से लबालब भर गये। कहा जाता है कि पृथ्वी लोक में जो लोग क्षिप्रा स्नान करते हैं उनके सभी रोग, दोष, संकट और कष्ट नष्ट हो जाते हैं। क्षिप्रा सर्वत्र कल्मषनाशिनी है पर अवन्तिका में इसका विशेष महत्व है।

सिंहस्थ महापर्व पर दस लोगों के एकत्रित होने की शुभ घड़ी में स्नान करना मुक्ति फलदायक है। एते दशमहायोगा: स्नाने मुक्ति फलप्रदा: इसके अतिरिक्त, कार्तिके चैत्र बैशाखे उच्चे नीचे दिवाकरे, क्षिप्रा स्नान: प्रदुर्वात क्लेश दु:ख निवारणम्। अत: क्षिप्रा के महत्व का वर्णन आदि काल से किया जाता रहा है जिसके कारण सिंहस्थ महापर्व राष्ट्रीय एकता का विशिष्ट प्रदर्शन-स्थल बन गया है।

वर्तमान में क्षिप्रा नदी प्रदेश के मालवा क्षेत्र की सुप्रसिद्ध एवं पवित्र नदी है। यह इंदौर के पास विंध्याचल से निकलकर चम्बल में मिल जाती है। तेज बहने वाली होने के कारण इसे क्षिप्रा कहा जाता है। नदी की लम्बाई 150 मील है। हिन्दुओं के सात पवित्र नगर में से एक उज्जैन क्षिप्रा नदी के तट पर बसा है। रामघाट, महाकालेश्वर ज्योर्तिलिंग, सिद्धवट, कालियादाह महल, सांदीपनि आश्रम आदि अनेक पौराणिक-ऐतिहासिक स्थल इस नदी के तट पर थे। शकुन्तला, रघुवंश, मेघदूत, कादम्बरी, मृच्छकटिक, राजतरंगिणी आदि उच्च साहित्यिक ग्रंथ-रत्न इसी नदी के पावन तट पर रचे गये हैं।

क्षिप्रा नदी के अलावा अवन्ती क्षेत्र में सप्त नगरों का उल्लेख भी मिलता है। इनमें रुद्रसागर, पुष्करासर, गोवर्धन, सागर, क्षीर सागर, रत्नागर सागर, विष्णु सागर और पुरुषोत्तम सागर सम्मिलित हैं। धार्मिक अनुष्ठानों में इनका महत्वपूर्ण स्थान था। महाकाल और हरसिद्धि के बीच में रुद्र सागर, नलिया बाखल स्थित रंग बावड़ी पुष्कर सर, सिद्धेश्वर टेकड़ी के नीचे क्षीर सागर, बुधवारिया हाट और नगर कोट के मध्य गोवर्धन सागर, उण्डासा ताल, रत्नाकर सर और अंकपात के पास पुरुषोत्तम सागर और विष्णु सागर स्थित थे। इनके अतिरिक्त कपालमाल सर, अंकपात सर, ब्रह्म सरोवर, शिवप्रद, रम्यसर, बिन्दुसर तथा धर्म सरोवर के नाम का भी उल्लेख मिलता है परन्तु इनकी स्थिति के संबंध मे निश्चित जानकारी उपलब्ध नहीं है।

इस क्षेत्र में श्रीकृष्ण ने अपने गुरु के धार्मिक कृत्यों के लिये गोमती कुंड बनवाया था। गोमती कुंड में स्नान-दान का पुण्य एक हजार गोदान के बराबर माना जाता है। इसके अतिरिक्त इस क्षेत्र में कलह नाशन, मणिकर्णिका, अप्सरा कुंड, माहिष कुंड, रूप कुंड, सुन्दर कुंड, वामन कुंड और दुग्ध कुंड होने का उल्लेख मिलता है। स्कंद पुराण में प्रत्येक कुंड की महिमा नामानुसार अलग-अलग है। स्कंद पुराण में उपर्युक्त 4 नदियों, 14 सरोवरों और 14 कुंडों के अलावा 4 वापियो-शंकरवापी, यज्ञवापी, पितामह वापी और विष्णु वापी का भी उल्लेख है। कहा जाता है कि इस क्षेत्र में 28 तीर्थ थे।

 
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